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September 15, 2026 Blog

Annapurna Jayanti 2026: जानिए सही तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, महत्व और पौराणिक कथा

BY : Neha Jain – Cultural & Festival Content Writer

घर की रसोई केवल खाना बनाने की जगह नहीं होती, बल्कि यह परिवार की सेहत, तरक्की और खुशहाली का सबसे पवित्र केंद्र होती है। जब रसोई में बने भोजन में माँ के वात्सल्य और देवी के आशीर्वाद का रस घुल जाता है, तो वह केवल भोजन नहीं बल्कि अमृत बन जाता है। हमारी सनातन परंपरा में अन्न को ईश्वर का दर्जा दिया गया है और अन्न की अधिष्ठात्री देवी साक्षात माँ अन्नपूर्णा हैं। इस पावन पर्व को हम अन्नपूर्णा जयंती 2026 (Annapurna Jayanti 2026) के रूप में बहुत ही धूमधाम से मनाते हैं।

मार्गशीर्ष माह की पूर्णिमा तिथि वह पावन दिन है, जब पृथ्वी पर फैले अकाल को मिटाने और जीवों का पेट भरने के लिए माता पार्वती ने माँ अन्नपूर्णा का स्वरूप धारण किया था। यदि आप भी चाहते हैं कि आपके घर में अन्न-धन का भंडार हमेशा भरा रहे और परिवार में कभी किसी चीज़ की कमी न हो, तो अन्नपूर्णा जयंती 2026  (Annapurna Jayanti 2026) की तिथि का यह दिन आपके लिए बेहद कल्याणकारी सिद्ध होगा। आइए जानते हैं इस पावन पर्व की सही तिथि, शुभ मुहूर्त, रसोई घर पूजा विधि (Rasoi Ghar Puja Vidhi) और पौराणिक कथा।

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अन्नपूर्णा जयंती क्या है? (What is Annapurna Jayanti?)

वैदिक पंचांग के अनुसार, मार्गशीर्ष (अगहन) माह की पूर्णिमा तिथि को अन्नपूर्णा जयंती 2026 (Annapurna Jayanti 2026)का पर्व  मनाया जाता है। माँ अन्नपूर्णा साक्षात माता पार्वती का ही एक रूप हैं, जो धन, धान्य और पोषण की देवी मानी जाती हैं।

इस दिन विशेष रूप से घर के रसोईघर (किचन), चूल्हे और अन्न भंडार की पूजा की जाती है। भारत के कई हिस्सों, विशेषकर काशी (वाराणसी) में अन्नपूर्णा जयंती को एक बहुत बड़े उत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस दिन माँ अन्नपूर्णा के मंदिरों में अन्नकूट का आयोजन होता है और भक्तों में प्रसाद बांटा जाता है। मान्यता है कि इस दिन रसोई की सफाई करके माँ अन्नपूर्णा की पूजा करने से घर से दरिद्रता हमेशा के लिए दूर हो जाती है।

अन्नपूर्णा जयंती 2026 की तिथि और शुभ मुहूर्त (Annapurna Jayanti 2026 Date and Shubh Muhurat)

अन्नपूर्णा जयंती का पूजन पूर्णिमा तिथि के शुभ मुहूर्त में करना अत्यंत फलदायी माना जाता है। वर्ष में अन्नपूर्णा जयंती 2026 (Annapurna Jayanti 2026) तिथि और शुभ मुहूर्त की तालिका नीचे दी गई है:

  • अन्नपूर्णा जयंती तिथि (Annapurna Jayanti 2026 Date): 23 दिसंबर 2026, बुधवार

  • मार्गशीर्ष पूर्णिमा तिथि प्रारंभ: 23 दिसंबर 2026 को प्रातः 05:10 बजे से

  • मार्गशीर्ष पूर्णिमा तिथि समाप्त: 24 दिसंबर 2026 को प्रातः 03:45 बजे तक

  • रसोई व अन्नपूर्णा पूजा मुहूर्त (प्रातः काल): 23 दिसंबर 2026 को सुबह 07:12 बजे से दोपहर 12:20 बजे तक

  • संध्या पूजन मुहूर्त: 23 दिसंबर 2026 को शाम 05:31 बजे से रात 08:15 बजे तक

उदयातिथि और पूर्णिमा तिथि के मान के अनुसार, अन्नपूर्णा जयंती का पावन पर्व (Annapurna Jayanti Festival) 23 दिसंबर 2026 को ही पूरे भक्तिभाव से मनाया जाएगा।

