Shree Narayan Ashtakam : हिंदू परंपराओं में श्री नारायण अष्टकम का नियमित पाठ भगवान विष्णु की कृपा पाने का एक सरल और प्रभावी उपाय माना जाता है। मान्यता है कि यदि इसे सुबह स्नान के बाद भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र के सामने पूरे श्रद्धा भाव से पढ़ा जाए, तो इसका शुभ प्रभाव और अधिक बढ़ जाता है। साथ ही, जब भक्त इस स्तोत्र का अर्थ समझकर इसका पाठ करते हैं, तो उनका आध्यात्मिक जुड़ाव और भी गहरा हो जाता है।
यह अष्टकम छोटा होने के बावजूद बहुत प्रभावशाली माना जाता है। इसमें केवल 8 श्लोक हैं और इसे पढ़ने में लगभग 10 मिनट का समय लगता है, जिससे इसे दैनिक जीवन में शामिल करना आसान हो जाता है। पाठ से पहले अंगन्यास और करन्यास की विधि की जाती है, जिसमें भगवान का ध्यान अपने शरीर के विभिन्न अंगों में किया जाता है। यह प्रक्रिया सरल है और थोड़ी सी जानकारी के साथ कोई भी इसे सीख सकता है। इसके बाद भक्त शांत मन और पूर्ण भक्ति के साथ अष्टकम का पाठ करते हैं।
शास्त्रों में भगवान विष्णु को सृष्टि का पालन करने वाला और पूरे ब्रह्मांड का आधार माना गया है। ऐसा विश्वास है कि जीवन के सुख और दुख का संतुलन भी उनके ही हाथों में होता है। यही कारण है कि श्री नारायण अष्टकम (Shree Narayan Ashtakam) का पाठ भगवान की उपासना में विशेष महत्व रखता है। माना जाता है कि इस स्तोत्र की रचना आदि शंकराचार्य ने की थी और यह भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है, इसलिए इसका नियमित पाठ जीवन में शांति और संतुलन लाने में सहायक माना जाता है।
वात्सल्यदाभयप्रदानसमयादतार्तिनिर्वापना--
दौदार्यदाघशोष्णदगणितश्रेयः पादप्रपनात् |
सेव्यः श्रीपतिरेक एव जगतमेते:'भवत्साक्षीणः
प्रह्लादश्च विभीषणश्च कारिरत पंचाल्याहल्याध्रुवः || 1 ||
अर्थ: भगवान लक्ष्मीपति अपनी असीम करुणा के कारण भयभीतों को निर्भयता प्रदान करते हैं, दुःखी जनों के कष्ट दूर करते हैं और अपनी उदारता से पापों का नाश करते हैं। उनके ऐसे अनगिनत कल्याणकारी गुणों के कारण वे सम्पूर्ण जगत के लिए आराध्य और सेवनीय हैं।
प्रह्लाद, विभीषण, गजराज, द्रौपदी, अहल्या और ध्रुव जैसे भक्तों के जीवन इसके प्रमाण हैं, जिन्होंने संकट के समय भगवान की शरण लेकर उनकी कृपा का अनुभव किया।

प्रह्लादस्ति यदिश्वरो वदा हरिः सर्वत्र मे दर्शन
स्तम्भे चैवमिति ब्रुवन्तमासुरं तत्रविरासिद्धधारीः |
वक्षास्तस्य विद्यानिजनखैरवत्सल्यमापादय-
-नर्तत्राणपरायण: स भगवाननारायणो मे गति: || 2 ||
अर्थ : जब दैत्य हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद से कहा—“यदि तुम्हारा ईश्वर हर जगह है, तो मुझे इस खंभे में भी दिखाओ,” तभी उसी क्षण भगवान वहाँ प्रकट हो गए। उन्होंने अपने नखों से हिरण्यकशिपु का अंत कर दिया और प्रह्लाद की रक्षा करते हुए अपने भक्त के प्रति प्रेम को प्रकट किया। ऐसे दीनों के रक्षक भगवान नारायण ही मेरी एकमात्र शरण हैं।
श्रीरामो:'त्र विभीषणो:'यमनघो रक्षोभयदगतः
सुग्रीवनाय पालयैनमधुना पौलस्त्यमेवगतम् |
इत्युक्त्वा:'भयमस्य सर्वविदितं यो राघवो दत्तवान्
अर्तत्राणपरायण: स भगवाननारायणो मे गति: || 3 ||
अर्थ : “हे श्रीराम! यह निष्पाप विभीषण रावण के भय से आपकी शरण में आया है।” यह सुनते ही प्रभु ने कहा—“हे सुग्रीव, इसे तुरंत सम्मानपूर्वक यहाँ लाओ और इसे पूर्ण सुरक्षा प्रदान करो।” इस प्रकार श्रीराम ने विभीषण को निडर होकर शरण दी और उसे अपनाया। ऐसे दीनों का संरक्षण करने वाले भगवान नारायण ही मेरी एकमात्र शरण हैं।
नाक्राग्रस्तपादं समुद्धृतकारं ब्रह्मादयो भोः सुरा
रक्षन्तमिति दिनवाक्याकारिणं देवेश्वशक्तेषु यः |
मा भैषृति तस्य नकराहणने चक्रायुधः श्रीधरो
ह्यर्तत्राणपरायणः स भगवाननारायणो मे गतिः || 4 ||
