Rin Mochak Mangal Stotra : ऋण मोचक मंगल स्तोत्रम एक प्राचीन संस्कृत स्तुति है, जो भगवान मंगल को समर्पित है। हिंदू मान्यताओं में मंगल ग्रह को नवग्रहों में एक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है और इसे शक्ति, साहस तथा ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। कहा जाता है कि इस स्तोत्र की रचना ऋषि दुर्वासा ने की थी।
“ऋण मोचक” का अर्थ है—ऐसा जो व्यक्ति को ऋणों से मुक्ति दिलाए। यहां ऋण केवल आर्थिक ही नहीं, बल्कि मानसिक, आध्यात्मिक और कर्मों से जुड़े बंधनों को भी दर्शाता है। ऐसा विश्वास है कि इस स्तोत्र (Rin Mochak Mangal Stotra) का श्रद्धा के साथ पाठ करने से व्यक्ति को इन सभी प्रकार के ऋणों से राहत मिल सकती है।
ज्योतिष के अनुसार, यदि कुंडली में मंगल की स्थिति अनुकूल हो, तो व्यक्ति को साहस, आत्मविश्वास, ऊर्जा और जीवन में आगे बढ़ने की शक्ति मिलती है। साथ ही, यह ग्रह दुर्घटनाओं, बाधाओं और शत्रुओं से रक्षा करने में भी सहायक माना जाता है। इसलिए मंगल देव की आराधना और ऋण मोचक मंगल स्तोत्र का पाठ (Rin Mochak Mangal Stotra) विशेष रूप से लाभकारी माना जाता है।
श्री मङ्गलाय नमः ॥
मङ्गलो भूमिपुत्रश्च ऋणहर्ता धनप्रदः ।
स्थिरासनो महाकयः सर्वकर्मविरोधकः ॥1॥
अर्थ:
हे मंगल देव! शास्त्रों में आपके अनेक दिव्य नामों का वर्णन मिलता है, जिनमें प्रत्येक नाम आपके विशेष गुणों को दर्शाता है। आपका पहला नाम “मंगल” है, जो शुभता का प्रतीक है। दूसरा “भूमिपुत्र” है, अर्थात पृथ्वी से उत्पन्न होने वाले। तीसरा नाम “ऋणहर्ता” है, जो सभी प्रकार के कर्ज से मुक्ति दिलाने वाले हैं। चौथा “धनप्रद” है, जो धन और समृद्धि प्रदान करते हैं। पाँचवां “स्थिरासन” है, जो अपनी स्थिति में अटल और दृढ़ रहते हैं। छठा “महाकाय” है, जो आपके विशाल स्वरूप को दर्शाता है। और सातवां “सर्वकामावरोधक” है, जो जीवन में आने वाली बाधाओं को दूर करके इच्छाओं की पूर्ति में सहायक होते हैं।

लोहितो लोहिताक्षश्च सामगानां कृपाकरः ।
धरात्मजः कुजो भौमो भूतिदो भूमिनन्दनः॥2॥
अर्थ:
हे मंगल देव! आपके अन्य दिव्य नाम भी आपके विभिन्न स्वरूपों और गुणों को दर्शाते हैं। आपका आठवां नाम “लोहित” है, जो आपके लाल वर्ण को प्रकट करता है, और नौवां “लोहितांग”, जो इसी विशेषता को और स्पष्ट करता है। दसवां नाम “सामगानां” है, जिसका अर्थ है वे जो सामवेद के ज्ञाता ब्राह्मणों पर अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखते हैं। ग्यारहवां नाम “धरात्मज” है, अर्थात जो पृथ्वी के गर्भ से उत्पन्न हुए हैं। बारहवां “कुज” और तेरहवां “भौम” भी आपके ही स्वरूप को दर्शाते हैं। चौदहवां नाम “भूतिद” है, जो ऐश्वर्य और समृद्धि प्रदान करने वाले हैं, और पंद्रहवां “भूमि नंदन” है, जो पृथ्वी को आनंद देने वाले माने जाते हैं।
अङ्गारको यमश्चैव सर्वरोगापहारकः ।
व्रुष्टेः कर्ताऽपहर्ता च सर्वकामफलप्रदः॥3॥
अर्थ:
