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August 4, 2026 Blog

Ahoi Ashtami 2026: जानिए सही तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, कथा और नियम

BY : Neha Jain – Cultural & Festival Content Writer

मातृत्व एक ऐसा उपहार है जो इस सृष्टि में सबसे पावन और अनमोल माना जाता है। एक माँ अपने बच्चों की खुशी और लंबी उम्र के लिए किसी भी हद तक जा सकती है। करवा चौथ के चार दिन बाद आने वाला अहोई अष्टमी का व्रत इसी निस्वार्थ प्रेम और ममता का एक सुंदर प्रतीक है। उत्तर भारत में इस पर्व का बहुत महत्व है, जहाँ माँ अपने बच्चों की सुरक्षा, अच्छे स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य के लिए पूरे दिन बिना पानी पिए उपवास रखती हैं। शाम को तारों को अर्घ्य देकर यह व्रत पूरा होता है। अगर आप भी में अहोई अष्टमी 2026 (Ahoi Ashtami 2026) व्रत की तैयारी कर रही हैं, तो यह लेख आपके लिए एक पूरा गाइड साबित होगा।

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अहोई अष्टमी क्या है? (What is Ahoi Ashtami?)

अहोई अष्टमी 2026 (Ahoi Ashtami 2026) का पर्व कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। इसे अहोई आठें के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन माता पार्वती के अहोई स्वरूप की पूजा का विधान है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, अहोई माता संतानों की रक्षा करने वाली और उनके जीवन के सारे संकटों को दूर करने वाली देवी हैं। जिन महिलाओं को संतान नहीं है, वे भी संतान प्राप्ति की कामना लेकर यह व्रत रखती हैं। इस व्रत में माँ दिन भर बिना पानी पिए रहती हैं और शाम को अहोई माता के चित्र के सामने दीप जलाकर कथा सुनती हैं।

अहोई अष्टमी 2026 तिथि और शुभ मुहूर्त (Date and time)

2026 में अहोई अष्टमी का व्रत 01 नवंबर, रविवार को रखा जाएगा। पंचांग के अनुसार तिथियों का विवरण इस प्रकार है:

अहोई अष्टमी तिथि: 01 नवंबर 2026, रविवार
अष्टमी तिथि का प्रारंभ: 01 नवंबर 2026 को दोपहर 02:51 बजे से
अष्टमी तिथि की समाप्ति: 02 नवंबर 2026 को दोपहर 01:10 बजे तक
पूजा का शुभ मुहूर्त: शाम 05:36 बजे से शाम 06:54 बजे तक
पूजा की कुल अवधि: 01 घंटा 18 मिनट
तारों को देखने का समय: शाम 06:00 बजे के आसपास
चंद्रोदय का समय: रात 11:40 बजे

अहोई अष्टमी का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व (Importance)

धार्मिक दृष्टिकोण से अहोई अष्टमी 2026 (Ahoi Ashtami 2026) का दिन ममता, आस्था और पारिवारिक सुरक्षा का प्रतीक है। ज्योतिष और शास्त्रों में माना गया है कि माँ की सच्चे दिल से की गई प्रार्थना संतान के जीवन की हर बाधा को दूर कर देती है। अगर बच्चे का स्वास्थ्य लगातार खराब रहता हो या उसकी पढ़ाई व करियर में रुकावटें आ रही हों, तो अहोई माता की कृपा से सभी मार्ग सुलभ हो जाते हैं। इसके अलावा मथुरा के गोवर्धन में स्थित राधा कुंड में अहोई अष्टमी की मध्यरात्रि को स्नान करने की विशेष परंपरा है। मान्यता है कि यहाँ स्नान करने से निसंतान दंपतियों को योग्य संतान की प्राप्ति होती है।

अहोई अष्टमी की संपूर्ण पूजा विधि (Pooja rituals)

Ahoi Ashtami 2026 festival

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पूजा को विधि विधान से पूरा करने पर अहोई माता का आशीर्वाद मिलता है। आइए जानते हैं चरणबद्ध पूजा विधि:

प्रातः काल का संकल्प: व्रत के दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें। इसके बाद हाथ में जल और अक्षत लेकर अहोई माता के सामने अपनी संतान के लिए निर्जल व्रत का संकल्प लें।
पूजा स्थल की तैयारी: घर की पूर्व या उत्तर दिशा की दीवार पर गेरू से अहोई माता का चित्र बनाएं या बाजार से लाया गया चित्र स्थापित करें। चित्र में माता के साथ उनके आठ बच्चों और सेह (स्याऊ) के चित्र अवश्य होने चाहिए।
चौकी स्थापना और कलश: पूजा स्थल पर एक लकड़ी की चौकी रखें और उस पर लाल कपड़ा बिछाएं। चौकी पर जल से भरा कलश स्थापित करें और उसके ऊपर गेहूं का पात्र रखें।
स्याऊ माला की तैयारी: अहोई अष्टमी की पूजा में चांदी की अहोई और चांदी के मनकों (दाना) की माला पहनी जाती है। इस माला को पूजा में रखकर रोली, अक्षत और पुष्प अर्पित करें।
भोग अर्पित करना: अहोई माता को मीठे पुए, हलवा, पूरी और दूध भात का भोग लगाएं। साथ ही सात प्रकार के अनाज या गेहूं पूजा में रखें।
व्रत कथा सुनना: हाथ में गेहूं के सात दाने लेकर भक्तिभाव से अहोई अष्टमी की व्रत कथा सुनें या पढ़ें।
तारों को अर्घ्य देना: शाम को आसमान में तारे निकलने के बाद कलश के जल से तारों को अर्घ्य दें। इसके पश्चात अपने बच्चों को तिलक लगाकर प्रसाद दें और स्वयं भी बच्चे के हाथ से जल ग्रहण कर व्रत का पारण करें।

अहोई अष्टमी व्रत के जरूरी नियम (Rules)

अहोई अष्टमी के व्रत का फल तभी मिलता है जब नियमों का कड़ाई से पालन किया जाए:

  • यह व्रत पूर्णतः निर्जला रखा जाता है, इसलिए शाम को तारों का दर्शन करने से पहले जल या अन्न ग्रहण न करें।
  • पूजा के समय किसी भी प्रकार के गुस्से, लड़ाई या नकारात्मक विचारों से दूर रहें।
  • इस दिन भोजन में लहसुन, प्याज या तामसिक पदार्थों का उपयोग घर में बिल्कुल न करें।
  • व्रत कथा सुनते समय ध्यान भटकने न दें और हाथ में लिए गेहूं के दानों को कथा पूर्ण होने पर अपनी सासू माँ के चरणों में अर्पित कर उनका आशीर्वाद लें।

अहोई अष्टमी व्रत रखने के मुख्य लाभ (Benefit)

  • संतान की दीर्घायु: अहोई माता के आशीर्वाद से बच्चों की आयु लंबी होती है और वे दुर्घटनाओं से सुरक्षित रहते हैं।
  • संतान सुख की प्राप्ति: जिन दंपतियों को संतान प्राप्ति में कठिनाई आ रही हो, उन्हें इस व्रत से शुभ समाचार प्राप्त होता है।
  • पारिवारिक समृद्धि: घर में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है तथा बच्चों की बुद्धि व करियर में उन्नति होती है।
  • रोग और कष्टों का नाश: बच्चों को बार-बार घेरने वाली बीमारियों से मुक्ति मिलती है।

क्या करें और क्या न करें (Do's and Don'ts)

क्या करें:

  • सुबह उठकर माता-पिता और बड़े बुजुर्गों के चरण स्पर्श करके आशीर्वाद लें।
  • पूजा के बाद सासू माँ या जेठानी को बायना (उपहार, वस्त्र व मिठाई) भेंट करें।
  • संध्या समय तारों का दर्शन करते समय अहोई माता का ध्यान करें।

क्या न करें:

  • अहोई अष्टमी के दिन मिट्टी की खुदाई या किसी वस्तु को काटने छीलने का काम न करें।
  • घर के किसी भी सदस्य या बच्चे पर गुस्सा न करें और न ही किसी का अनादर करें।
  • काले या गहरे नीले रंग के वस्त्र पहनकर पूजा न करें, लाल या पीले रंग के वस्त्र शुभ माने जाते हैं।

