March 26, 2025 Blog

Mahishasura Mardini Stotram : यहाँ पढ़े महिसासुर मर्दिनी स्तोत्र हिंदी अर्थ सहित

BY : STARZSPEAK

Mahishasura Mardini Stotram: यदि आप जीवन में किसी समस्या या कठिनाई का सामना कर रहे हैं, तो महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र का नियमित पाठ करना लाभकारी हो सकता है। मान्यताओं के अनुसार, इस स्तोत्र के जाप से मां भगवती की कृपा प्राप्त होती है, जिससे जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और साहस एवं आत्मविश्वास में वृद्धि होती है । महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र (Mahishasura Mardini Stotram) की रचना आदि शंकराचार्य जी ने की थी। कहा जाता है कि एक बार वे अपने शिष्यों के साथ मणिकर्णिका घाट जा रहे थे, जहां एक स्त्री अपने मृत पति के शव के साथ विलाप कर रही थी। आदि शंकराचार्य जी के अनुरोध पर उस स्त्री ने शव को स्वयं हटाने के बजाय, उनसे शव को हटने का आदेश देने को कहा। इस पर उन्होंने समझाया कि शव में स्वयं हटने की शक्ति नहीं होती। तब उस स्त्री ने तर्क दिया कि यदि ब्रह्म ही जगत का कर्ता है, तो शक्ति के बिना यह शव क्यों नहीं हट सकता? इस गूढ़ प्रश्न से प्रभावित होकर, आदि शंकराचार्य जी ने वहीं ध्यान लगाया और अंतर्दृष्टि में देखा कि वह स्त्री स्वयं आद्या शक्ति महामाया थीं। इस अनुभव से प्रेरित होकर, उन्होंने महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र की रचना की।

इस स्तोत्र का नियमित पाठ करने से नकारात्मक ऊर्जाओं से सुरक्षा मिलती है, कार्यक्षेत्र में सफलता प्राप्त होती है और आध्यात्मिक विकास होता है। विशेषकर नवरात्रि के दौरान इसका पाठ करने से मां भगवती का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है।

महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र (Mahishasura Mardini Stotram) के नियमित जाप से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, जिससे व्यक्ति आत्मविश्वास के साथ अपने लक्ष्यों की ओर अग्रसर हो सकता है।

!! Mahishasura Mardini Stotram !!

!! महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र !!

अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नंदी न्नुते

गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते।

भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥१॥

अर्थ: हे पर्वतराज हिमालय की पुत्री, जो पृथ्वी को आनंदित करती हैं, संसार को प्रसन्न रखती हैं, नंदीगण द्वारा वंदित हैं, विंध्याचल पर्वत की चोटियों पर निवास करती हैं, भगवान विष्णु को संतुष्ट करती हैं, इन्द्र द्वारा पूजित हैं, भगवान शिव की पत्नी हैं, विशाल परिवार की संरक्षिका हैं और ऐश्वर्य प्रदान करती हैं—आपकी जय हो, महिषासुर मर्दिनी पार्वती!


mahishasura Mardini Stotram


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सुरवर वर्षिणि दुर्धर धर्षिणि दुर्मुख मर्षिणि हर्षरते

त्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिष मोषिणि घोषरते।

दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥२॥

अर्थ: हे महिषासुर मर्दिनी (Mahishasura Mardini Stotram) पार्वती, आप देवराज इंद्र को समृद्धि प्रदान करने वाली हैं, दुर्धर और दुर्मुख जैसे दैत्यों का नाश करने वाली हैं, सदा आनंदित रहती हैं, तीनों लोकों का पालन-पोषण करती हैं, भगवान शिव को संतुष्ट रखती हैं, पापों का नाश करती हैं, घोर गर्जना करने वाली हैं, दुष्टों पर क्रोधित होती हैं, मदांधों के अहंकार को नष्ट करती हैं, अधार्मिक मुनियों पर क्रोध करती हैं, और समुद्र-कन्या महालक्ष्मी के रूप में प्रतिष्ठित हैं। आपकी जय हो, जय हो।


अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्ब वनप्रिय वासिनि हासरते

शिखरि शिरोमणि तुङ्गहिमालय शृङ्गनिजालय मध्यगते।

मधुमधुरे मधुकैटभ गञ्जिनि कैटभ भञ्जिनि रासरते

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥३॥

अर्थ: हे जगत जननी, आप कदंब वन में प्रेमपूर्वक निवास करती हैं, सदा प्रसन्न रहती हैं, हास-परिहास में रत रहती हैं, और हिमालय की ऊँची चोटियों पर अपने भवन में विराजमान हैं। आपका स्वभाव मधु से भी अधिक मधुर है, आपने मधु-कैटभ का संहार किया है, महिषासुर का वध किया है, और रासक्रीड़ा में मग्न रहती हैं। हे भगवान शिव की प्रिय पत्नी महिषासुर मर्दिनी पार्वती, आपकी जय हो, जय हो। (Mahishasura Mardini Stotram)