हे मंगल देव! आपके शेष नाम भी आपके विविध स्वरूपों और शक्तियों को प्रकट करते हैं। सोलहवां नाम “अंगारक” है, जो आपके तेजस्वी और उग्र रूप को दर्शाता है। सत्रहवां नाम “यम” है, जो आपके न्यायप्रिय स्वरूप का संकेत देता है। अठारवां नाम “सर्वरोग पहारक” है, अर्थात आप सभी प्रकार के रोग और कष्टों को दूर करने वाले हैं। उन्नीसवां नाम “वृष्टिकर्ता” है, जो वर्षा कराने की शक्ति का प्रतीक है, जबकि बीसवां नाम “वृष्टिहर्ता” है, जो आवश्यकतानुसार वर्षा को रोकने की क्षमता को दर्शाता है। इक्कीसवां और अंतिम नाम “सर्वकाम फलप्रदा” है, जिसका अर्थ है कि आप अपने भक्तों की सभी इच्छाओं को पूर्ण करने वाले हैं।
एतानि कुजनामनि नित्यं यः श्रद्धया पठेत् ।
ऋणं न जायते तस्य धनं शीघ्रमवाप्नुयात् ॥4॥
अर्थ:
हे मंगल देव! जो व्यक्ति आपके इन इक्कीस नामों का सच्चे मन और पूर्ण श्रद्धा के साथ स्मरण करता है, वह जीवन में ऋण और आर्थिक परेशानियों से मुक्त होने लगता है। आपकी कृपा से उसे धन-समृद्धि की प्राप्ति होती है और उसके जीवन में सुख-समृद्धि का विस्तार होता है।
धरणीगर्भसम्भूतं विद्युत्कान्तिसमप्रभम् ।
कुमारं शक्तिहस्तं च मङ्गलं प्रणमाम्यहम् ॥5॥
अर्थ:
हे मंगल देव! आप पृथ्वी के गर्भ से प्रकट हुए हैं और आपकी तेजस्वी आभा आकाश में चमकती बिजली के समान दमकती है। आप अद्भुत शक्ति और ऊर्जा के स्वामी हैं। ऐसे पराक्रमी और दिव्य स्वरूप वाले कुमार मंगल देव को मैं श्रद्धा से नमन करता हूँ।
स्तोत्रमङ्गारकस्यैतत्पठनीयं सदा नृभिः ।
न तेषां भौमजा पीडा स्वल्पाऽपि भवति क्वचित् ॥6॥
अर्थ:
हे मंगल देव! आपके इस मंगल स्तोत्र का पाठ व्यक्ति को निर्मल मन, सच्ची श्रद्धा और पूर्ण आस्था के साथ करना चाहिए। जब कोई भक्त एकाग्रता से इसका पाठ करता है और इसे दूसरों को भी सुनाता है, तो उसके जीवन की बाधाएं और कष्ट धीरे-धीरे समाप्त होने लगते हैं।
अङ्गारक महाभाग भगवन्भक्तवत्सल ।
त्वां नमामि ममाशेषमृणमाशु विनाशय ॥7॥
अर्थ:
हे अंगारक! अग्नि के समान तेजस्वी और प्रभावशाली, हे पूजनीय और ऐश्वर्य से युक्त देव, जो अपने भक्तों पर स्नेह बरसाते हैं—हम आपको श्रद्धा से प्रणाम करते हैं। आप हमारी प्रार्थना स्वीकार करें और हमारे जीवन से ऋण का भार समाप्त कर हमें कर्ज से मुक्त करें।
ऋणरोगादिदारिद्रयं ये चान्ये ह्यपमृत्यवः ।
भयक्लेशमनस्तापा नश्यन्तु मम सर्वदा ॥8॥
अर्थ:
हे मंगल देव! यदि मेरे ऊपर किसी प्रकार का ऋण या बकाया हो, तो कृपा करके उसे समाप्त करें। यदि कोई रोग या शारीरिक कष्ट हो, तो उसे भी दूर करें। मेरे जीवन से गरीबी को हटाकर अकाल मृत्यु के भय से रक्षा करें। साथ ही, मेरे मन में जो भी डर, दुख या क्लेश हैं, उन्हें भी अपनी कृपा से हमेशा के लिए समाप्त कर दें।
अतिवक्त्र दुरारार्ध्य भोगमुक्त जितात्मनः ।
तुष्टो ददासि साम्राज्यं रुश्टो हरसि तत्ख्शणात् ॥9॥
अर्थ:
हे मंगल देव! आपको प्रसन्न करना आसान नहीं माना जाता, लेकिन जब आप किसी पर कृपा करते हैं, तो उसे जीवन में हर प्रकार का सुख और समृद्धि प्राप्त होती है। वहीं, यदि आप रुष्ट हो जाएं, तो व्यक्ति के जीवन में बड़े उतार-चढ़ाव आ सकते हैं। इसलिए आपकी कृपा बनाए रखना ही जीवन के संतुलन और सफलता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
