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August 13, 2026 Blog

Soora Samharam 2026: जानिए सही तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, महत्व और पौराणिक कथा

BY : Neha Jain – Cultural & Festival Content Writer

जब धर्म पर अधर्म का साया गहराने लगता है और आसुरी शक्तियाँ बेकसूरों को पीड़ित करने लगती हैं, तब भगवान शिव के दिव्य अंश भगवान कार्तिकेय (मुरुगन) अपने हाथ में 'वेल' (भाला) धारण करके बुराई का सर्वनाश करने उतरते हैं। दक्षिण भारत में तमिल समुदाय द्वारा मनाया जाने वाला 'सूरा संहारम' 2026 (Soora Samharam 2026) केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं है, बल्कि यह बुराई पर अच्छाई, असत्य पर सत्य और अंधकार पर प्रकाश की शाश्वत विजय का अलौकिक प्रतीक है। स्कंद षष्ठी उत्सव का अंतिम और सबसे भव्य पड़ाव माना जाने वाला सूरा संहारम 2026 (Soora Samharam 2026) हमें यह विश्वास दिलाता है कि जब तक भक्ति और आस्था जीवित है, तब तक कोई भी बुराई हमारा बाल भी बाँका नहीं कर सकती। यदि आप वर्ष में सूरा संहारम 2026 (Soora Samharam 2026) की सही तिथि, शुभ मुहूर्त और संपूर्ण पूजा विधि की जानकारी तलाश रहे हैं, तो यह लेख आपके भक्ति मार्ग को आलोकित करेगा।

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सूरा संहारम क्या है? (Introduction)

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाने वाला महान पर्व ही सूरा संहारम कहलाता है। इसे तमिल में सूरसमहारम भी कहा जाता है। यह छह दिवसीय स्कंद षष्ठी उत्सव का सबसे मुख्य दिन होता है। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र स्वामी मुरुगन (कार्तिकेय) ने भयंकर असुर सूरापद्मन का वध करके तीनों लोकों को उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाई थी। विशेष रूप से तमिलनाडु के तिरुचेंदूर मुरुगन मंदिर में इस दिन विशाल नाटक और लीला का आयोजन किया जाता है, जहाँ लाखों श्रद्धालु समुद्र तट पर एकत्रित होकर भगवान मुरुगन के विजय पर्व का साक्षी बनते हैं।

सूरा संहारम 2026 तिथि और शुभ मुहूर्त (Date and time)

वर्ष में सूरा संहारम 2026 (Soora Samharam 2026) का यह पावन पर्व 15 नवंबर, रविवार को पूरे भक्ति भाव और उत्साह के साथ मनाया जाएगा। पंचांग के अनुसार तिथियों और पूजा के शुभ समय का संपूर्ण विवरण इस प्रकार है:

सूरा संहारम तिथि: 15 नवंबर 2026, रविवार
स्कंद षष्ठी तिथि प्रारंभ: 14 नवंबर 2026 को रात 08:30 बजे से
स्कंद षष्ठी तिथि समाप्त: 15 नवंबर 2026 को रात 10:15 बजे तक
पूजा का सबसे शुभ मुहूर्त (प्रातःकाल): सुबह 06:45 बजे से सुबह 10:30 बजे तक
मुरुगन विजय पूजा मुहूर्त (संध्या समय): शाम 04:45 बजे से शाम 06:30 बजे तक

सूरा संहारम का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व (Importance)

धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सूरा संहारम 2026 (Soora Samharam 2026) का आध्यात्मिक महत्व अत्यंत विशाल है। भगवान मुरुगन ज्ञान, साहस, विजय और शक्ति के प्रतीक हैं। जो भाला (वेल) उनके हाथ में सुशोभित होता है, वह ज्ञान की तीक्ष्णता को दर्शाता है जो हमारे अज्ञान और भय को काट फेंकता है।

असुर सूरापद्मन वास्तव में हमारे भीतर छिपे अहंकार, काम, क्रोध और लोभ जैसी बुराइयों का प्रतीक है। जब हम सूरा संहारम 2026 (Soora Samharam 2026) का व्रत और पूजन करते हैं, तो स्वामी मुरुगन हमारे भीतर की इन आंतरिक बुराइयों का संहार करके हमें मानसिक शांति, साहस और आध्यात्मिक जागृति प्रदान करते हैं।