अयि शतखण्ड विखण्डित रुण्ड वितुण्डित शुंड गजाधिपते

रिपुगजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रमशुण्ड मृगाधिपते।

निजभुजदण्ड निपातितखण्ड विपातितमुण्ड भटाधिपते

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥४॥

अर्थ: हे महिषासुर मर्दिनी पार्वती, आप वह हैं जिन्होंने गजराज के बिना सूँड़ वाले धड़ को सैकड़ों टुकड़ों में विभाजित किया, चंड और मुंड नामक सेनापतियों को अपने भुजदंड से पराजित किया, और शत्रु हाथियों के गंडस्थल को अपने सिंह पर सवार होकर चूर्ण किया। आपकी जय हो, जय हो। (Mahishasura Mardini Stotram)


अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृते

चतुरविचार धुरीणमहाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते।

रितदुरीह दुराशयदुर्मति दानवदुत कृतान्तमते

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥५॥

अर्थ: हे महिषासुर मर्दिनी पार्वती, आप रणभूमि में मदोन्मत्त शत्रुओं का वध करके अदम्य शक्ति से सम्पन्न होती हैं। आपने चतुर विचारों वाले प्रमथाधिपति भगवान शंकर को अपना दूत बनाया, और दूषित कामनाओं तथा कुत्सित विचारों वाले दुर्बुद्धि दानवों के दूत भी आपको नहीं जान सके। आपकी जय हो, जय हो।(Mahishasura Mardini Stotram)


अयि शरणागत वैरिवधुवर वीरवराभय दायकरे

त्रिभुवनमस्तक शुलविरोधि शिरोऽधिकृतामल शुलकरे।

मिदुमितामर धुन्दुभिनाद महोमुखरीकृत दिङ्मकरे

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥६॥

अर्थ: हे महिषासुर मर्दिनी पार्वती, आप शरण में आए शत्रुओं की पत्नियों के वीर पतियों को अभय प्रदान करने वाली हैं। आप तीनों लोकों को पीड़ित करने वाले दैत्यों के मस्तक पर प्रहार करने के लिए तेजोमय त्रिशूल धारण करती हैं। देवताओं की दुंदुभियों की 'दुम्-दुम्' ध्वनि से समस्त दिशाओं को गुंजायमान करने वाली देवी, आपकी जय हो, जय हो ।(Mahishasura Mardini Stotram)


अयि निजहुङ्कृति मात्रनिराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशते

समरविशोषित शोणितबीज समुद्भव शोणित बीजलते।

शिवशिवशुम्भ निशुम्भमहाहव तर्पितभूत पिशाचरते

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥७॥

अर्थ: हे महिषासुर मर्दिनी पार्वती, आप अपने हुंकार मात्र से धूम्रलोचन और सैकड़ों अन्य असुरों को भस्म करने वाली हैं। युद्धभूमि में रक्तबीज के रक्त से उत्पन्न अन्य रक्तबीजों का रक्त पीने वाली, शुम्भ और निशुम्भ दैत्यों की बलि से शिव और भूत-पिशाचों के प्रति अनुराग रखने वाली, भगवान शिव की प्रिय पत्नी, महिषासुर मर्दिनी पार्वती! आपकी जय हो, जय हो। (Mahishasura Mardini Stotram)


धनुरनुषङ्ग रणक्षणसङ्ग परिस्फुरदङ्ग नटत्कटके

कनकपिशङ्ग पृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्ग हताबटुके।

कृतचतुरङ्ग बलक्षितिरङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुके

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥८॥

अर्थ: महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र में वर्णित एक श्लोक के अनुसार, रणभूमि में धनुष धारण कर अपने शरीर को केवल हिलाने मात्र से शत्रुदल को कम्पित कर देनेवाली, स्वर्ण के समान पीले रंग के तीर और तरकश से सज्जित, भीषण योद्धाओं के सिर काटनेवाली और हाथी, घोड़ा, रथ, पैदल—चारों प्रकार की सेनाओं का संहार करके रणभूमि में अनेक प्रकार की शब्दध्वनि करनेवाले बटुकों को उत्पन्न करनेवाली महिषासुर मर्दिनी पार्वती की महिमा का वर्णन है। (Mahishasura Mardini Stotram)