विरिंचिशक्रविष्णूनां मनुष्याणां तु का कथा ।
तेन त्वं सर्वसत्त्वेन ग्रहराजो महाबलः ॥10॥
अर्थ:
हे प्रभु! जब आप किसी से अप्रसन्न होते हैं, तो आपकी दृष्टि से उसका वैभव और सामर्थ्य कम होने लगता है। कहा जाता है कि आपके रुष्ट होने पर बड़े-बड़े देवताओं तक की शक्तियाँ भी प्रभावित हो सकती हैं, तो साधारण मनुष्य का क्या कहना। आप अत्यंत शक्तिशाली और सर्वोच्च अधिकार रखने वाले देव हैं, इसलिए आपकी कृपा ही जीवन में स्थिरता और उन्नति का आधार मानी जाती है।
पुत्रान्देहि धनं देहि त्वामस्मि शरणं गतः ।
ऋणदारिद्रयदुःखेन शत्रूणां च भयात्ततः ॥11॥
अर्थ:
हे प्रभु! मैं आपकी शरण में आया हूँ और आपसे विनम्र प्रार्थना करता हूँ कि मेरी मनोकामनाओं को पूर्ण करें तथा मुझे संतान सुख का आशीर्वाद दें। मेरे जीवन से सभी प्रकार के ऋण और आर्थिक परेशानियों को दूर करें, ताकि मुझे कभी किसी के सामने हाथ न फैलाना पड़े। मेरी दरिद्रता को समाप्त कर मेरे जीवन को सुख और समृद्धि से भर दें। साथ ही, मेरे सभी कष्टों और मानसिक क्लेशों का नाश करें तथा शत्रुओं के भय से मुझे मुक्त करके सुरक्षित और निडर जीवन प्रदान करें।
एभिर्द्वादशभिः श्लोकैर्यः स्तौति च धरासुतम् ।
महतिं श्रियमाप्नोति ह्यपरो धनदो युवा ॥12॥
अर्थ:
जो व्यक्ति इस बारह श्लोकों से युक्त ऋणमोचक मंगल स्तोत्र का श्रद्धा और विश्वास के साथ पाठ करता है, उस पर मंगल देव की विशेष कृपा बनी रहती है। उनकी कृपा से जीवन में धन-धान्य और समृद्धि का आगमन होता है, और व्यक्ति आर्थिक रूप से सशक्त बनता है। साथ ही, ऐसा माना जाता है कि उसे स्वस्थ और ऊर्जावान जीवन का आशीर्वाद भी प्राप्त होता है।
॥ इति श्री ऋणमोचक मङ्गलस्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥
ऋणमोचक मंगल स्तोत्र का नियमित और श्रद्धा के साथ किया गया पाठ व्यक्ति के जीवन में कई सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है। इसके प्रमुख लाभ इस प्रकार माने जाते हैं:
ऋणमोचक मंगल स्तोत्र का पाठ (Rin Mochak Mangal Stotra) सही विधि और भावना के साथ किया जाए, तो इसका प्रभाव अधिक फलदायी माना जाता है। इसके लिए आप निम्न सरल विधि अपना सकते हैं:
इस प्रकार श्रद्धा, नियम और सही विधि के साथ किया गया ऋणमोचक मंगल स्तोत्र का पाठ जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने में सहायक हो सकता है।
यह स्तोत्र हमें यह सिखाता है कि धैर्य, आस्था और सही प्रयास के साथ हम जीवन की कठिनाइयों को पार कर सकते हैं। इसलिए, यदि इसे अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना लिया जाए, तो यह धीरे-धीरे जीवन में स्थिरता, समृद्धि और सुख का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।
यह भी पढ़ें - Kanakadhara Stotram: धन प्राप्ति एवं माँ लक्ष्मी की कृपा के लिए करे इस स्तोत्र का पाठ