अर्थ : जब गजेन्द्र का पैर मगर (ग्राह) ने पकड़ लिया, तब उसने व्याकुल होकर सूँड़ उठाई और पुकारा—“हे ब्रह्मा सहित सभी देवताओं! मेरी रक्षा करें।” लेकिन जब कोई भी उसकी सहायता नहीं कर सका, तब भगवान श्रीहरि ने स्वयं प्रकट होकर उसे आश्वासन दिया—“मत डरो।” इसके बाद उन्होंने सुदर्शन चक्र से ग्राह का संहार कर गजेन्द्र को मुक्त किया। ऐसे दीनों के रक्षक भगवान नारायण ही मेरी सच्ची शरण हैं।
भू कृष्णच्युत भो कृपालय हरे भू पांडवानां सखे
क्वासि क्वासि सुयोधनाद्यापहृतम् भो रक्ष मामतुरम् |
इत्युक्तो:'क्षयवस्त्रसम्भृततनुर्यो:'पालयद्दद्रौपदिम
आर्तत्रणपरायण: स भगवाननारायणो मे गति: || 5 ||
अर्थ : “हे कृष्ण, हे अच्युत, हे करुणामय प्रभु, हे हरे, हे पांडवों के सखा! आप कहाँ हैं? मुझे इस विपत्ति से बचाइए, मेरी रक्षा कीजिए!” — जब द्रौपदी ने इस तरह व्याकुल होकर पुकारा, तब भगवान ने उसकी लाज की रक्षा करते हुए उसे अक्षय वस्त्र प्रदान किए। जो हर दुखी और असहाय की सहायता के लिए सदैव तत्पर रहते हैं, वही भगवान नारायण मेरी एकमात्र शरण हैं।
यत्पादबजनाखोदकं त्रिजगतं पापौघविधवंशं
यन्नमामृतपूरकं च पिबतं संसारसंतरकम् |
पाषाणो:'पि यदंघृपद्मराजसा शापानमुनेर्मोसिटो
ह्यर्तत्रणपरायण: स भगवाननारायणो मे गति: || 6 ||
अर्थ : जिनके चरण कमलों के नखों से निकला पवित्र जल गंगाजी के रूप में तीनों लोकों के पापों को हरने की शक्ति रखता है, जिनके नाम का अमृत समान स्मरण भक्तों को संसार रूपी सागर से पार लगाने में सहायक होता है, और जिनके चरणों की धूल से पत्थर भी ऋषि के शाप से मुक्त हो गया—ऐसे दीनों के पालनहार भगवान नारायण ही मेरी सच्ची शरण हैं।
पित्र भ्रातरमुत्तमसनगतं ह्युत्तानपादिर्ध्रुवो
दृष्ट्वा तत्सममारूक्षुराधिकं मात्रा:'वामनं गतः |
यं गत्वा शरणं यदप तपसा हेमाद्रिसिंहासनं
ह्यर्तत्राणपरायणः स भगवाननारायणो मे गतिः || 7 ||
अर्थ : जब राजा उत्तानपाद के पुत्र ध्रुव ने अपने भाई को पिता के साथ राजसिंहासन पर बैठे देखा, तो उनके मन में भी वहां बैठने की इच्छा जागी। लेकिन जब उन्होंने आगे बढ़कर ऐसा करना चाहा, तो पिता ने उन्हें गोद में नहीं लिया और उनकी सौतेली माता ने भी उन्हें अपमानित किया। उस अपमान से आहत होकर ध्रुव ने भगवान नारायण की शरण ली और कठोर तपस्या के बल पर उन्होंने सुमेरु के समान उच्च स्थान प्राप्त किया। ऐसे दीनों के रक्षक भगवान नारायण ही मेरी एकमात्र शरण हैं।
अर्ता विषानाः शीतलाश्च भीता
घोरेषु च व्यादिषु वर्तमानः |
सांकीर्त्य नारायणशब्दमात्रं
विमुक्तदुःखाः सुखिनो भवन्ति || 8 ||
अर्थ : जो लोग दुख, चिंता, निराशा या भय से घिरे हुए हैं, या किसी कठिन परिस्थिति का सामना कर रहे हैं, उनके लिए ‘नारायण’ नाम का स्मरण ही एक बड़ा सहारा बन सकता है। श्रद्धा के साथ इस नाम का उच्चारण करने से मन को शांति मिलती है और जीवन के कष्ट धीरे-धीरे कम होने लगते हैं।
इसी के साथ श्री कूरेशस्वामी द्वारा रचित “श्री नारायणाष्टकम्” स्तोत्र का समापन होता है, जो भक्ति और आस्था का सुंदर संदेश देता है।
इति श्री कुरेशस्वामी कृत श्री नारायणाष्टकम् |
जो लोग जीवन में आर्थिक स्थिरता और प्रगति की इच्छा रखते हैं, लेकिन बार-बार प्रयास करने के बाद भी अपेक्षित सफलता नहीं मिल पा रही है, उनके लिए श्री नारायण अष्टकम (Shree Narayan Ashtakam) का पाठ विशेष रूप से उपयोगी माना गया है।
यह हमें यह सीख देता है कि सच्ची आस्था और विश्वास के साथ किया गया जप जीवन को संतुलित, सुखमय और समृद्ध बना सकता है। इसलिए, यदि इसे सही भावना और विधि के साथ अपनाया जाए, तो यह आध्यात्मिक विकास का एक सरल और सार्थक मार्ग बन सकता है।
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