अहोई अष्टमी की पौराणिक कथा (Story)

प्राचीन काल में एक साहूकार रहता था जिसके सात बेटे थे। दीवाली से पहले कार्तिक मास में साहूकार की बहुएं घर की लीपापोती के लिए जंगल से मिट्टी लेने गईं। मिट्टी खोदते समय गलती से सबसे छोटी बहू की खुरपी से सेह (स्याऊ) का एक बच्चा मर गया। दुखी होकर सेह ने श्राप दिया कि वह उसकी संतान को बांध देगी। इसके बाद छोटी बहू के जो भी बच्चा होता, वह कुछ ही समय में मृत्यु को प्राप्त हो जाता।

अपनी भूल पर पछतावा करते हुए छोटी बहू ने देवी कामाख्या की आराधना की और वृद्धा सेह की निस्वार्थ सेवा की। उसकी सेवा से प्रसन्न होकर सेह ने उसे क्षमा कर दिया और कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को भगवती अहोई माता की पूजा करने का उपाय बताया। छोटी बहू ने विधिपूर्वक अहोई अष्टमी का निर्जला व्रत रखा और माता अहोई से क्षमा याचना की। अहोई माता ने प्रसन्न होकर उसकी मरी हुई संतानों को पुनर्जीवित कर दिया और दीर्घायु का वरदान दिया। तब से यह पावन व्रत हर माँ अपनी संतान की लंबी उम्र के लिए रखने लगी।

निष्कर्ष (Conclusion)

अहोई अष्टमी 2026 (Ahoi Ashtami 2026) का यह पावन पर्व एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि माँ के असीम प्रेम और अटूट विश्वास का एक सुंदर भाव है। जब एक माँ अपनी संतान की खुशहाली के लिए निर्जल रहकर अहोई माता के आगे आंचल फैलाती है, तो सृष्टि की शक्ति भी उसकी प्रार्थना स्वीकार करती है। 2026 की अहोई अष्टमी पर आप सभी माताओं पर अहोई माता की कृपा बनी रहे और आपकी संतानों का जीवन खुशियों, सफलता और उत्तम स्वास्थ्य से हमेशा महकता रहे।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

  1. अहोई अष्टमी 2026 (Ahoi Ashtami 2026) में कब है?
    अहोई अष्टमी 2026 (Ahoi Ashtami 2026)का व्रत 01 नवंबर, रविवार को रखा जाएगा।
  1. अहोई अष्टमी 2026 (Ahoi Ashtami 2026) की पूजा में अर्घ्य किसको दिया जाता है?
    अधिकांश स्थानों पर अहोई अष्टमी का व्रत शाम को तारों का दर्शन करके और उन्हें जल अर्पित करके खोला जाता है। कुछ परंपराओं में चंद्रमा को भी अर्घ्य दिया जाता है।
  1. क्या निसंतान महिलाएं भी अहोई अष्टमी का व्रत रख सकती हैं?
    हाँ, संतान प्राप्ति की कामना रखने वाली महिलाएं भी अहोई माता की कृपा पाने के लिए यह व्रत पूरे नियम और निष्ठा से रख सकती हैं।
  1. अहोई अष्टमी 2026 (Ahoi Ashtami 2026)की पूजा का शुभ मुहूर्त क्या है?
    01 नवंबर 2026 को पूजा का सबसे शुभ मुहूर्त शाम 05:36 बजे से शाम 06:54 बजे तक रहेगा।
  1. स्याऊ की माला का पूजा में क्या महत्व है?
    चांदी की स्याऊ माला अहोई माता का प्रतीक मानी जाती है। हर साल इसमें दो नए चांदी के मनके जोड़े जाते हैं, जो बच्चों की दीर्घायु और खुशहाली का प्रतिनिधित्व करते हैं।
Author: Neha Jain – Cultural & Festival Content Writer

Neha Jain is a festival writer with 7+ years’ experience explaining Indian rituals, traditions, and their cultural meaning, making complex customs accessible and engaging for today’s modern readers.