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सुरललना ततथेयि तथेयि कृताभिनयोदर नृत्यरते

कृत कुकुथः कुकुथो गडदादिकताल कुतूहल गानरते।

धुधुकुट धुक्कुट धिंधिमित ध्वनि धीर मृदंग निनादरते

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥९॥

अर्थ: हे महिषासुर मर्दिनी पार्वती, आप देवांगनाओं के तत-था-थेयि-थेयि आदि शब्दों से युक्त भावमय नृत्य में मग्न रहती हैं, कुकुथा आदि विभिन्न मात्राओं वाले तालों से युक्त आश्चर्यमय गीतों को सुनने में लीन रहती हैं, और मृदंग की धुधुकुट-धूधुट आदि गंभीर ध्वनियों को सुनने में तत्पर रहती हैं। भगवान शिव की प्रिय पत्नी महिषासुर मर्दिनी पार्वती की जय हो, जय हो। (Mahishasura Mardini Stotram)


जय जय जप्य जयेजयशब्द परस्तुति तत्परविश्वनुते

झणझणझिञ्झिमि झिङ्कृत नूपुर शिञ्जितमोहित भूतपते।

नटित नटार्ध नटी नट नायक नाटितनाट्य सुगानरते

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥१०॥

अर्थ: हे महिषासुर मर्दिनी पार्वती, आप जपनीय मंत्र की विजयशक्ति स्वरूपिणी हैं। आपकी बारंबार जय हो। आपकी स्तुति में समस्त संसार के लोग जय-जयकार शब्दों के साथ तत्पर रहते हैं। आपके नूपुरों की झंकार से भगवान शिव मोहित हो जाते हैं। आप नटों के नायक अर्धनारीश्वर शिव के नृत्य से सुसज्जित नाट्य को देखकर आनंदित होती हैं। भगवान शिव की प्रिय पत्नी महिषासुर मर्दिनी पार्वती की जय हो। जय हो। (Mahishasura Mardini Stotram)


अयि सुमनःसुमनःसुमनः सुमनःसुमनोहरकान्तियुते

श्रितरजनी रजनीरजनी रजनीरजनी करवक्त्रवृते।

सुनयनविभ्रमर भ्रमरभ्रमर भ्रमरभ्रमराधिपते

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥११॥

अर्थ: हे महिषासुर मर्दिनी पार्वती, आप प्रसन्नचित्त और संतुष्ट देवताओं द्वारा अर्पित पुष्पों से अत्यंत मनोहर कान्ति धारण करती हैं। आप निशाचरों को वर देने वाले भगवान शिव की प्रिय पत्नी हैं, रात्रिसूक्त से प्रसन्न होने वाली हैं, चन्द्रमा के समान मुखमण्डल वाली हैं, और सुंदर नेत्रों वाली हैं, जिनसे कस्तूरी मृगों में व्याकुलता उत्पन्न होती है। आप भ्रांति को दूर करने वाले ज्ञानी जनों द्वारा अनुसरण की जाती हैं। भगवान शिव की प्रिय पत्नी महिषासुर मर्दिनी पार्वती की जय हो, जय हो। (Mahishasura Mardini Stotram)


सहितमहाहव मल्लमतल्लिक मल्लितरल्लक मल्लरते

विरचितवल्लिक पल्लिकमल्लिक झिल्लिकभिल्लिक वर्गवृते।

शितकृतफुल्ल समुल्लसितारुण तल्लजपल्लव सल्ललिते

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥१२॥

अर्थ: हे महिषासुर मर्दिनी पार्वती, आप महायुद्ध के महान वीरों द्वारा घुमावदार और कलापूर्ण ढंग से चलाए गए भालों के युद्ध का निरीक्षण करने में मन लगाती हैं। आप कृत्रिम लतागृह का निर्माण कर उसकी देखभाल करने वाली, 'झिल्लिक' नामक वाद्य बजाने वाली भिल्लिनियों के समूह से सेवित होने वाली, और कान पर सुंदर रक्तवर्ण तथा कोमल पत्तों से सुशोभित होने वाली हैं। भगवान शिव की प्रिय पत्नी महिषासुर मर्दिनी (Mahishasura Mardini Stotram) पार्वती की जय हो, जय हो।


