जीवन के कठिन दौर में जब रास्ते बंद दिखाई देने लगें और मन दुविधाओं से घिर जाए, तब विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश की शरण ही हमें नई दिशा और संबल प्रदान करती है। सनातन परंपरा में चतुर्थी तिथि का व्रत संकटों को दूर करने और कामनाओं को सिद्ध करने के लिए सर्वोत्तम माना गया है। इस पावन अवसर को हम कृच्छ्र चतुर्थी 2026 (Krichra Chaturthi 2026) के रूप में मनाते हैं।
मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष की गणेश चतुर्थी तिथि को हम कृच्छ्र चतुर्थी के पावन नाम से जानते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह व्रत बड़े से बड़े संकटों, शारीरिक कष्टों और जाने-अनजाने में हुए पापों का नाश करने वाला है। यदि आप भी विघ्नहर्ता की असीम कृपा प्राप्त करना चाहते हैं, तो कृच्छ्र चतुर्थी 2026 की तिथि (Krichra Chaturthi 2026) का यह पावन अवसर आपके लिए अत्यंत फलदायी साबित हो सकता है। आइए जानते हैं इस पावन व्रत की सही तिथि, पूजा का शुभ मुहूर्त, गणेश चतुर्थी पूजा विधि (Ganesh Chaturthi Puja Vidhi) और इसका पौराणिक महत्व।
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वैदिक पंचांग के अनुसार, मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को कृच्छ्र चतुर्थी कहा जाता है। 'कृच्छ्र' शब्द का अर्थ होता है कठिन से कठिन कष्टों का निवारण करने वाला।
यह पावन पर्व बुद्धि, रिद्धि और सिद्धि के दाता भगवान श्री गणेश को पूर्ण रूप से समर्पित है। इस दिन श्रद्धालु बप्पा को प्रसन्न करने के लिए उपवास रखते हैं और रात में चंद्रमा को अर्घ्य देकर अपने व्रत का पारण करते हैं। मान्यता है कि जो भक्त इस दिन पूरी निष्ठा से भगवान गणेश की पूजा (Lord Ganesha Worship) करते हैं, उनके जीवन से बड़े से बड़े विघ्न पल भर में दूर हो जाते हैं।
कृच्छ्र चतुर्थी का व्रत सही तिथि, विनायक पूजा मुहूर्त और चंद्रदर्शन के समय रखना अत्यंत फलदायी माना जाता है। वर्ष में कृच्छ्र चतुर्थी 2026 (Krichra Chaturthi 2026) तिथि और शुभ मुहूर्त की विस्तृत जानकारी नीचे दी गई है:
कृच्छ्र चतुर्थी तिथि (Krichra Chaturthi 2026 Date): 12 दिसंबर 2026, शनिवार
मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्थी प्रारंभ: 12 दिसंबर 2026 को प्रातः 07:15 बजे से
मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्थी समाप्त: 13 दिसंबर 2026 को प्रातः 08:30 बजे तक
विनायक गणेश पूजा मुहूर्त: 12 दिसंबर 2026 को सुबह 11:12 बजे से दोपहर 01:18 बजे तक
संध्या चंद्रोदय (अर्घ्य) समय: 12 दिसंबर 2026 को रात 08:45 बजे (स्थान अनुसार समय में हल्का अंतर संभव)
उदयातिथि और चतुर्थी तिथि के समय के अनुसार, कृच्छ्र चतुर्थी का व्रत (Krichra Chaturthi Vrat) 12 दिसंबर 2026 को ही रखा जाएगा।