सूरा संहारम की संपूर्ण पूजा विधि (Pooja rituals)

  • सूरा संहारम 2026 (Soora Samharam 2026) पर भगवान मुरुगन की पूजा पूर्ण निष्ठा और पवित्रता के साथ की जाती है। 
  • प्रातः स्नान और संकल्प: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और लाल या पीले रंग के स्वच्छ वस्त्र पहनें। इसके बाद हाथ में जल लेकर भगवान मुरुगन के समक्ष व्रत व पूजा का संकल्प लें।
  • पूजा स्थल की तैयारी: घर के मंदिर में उत्तर या पूर्व दिशा की ओर एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं। उस पर भगवान कार्तिकेय (मुरुगन) की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें, जिसमें उनका 'वेल' (भाला) स्पष्ट दिखाई दे।
  • अभिषेक और तिलक: मूर्ति पर गंगाजल, दूध और पंचामृत से अभिषेक करें। तत्पश्चात कुमकुम, चंदन, हल्दी और अक्षत अर्पित करें।
  • विशेष पुष्प और वस्त्र: भगवान मुरुगन को लाल रंग के ताजे फूल, गेंदे की माला और लाल कलावा अर्पित करें।
  • भोग अर्पण: स्वामी मुरुगन को पंचामृत, फल, पके हुए चावल, गुड़, मेवे और पंचामृत का भोग लगाएं।
  • मंत्र और जप: धूप-दीप जलाकर 'ॐ वल्ली देवसेना समेत श्री सुब्रह्मण्याय नमः' या 'ॐ शरवणभवाय नमः' मंत्र का भक्तिभाव से जाप करें।
  • आरती और क्षमा प्रार्थना: अंत में कर्पूर से आरती करें और अपने दुखों व पापों से मुक्ति की प्रार्थना करें।

सूरा संहारम व्रत के जरूरी नियम (Rules)

Soora Samharam 2026 festival

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सूरा संहारम के कठिन व्रत को पूर्ण करने के लिए शास्त्रों में कुछ नियम बताए गए हैं:

  • साधक स्कंद षष्ठी के छह दिनों का व्रत रखते हैं, लेकिन जो लोग छह दिन न कर सकें, वे केवल सूरा संहारम के दिन निर्जला या फलाहारी उपवास रख सकते हैं।
  • इस दिन पूरे समय मन को शांत रखें और किसी से भी कटु वचन न बोलें।
  • केवल शाम को भगवान मुरुगन के संहारम उत्सव के बाद ही दूध या फल ग्रहण करके व्रत का पारण करें।
  • घर के वातावरण को पूरी तरह सात्विक बनाए रखें और तामसिक भोजन का प्रयोग न करें।

सूरा संहारम व्रत के मुख्य लाभ (Benefits)

  • शत्रुओं और भय से मुक्ति: जीवन में छुपे हुए और प्रत्यक्ष शत्रुओं का नाश होता है तथा भय दूर होता है।
  • आरोग्य और शक्ति की प्राप्ति: पुरानी बीमारियों और शारीरिक दुर्बलता से मुक्ति मिलती है।
  • संतान सुख: स्वामी मुरुगन की कृपा से निसंतान दंपत्तियों को गुणवान संतान की प्राप्ति होती है।
  • सफलता और विजय: मुकदमे, प्रतियोगी परीक्षा और कार्यों में सफलता प्राप्त होती है।

क्या करें और क्या न करें (Do's and Don'ts)

क्या करें:

  • घर के मंदिर में भगवान मुरुगन के साथ-साथ शिव-पार्वती का ध्यान भी अवश्य करें।
  • मुरुगन मंदिरों में जाकर विशेष अभिषेक और 'वेल' पूजा का दर्शन करें।
  • गरीबों और जरूरतमंदों में अन्न और लाल वस्त्रों का दान करें।

क्या न करें:

  • इस पावन दिन किसी भी प्राणी या जीव को शारीरिक कष्ट न पहुँचाएं।
  • घर में कलह, क्रोध या नकारात्मक विचारों को स्थान न दें।
  • पूजा के स्थान पर काले रंग के वस्त्र पहनकर न बैठें।

