मातृत्व एक ऐसा उपहार है जो इस सृष्टि में सबसे पावन और अनमोल माना जाता है। एक माँ अपने बच्चों की खुशी और लंबी उम्र के लिए किसी भी हद तक जा सकती है। करवा चौथ के चार दिन बाद आने वाला अहोई अष्टमी का व्रत इसी निस्वार्थ प्रेम और ममता का एक सुंदर प्रतीक है। उत्तर भारत में इस पर्व का बहुत महत्व है, जहाँ माँ अपने बच्चों की सुरक्षा, अच्छे स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य के लिए पूरे दिन बिना पानी पिए उपवास रखती हैं। शाम को तारों को अर्घ्य देकर यह व्रत पूरा होता है। अगर आप भी में अहोई अष्टमी 2026 (Ahoi Ashtami 2026) व्रत की तैयारी कर रही हैं, तो यह लेख आपके लिए एक पूरा गाइड साबित होगा।
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अहोई अष्टमी 2026 (Ahoi Ashtami 2026) का पर्व कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। इसे अहोई आठें के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन माता पार्वती के अहोई स्वरूप की पूजा का विधान है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, अहोई माता संतानों की रक्षा करने वाली और उनके जीवन के सारे संकटों को दूर करने वाली देवी हैं। जिन महिलाओं को संतान नहीं है, वे भी संतान प्राप्ति की कामना लेकर यह व्रत रखती हैं। इस व्रत में माँ दिन भर बिना पानी पिए रहती हैं और शाम को अहोई माता के चित्र के सामने दीप जलाकर कथा सुनती हैं।
2026 में अहोई अष्टमी का व्रत 01 नवंबर, रविवार को रखा जाएगा। पंचांग के अनुसार तिथियों का विवरण इस प्रकार है:
अहोई अष्टमी तिथि: 01 नवंबर 2026, रविवारधार्मिक दृष्टिकोण से अहोई अष्टमी 2026 (Ahoi Ashtami 2026) का दिन ममता, आस्था और पारिवारिक सुरक्षा का प्रतीक है। ज्योतिष और शास्त्रों में माना गया है कि माँ की सच्चे दिल से की गई प्रार्थना संतान के जीवन की हर बाधा को दूर कर देती है। अगर बच्चे का स्वास्थ्य लगातार खराब रहता हो या उसकी पढ़ाई व करियर में रुकावटें आ रही हों, तो अहोई माता की कृपा से सभी मार्ग सुलभ हो जाते हैं। इसके अलावा मथुरा के गोवर्धन में स्थित राधा कुंड में अहोई अष्टमी की मध्यरात्रि को स्नान करने की विशेष परंपरा है। मान्यता है कि यहाँ स्नान करने से निसंतान दंपतियों को योग्य संतान की प्राप्ति होती है।

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पूजा को विधि विधान से पूरा करने पर अहोई माता का आशीर्वाद मिलता है। आइए जानते हैं चरणबद्ध पूजा विधि:
प्रातः काल का संकल्प: व्रत के दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें। इसके बाद हाथ में जल और अक्षत लेकर अहोई माता के सामने अपनी संतान के लिए निर्जल व्रत का संकल्प लें।अहोई अष्टमी के व्रत का फल तभी मिलता है जब नियमों का कड़ाई से पालन किया जाए:
क्या करें:
क्या न करें:
प्राचीन काल में एक साहूकार रहता था जिसके सात बेटे थे। दीवाली से पहले कार्तिक मास में साहूकार की बहुएं घर की लीपापोती के लिए जंगल से मिट्टी लेने गईं। मिट्टी खोदते समय गलती से सबसे छोटी बहू की खुरपी से सेह (स्याऊ) का एक बच्चा मर गया। दुखी होकर सेह ने श्राप दिया कि वह उसकी संतान को बांध देगी। इसके बाद छोटी बहू के जो भी बच्चा होता, वह कुछ ही समय में मृत्यु को प्राप्त हो जाता।
अपनी भूल पर पछतावा करते हुए छोटी बहू ने देवी कामाख्या की आराधना की और वृद्धा सेह की निस्वार्थ सेवा की। उसकी सेवा से प्रसन्न होकर सेह ने उसे क्षमा कर दिया और कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को भगवती अहोई माता की पूजा करने का उपाय बताया। छोटी बहू ने विधिपूर्वक अहोई अष्टमी का निर्जला व्रत रखा और माता अहोई से क्षमा याचना की। अहोई माता ने प्रसन्न होकर उसकी मरी हुई संतानों को पुनर्जीवित कर दिया और दीर्घायु का वरदान दिया। तब से यह पावन व्रत हर माँ अपनी संतान की लंबी उम्र के लिए रखने लगी।
अहोई अष्टमी 2026 (Ahoi Ashtami 2026) का यह पावन पर्व एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि माँ के असीम प्रेम और अटूट विश्वास का एक सुंदर भाव है। जब एक माँ अपनी संतान की खुशहाली के लिए निर्जल रहकर अहोई माता के आगे आंचल फैलाती है, तो सृष्टि की शक्ति भी उसकी प्रार्थना स्वीकार करती है। 2026 की अहोई अष्टमी पर आप सभी माताओं पर अहोई माता की कृपा बनी रहे और आपकी संतानों का जीवन खुशियों, सफलता और उत्तम स्वास्थ्य से हमेशा महकता रहे।
Neha Jain is a festival writer with 7+ years’ experience explaining Indian rituals, traditions, and their cultural meaning, making complex customs accessible and engaging for today’s modern readers.