हिंदू धर्मग्रंथों में कृच्छ्र चतुर्थी के व्रत का महत्व अत्यंत विशेष बताया गया है। गणेश पुराण के अनुसार, मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्थी का यह व्रत व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक तापों को नष्ट कर देता है।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से, भगवान गणेश प्रथम पूज्य हैं और हमारे मूलाधार चक्र के स्वामी हैं। कृच्छ्र चतुर्थी पर गणेश जी की उपासना करने से व्यक्ति की बुद्धि निर्मल होती है, कार्यों में आ रही रुकावटें खत्म होती हैं और निर्णय लेने की क्षमता में अद्भुत सुधार आता है। यह व्रत केवल एक उपवास नहीं, बल्कि अपने अहंकार को गणेश जी के चरणों में त्यागकर सात्विक जीवन अपनाने का एक पावन संकल्प है।

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कृच्छ्र चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की पूजा भक्तिभाव से इस प्रकार करें:
प्रातः काल स्नान और संकल्प: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और लाल या पीले रंग के स्वच्छ वस्त्र पहनें। इसके बाद हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर भगवान गणेश के सामने गणेश चतुर्थी व्रत (Ganesh Chaturthi Vrat) का संकल्प लें।
पूजा स्थल की तैयारी: घर के मंदिर को साफ करें और एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
अभिषेक और श्रृंगार: गणेश जी को गंगाजल से स्नान कराएं। तत्पश्चात उन्हें रोली, सिंदूर, अक्षत और चंदन अर्पित करें।
दूर्वा और मोदक अर्पण: बप्पा की पूजा में 21 दूर्वा (हरी घास) की गांठ बनाकर चढ़ाएं। इसके साथ ही उन्हें मोदक, बेसन के लड्डू और पीले फूल अर्पित करें।
मंत्र जप और कथा पढ़ना: "ॐ गं गणपतये नमः" मंत्र का 108 बार जप करें और कृच्छ्र चतुर्थी की व्रत कथा का श्रद्धापूर्वक पाठ करें।
चंद्रमा को अर्घ्य: रात में चंद्रमा निकलने पर तांबे के लोटे में जल, दूध, चंदन और अक्षत मिलाकर चंद्रदेव को अर्घ्य दें।
आरती और पारण: अंत में गणेश जी की आरती करें और मोदक का प्रसाद बांटकर स्वयं फलाहार के साथ व्रत का पारण करें।
इस दिन प्रातः काल से लेकर चंद्रदर्शन तक पूर्ण रूप से सात्विक रहें।
व्रत में नमक का सेवन करने से बचें, बहुत आवश्यकता होने पर सेंधा नमक ले सकते हैं।
मन में किसी के प्रति द्वेष, क्रोध या कटु विचार न लाएं।
घर आए किसी अतिथि या भिक्षुक का अपमान बिल्कुल न करें।
विघ्न और संकटों का नाश: जीवन में आ रहे पुराने से पुराने संकट और अदृश्य बाधाएं समाप्त होती हैं।
बुद्धि और विद्या में वृद्धि: छात्रों के लिए यह व्रत एकाग्रता और ज्ञान प्रदान करने वाला माना गया है।
आरोग्य की प्राप्ति: शारीरिक कष्टों, असाध्य रोगों और मानसिक तनाव से राहत मिलती है।
सुख और समृद्धि: घर में रिद्धि-सिद्धि का वास होता है और धन-धान्य की कमी नहीं रहती।
क्या करें:
भगवान गणेश को 21 दूर्वा अवश्य चढ़ाएं।
गरीब या जरूरतमंद बच्चों को मोदक, तिल या फल बांटें।
गणेश चालीसा या गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करें।
क्या न करें:
चतुर्थी के दिन तुलसी के पत्ते गणेश जी को बिल्कुल न चढ़ाएं।
तामसिक भोजन जैसे लहसुन, प्याज, मांस या मदिरा का सेवन न करें।
चमड़े की बनी वस्तुएं पहनकर पूजा न करें।
पौराणिक कृच्छ्र चतुर्थी व्रत कथा (Krichra Chaturthi Vrat Katha) के अनुसार, एक बार देवताओं पर बहुत बड़ा संकट आ पड़ा। असुरों के अत्याचार से तंग आकर सभी देवता भगवान शिव के पास कैलाश पर्वत पहुँचे और अपनी रक्षा की गुहार लगाने लगे। उस समय भगवान शिव के पास उनके दोनों पुत्र कार्तिकेय और गणेश भी विराजमान थे।