सूरा संहारम की पौराणिक कथा (Story)

स्कंद पुराण के अनुसार प्राचीन काल में सूरापद्मन नाम का एक अत्यंत शक्तिशाली दानव था। उसने कठिन तपस्या करके भगवान शिव से यह वरदान प्राप्त कर लिया था कि भगवान शिव के अपने अंश के अतिरिक्त कोई भी उसका वध न कर सके। वरदान के अहंकार में अंधा होकर सूरापद्मन ने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया और देवताओं को बंदी बनाकर उन पर अत्याचार करने लगा।

दुखी होकर सभी देवता भगवान शिव की शरण में पहुँचे। तब भगवान शिव के तीसरे नेत्र से छह दिव्य दिव्य ज्योतियाँ निकलीं, जिनसे भगवान कार्तिकेय (मुरुगन) का जन्म हुआ। माता पार्वती ने अपने पुत्र मुरुगन को सभी आसुरी शक्तियों के विनाश के लिए अपनी संपूर्ण शक्ति से युक्त एक अमोघ अस्त्र 'वेल' (भाला) प्रदान किया।

भगवान मुरुगन ने अपनी सेना के साथ असुरों से छह दिनों तक भयंकर युद्ध किया। छठे दिन यानी कार्तिक शुक्ल षष्ठी को मुरुगन ने अपने 'वेल' से सूरापद्मन के दो टुकड़े कर दिए। सूरापद्मन का एक आधा हिस्सा मयूर (मोर) बन गया, जिसे भगवान मुरुगन ने अपना वाहन बनाया और दूसरा हिस्सा कुक्कुट (मुर्गा) बन गया, जिसे उन्होंने अपने ध्वज पर स्थान दिया। इस प्रकार स्वामी मुरुगन ने बुराई का अंत करके धर्म की पुनः स्थापना की।

निष्कर्ष (Conclusion)

सूरा संहारम 2026 (Soora Samharam 2026) का यह महान पर्व केवल एक इतिहास या पौराणिक कथा नहीं है, बल्कि यह हमारे जीवन के हर कठिन संघर्ष में साहस बनाए रखने की प्रेरणा है। जब जब हमारे जीवन में दुख, भय और बाधाओं का असुर हावी होने लगता है, तब स्वामी मुरुगन का स्मरण मात्र हमारे भीतर एक नई ऊर्जा और विजय का विश्वास भर देता है। वर्ष के सूरा संहारम 2026 (Soora Samharam 2026) पर भगवान मुरुगन का दिव्य आशीर्वाद आपके जीवन के समस्त दुखों का संहार करे और आपको सुख, शांति, समृद्धि और उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करे। स्वामी मुरुगन की जय

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

  1. सूरा संहारम 2026 (Soora Samharam 2026) में कब है?
     सूरा संहारम का पावन पर्व 15 नवंबर 2026, रविवार को मनाया जाएगा।
  2. सूरा संहारम में किस देवता की पूजा की जाती है?
    इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र भगवान कार्तिकेय (स्वामी मुरुगन) की पूजा की जाती है।
  3. सूरा संहारम का सबसे प्रसिद्ध आयोजन कहाँ होता है?
    सूरा संहारम का सबसे भव्य और विशाल आयोजन तमिलनाडु के तिरुचेंदूर स्थित मुरुगन मंदिर के समुद्र तट पर होता है।
  4. भगवान मुरुगन के भाले को क्या कहा जाता है?
    भगवान मुरुगन के दिव्य अस्त्र यानी भाले को तमिल परंपरा में 'वेल' कहा जाता है।
  5. क्या सूरा संहारम का व्रत करने से शत्रुओं पर विजय मिलती है?
    जी हां, मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से मुरुगन जी की पूजा और व्रत करने से शत्रुओं, भय और मुकदमेबाजी में विजय प्राप्त होती है।
Author: Neha Jain – Cultural & Festival Content Writer

Neha Jain is a festival writer with 7+ years’ experience explaining Indian rituals, traditions, and their cultural meaning, making complex customs accessible and engaging for today’s modern readers.