अविरलगण्ड गलन्मदमेदुर मत्तमतङ्ग जराजपते

त्रिभुवनभुषण भूतकलानिधि रूपपयोनिधि राजसुते।

अयि सुदतीजन लालसमानस मोहन मन्मथराजसुते

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥१३॥

अर्थ: हे महिषासुर मर्दिनी पार्वती, आप सुंदर दंतपंक्ति वाली स्त्रियों के मन को आकर्षित करने वाले कामदेव को जीवन प्रदान करने वाली हैं, निरंतर मद में चूर, गंडस्थल से युक्त मदोन्मत्त गजराज के समान मंद गति से चलने वाली हैं, और तीनों लोकों के आभूषण के रूप में चंद्रमा के समान कान्तियुक्त सागर कन्या के रूप में प्रतिष्ठित हैं। भगवान शिव की प्रिय पत्नी महिषासुर मर्दिनी पार्वती की जय हो, जय हो। (Mahishasura Mardini Stotram)


कमलदलामल कोमलकान्ति कलाकलितामल भाललते

सकलविलास कलानिलयक्रम केलिचलत्कल हंसकुले।

अलिकुलसङ्कुल कुवलयमण्डल मौलिमिलद्बकुलालिकुले

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥१४॥

अर्थ: हे महिषासुर मर्दिनी पार्वती, आप कमलदल के समान वक्र, निर्मल और कोमल कान्ति से परिपूर्ण चन्द्रमा से सुशोभित उज्ज्वल ललाट पटल धारण करने वाली हैं। आप सम्पूर्ण विलासों और कलाओं की आश्रयदाता, मन्दगति तथा क्रीड़ा से सम्पन्न राजहंसों के समुदाय से सुशोभित होने वाली, और भौंरों के समान काले तथा सघन केशपाश की चोटी पर शोभायमान मौलश्री पुष्पों की सुगन्ध से भ्रमर समूहों को आकृष्ट करने वाली हैं। भगवान शिव की प्रिय पत्नी महिषासुर मर्दिनी पार्वती की जय हो, जय हो।


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करमुरलीरव वीजितकूजित लज्जितकोकिल मञ्जुमते

मिलितपुलिन्द मनोहरगुञ्जित रञ्जितशैल निकुञ्जगते।

निजगुणभूत महाशबरीगण सद्गुणसम्भृत केलितले

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥१५॥

अर्थ: हे महिषासुर मर्दिनी पार्वती, आपके हाथ में मुरली की मधुर ध्वनि सुनकर, लज्जित कोयल के समान बोलना छोड़ देती हैं। आप भौंरों की गूंज से गूंजित पर्वतीय निकुंजों में विहार करती हैं, और अपने गणों के नृत्य और क्रीड़ों में सदा मग्न रहती हैं। भगवान शिव की प्रिय पत्नी महिषासुर मर्दिनी पार्वती की जय हो, जय हो। (Mahishasura Mardini Stotram)


कटितटपीत दुकूलविचित्र मयुखतिरस्कृत चन्द्ररुचे

प्रणतसुरासुर मौलिमणिस्फुर दंशुलसन्नख चन्द्ररुचे।

जितकनकाचल मौलिमदोर्जित निर्भरकुञ्जर कुम्भकुचे

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥१६॥

अर्थ: हे महिषासुर मर्दिनी पार्वती, आपके कटिप्रदेश पर सुशोभित पीले रेशमी वस्त्र की विचित्र कान्ति सूर्य की प्रभा को भी तिरस्कृत कर देती है। सुमेरु पर्वत के शिखर पर मदोन्मत्त हाथियों के गण्डस्थल के समान वक्षस्थल वाली, आपके चरणनखों में देवताओं और दैत्यों के मस्तक पर स्थित मणियों से निकली किरणों से प्रकाशित चन्द्रमा जैसी कान्ति विद्यमान है। भगवान शिव की प्रिय पत्नी महिषासुर मर्दिनी पार्वती की जय हो, जय हो। (Mahishasura Mardini Stotram)


विजितसहस्रकरैक सहस्रकरैक सहस्रकरैकनुते

कृतसुरतारक सङ्गरतारक सङ्गरतारक सूनुसुते।

सुरथसमाधि समानसमाधि समाधिसमाधि सुजातरते

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥१७॥

अर्थ: हे महिषासुर मर्दिनी पार्वती, आप सूर्य के सहस्रों किरणों और हजारों हस्त नक्षत्रों को पराजित करने वाले भगवान सूर्य की एकमात्र नमस्करणीय हैं। आप देवताओं के उद्धार हेतु युद्ध करने वाले, तारकासुर से संग्राम करने वाले, और संसार सागर से पार करने वाले शिवजी के पुत्र कार्तिकेय से प्रणाम की जाने वाली हैं। आप राजा सुरथ और समाधि नामक वैश्य की सविकल्प समाधि के समान समाधियों में सम्यक जपे जाने वाले मंत्रों में प्रेम रखने वाली हैं। भगवान शिव की प्रिय पत्नी महिषासुर मर्दिनी पार्वती की जय हो, जय हो। (Mahishasura Mardini Stotram)


पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवे

अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत्।

तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥१८॥

अर्थ: हे महिषासुर मर्दिनी पार्वती, आपकी करुणा और कल्याणमयी स्वरूप के कारण, जो भक्त प्रतिदिन आपके चरणकमल की उपासना करता है, उसे लक्ष्मी का आश्रय प्राप्त होता है। आपके चरणों में परम पद का अनुभव करने वाले भक्त के लिए सभी इच्छाएँ पूर्ण होती हैं। भगवान शिव की प्रिय पत्नी महिषासुर मर्दिनी पार्वती की जय हो, जय हो।

कनकलसत्कल सिन्धुजलैरनु षिञ्चतितेगुण रङ्गभुवम्

भजति स किं न शचीकुचकुम्भ तटीपरिरम्भ सुखानुभवम्।

तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवम्

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥१९॥

अर्थ: हे महिषासुर मर्दिनी पार्वती, आपके प्रांगण में स्वर्ण के समान चमकते घड़ों से जल छिड़ककर उसे स्वच्छ करने वाले भक्त को इन्द्राणी के समान विशाल वक्षस्थल वाली सुंदरियों का सान्निध्य सुख प्राप्त होता है। मैं आपके चरणों को अपनी शरणस्थली मानता हूँ; कृपया मुझे कल्याणकारी मार्ग प्रदान करें। भगवान शिव की प्रिय पत्नी महिषासुर मर्दिनी पार्वती की जय हो, जय हो।

तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयते

किमु पुरुहूतपुरीन्दु मुखी सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते।

मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुत क्रियते

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥२०॥

अर्थ: हे महिषासुर मर्दिनी पार्वती, आपके मुखचन्द्र की निर्मलता से जो भक्त आपको प्रसन्न करता है, उसे इन्द्रपुरी में निवास करने वाली चन्द्रमुखी सुंदरियाँ भी सुख प्रदान करने में असमर्थ होती हैं। भगवान शिव के सम्मान को अपना सर्वस्व मानने वाली भगवती, आपकी कृपा से सभी सिद्धियाँ संभव हैं। भगवान शिव की प्रिय पत्नी महिषासुर मर्दिनी पार्वती की जय हो, जय हो। (Mahishasura Mardini Stotram)


अयि मयि दीन दयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे

अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुमितासिरते।

यदुचितमत्र भवत्युररी कुरुतादुरुता पमपाकुरुते

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥२१॥

अर्थ: हे उमे! आप सदा दीन-दुखियों पर दया करने वाली हैं, अतः कृपया मुझ पर भी अपनी कृपा बनाए रखें। हे महालक्ष्मी! जैसे आप सम्पूर्ण संसार की माता हैं, वैसे ही मैं भी आपको अपनी माता मानता हूँ। हे शिवे! यदि आपको उचित लगे, तो मुझे अपने दिव्य लोक में जाने की योग्यता प्रदान करें। हे देवी! मुझ पर अपनी दया दृष्टि बनाए रखें। भगवान शिव की प्रिय पत्नी महिषासुर मर्दिनी पार्वती की जय हो, जय हो।


स्तुतिमिमां स्तिमित: सुसमाधिना नियमतो यमतोsनुदिनं पठेत्।

प्रिया रम्या स निषेवते परिजनोऽरिजनोऽपि च तं भजेत् ॥२२॥

अर्थ: जो व्यक्ति शांतचित्त होकर, मन को पूरी तरह एकाग्र करके, इन्द्रियों पर नियंत्रण रखते हुए नियमित रूप से प्रतिदिन इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसके घर में भगवती महालक्ष्मी का सदैव वास रहता है, और उसके परिवार तथा शत्रुजन भी सदा उसकी सेवा में तत्पर रहते हैं।

॥ महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र सम्पूर्णं॥


निष्कर्ष 

महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र (Mahishasura Mardini Stotram) का नियमित पाठ करने से अनेक लाभ प्राप्त होते हैं। यह स्तोत्र मां दुर्गा की महिमा का वर्णन करता है, जिनकी उपासना से समस्त कष्ट दूर होते हैं। प्रतिदिन इस स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति की आर्थिक स्थिति में सुधार होता है, और वह दरिद्रता से मुक्त रहता है। साथ ही, यह स्तोत्र सभी मनोकामनाओं की पूर्ति में सहायक होता है।


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