भगवान शिव ने दोनों बालकों से पूछा कि तुम दोनों में से कौन देवताओं के इस महान संकट को दूर कर सकता है? कार्तिकेय और गणेश दोनों ने ही स्वयं को समर्थ बताया। तब शिव जी ने एक परीक्षा रखी और कहा कि तुम दोनों में से जो भी सबसे पहले इस संपूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा करके आएगा, वही देवताओं की मदद करने जाएगा।
कार्तिकेय जी तुरंत अपने वाहन मयूर पर सवार होकर पृथ्वी की परिक्रमा के लिए निकल पड़े। परंतु गणेश जी का वाहन छोटा सा मूसक (चूहा) था और उनका शरीर स्थूल था। गणेश जी ने अपनी तीव्र बुद्धि का प्रयोग किया। वे उठे और उन्होंने अपने पिता शिव और माता पार्वती की भक्तिभाव से सात बार परिक्रमा की और हाथ जोड़कर खड़े हो गए।
जब शिव जी ने इसका कारण पूछा, तो गणेश जी ने नम्रता से कहा कि माता-पिता के चरणों में ही समस्त ब्रह्मांड का वास है, इसलिए मैंने पूरे संसार की परिक्रमा कर ली है। भगवान शिव गणेश जी की इस बुद्धि और पितृभक्ति से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने गणेश जी को देवताओं के संकट दूर करने भेजा और आशीर्वाद दिया कि मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्थी को जो भी तुम्हारा पूजन करेगा, उसके सारे 'कृच्छ्र' यानी संकट समाप्त हो जाएंगे।
कृच्छ्र चतुर्थी का यह पावन व्रत हमें सिखाता है कि श्रद्धा, बुद्धि और माता-पिता के प्रति समर्पण से बड़े से बड़ा संकट भी टाला जा सकता है। विघ्नहर्ता गणेश केवल भक्तों के कष्टों को ही नहीं हरते, बल्कि उन्हें जीवन में सफलता और शांति का मार्ग भी दिखाते हैं। यदि आप भी अपनी परेशानियों से मुक्ति चाहते हैं, तो कृच्छ्र चतुर्थी 2026 (Krichra Chaturthi 2026) पर पूरे विश्वास के साथ बप्पा की आराधना करें। भगवान गणेश आपके जीवन के सभी विघ्न हरकर खुशियों का संचार करेंगे।
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Q1: कृच्छ्र चतुर्थी 2026 (Krichra Chaturthi 2026) में कब है?
कृच्छ्र चतुर्थी का व्रत 12 दिसंबर 2026, शनिवार के दिन रखा जाएगा।
Q2: कृच्छ्र चतुर्थी 2026 (Krichra Chaturthi 2026) पर किसकी पूजा की जाती है?
इस दिन मुख्य रूप से विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश की पूजा की जाती है और रात में चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है।
Q3: क्या गणेश जी की पूजा में तुलसी चढ़ाई जा सकती है?
नहीं, पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान गणेश की पूजा में तुलसी का प्रयोग पूरी तरह से वर्जित होता है।
Q4: कृच्छ्र चतुर्थी व्रत का पारण कब और कैसे करें?
रात में चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद गणेश जी की आरती करें और मोदक या फलाहार ग्रहण करके व्रत का पारण करें।
Q5: गणेश जी को दूर्वा चढ़ाते समय क्या ध्यान रखना चाहिए?
गणेश जी को हमेशा 21 दूर्वा की गांठ बनाकर उनके मस्तक पर अर्पित करनी चाहिए, चरणों में नहीं।
Neha Jain is a festival writer with 7+ years’ experience explaining Indian rituals, traditions, and their cultural meaning, making complex customs accessible and engaging for today’s modern readers.