अन्नपूर्णा जयंती का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व (Significance of Annapurna Jayanti)

हिंदू संस्कृति में 'अन्नं ब्रह्म' कहा गया है, यानी अन्न ही ब्रह्म है। अन्नपूर्णा जयंती का आध्यात्मिक महत्व हमें अन्न का आदर करना सिखाता है। आज के दौर में जहाँ लोग भोजन की बर्बादी करते हैं, यह पर्व हमें याद दिलाता है कि थाली में पड़ा एक-एक दाना देवी का प्रसाद है।

इस दिन माँ अन्नपूर्णा का अन्नपूर्णा जयंती व्रत (Annapurna Jayanti Vrat) और पूजन करने से घर में कभी भुखमरी या दरिद्रता नहीं आती। यह व्रत केवल धन-धान्य ही नहीं देता, बल्कि मनुष्य के भीतर संतोष, दया और सेवा भाव जगाता है। जिस घर में अन्नपूर्णा जयंती पर रसोई की पूजा होती है, वहां बीमारियां दूर रहती हैं और आरोग्य का वास होता है।

अन्नपूर्णा जयंती पूजा विधि (Annapurna Jayanti Puja Vidhi)

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अन्नपूर्णा जयंती के दिन घर की रसोई और माँ अन्नपूर्णा की पूजा (Maa Annapurna Puja) इस प्रकार पूरे विधि-विधान से करें:

  1. रसोई घर की सफाई: सुबह उठकर सबसे पहले अपनी रसोई (किचन) और चूल्हे की बहुत अच्छी तरह से सफाई करें।

  2. स्नान और शुद्धता: स्वयं स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहनें और मन में सात्विक विचार रखें।

  3. चूल्हे और अन्न की सजावट: गैस के चूल्हे, सिलेंडर और अन्न के डिब्बों पर हल्दी, कुमकुम और रोली से स्वास्तिक का चिह्न बनाएं। उन पर चावल और फूल अर्पित करें।

  4. माँ अन्नपूर्णा की स्थापना: रसोईघर में एक छोटी चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर माँ अन्नपूर्णा की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। (यदि प्रतिमा न हो तो माता पार्वती का ध्यान करें)।

  5. अभिषेक और श्रृंगार: माता को लाल चुनरी चढ़ाएं। धूप, दीप जलाएं और लाल पुष्प अर्पित करें।

  6. प्रथम भोजन का भोग: आज के दिन रसोई में जो भी सात्विक भोजन (जैसे खीर, हलवा या पूरी-सब्जी) बने, उसका पहला भोग माँ अन्नपूर्णा को लगाएं।

  7. आरती और क्षमा प्रार्थना: माँ अन्नपूर्णा की आरती करें और प्रार्थना करें कि हे माँ! हमारे घर में अन्न और धन का भंडार सदैव भरा रहे।

अन्नपूर्णा जयंती व्रत के जरूरी नियम (Annapurna Jayanti Vrat Rules)

  • इस दिन रसोई में बिना स्नान किए या गंदे हाथों से प्रवेश न करें।

  • भोजन बनाते समय मन में बुरे विचार न लाएं और न ही किसी पर गुस्सा करें।

  • व्रत रखने वाले व्यक्ति को पूरा दिन सात्विक भोजन या फलाहार करना चाहिए।

  • इस दिन बने भोजन में से पहला हिस्सा गाय और पक्षियों के लिए अवश्य निकालें।

अन्नपूर्णा जयंती व्रत के अद्भुत लाभ (Benefits of Annapurna Jayanti)

  • अन्न-धान्य की बरकत: घर के अन्न भंडार कभी खाली नहीं होते और आर्थिक तंगी दूर होती है।

  • आरोग्य और उत्तम स्वास्थ्य: सात्विक और पूजित भोजन से परिवार के सभी सदस्यों की सेहत अच्छी रहती है।

  • वास्तु दोष से मुक्ति: रसोईघर का वास्तु दोष खत्म होता है और घर में सकारात्मक ऊर्जा आती है।

  • पारिवारिक शांति: घर में खुशहाली बनी रहती है और सदस्यों के बीच प्रेम बढ़ता है।

अन्नपूर्णा जयंती: क्या करें और क्या न करें (Dos and Don'ts)

क्या करें:

  • रसोई घर के चूल्हे पर रोली और हल्दी से स्वास्तिक बनाएं।

  • किसी भूखे व्यक्ति या गरीब को पेट भरकर भोजन कराएं।

  • भोजन ग्रहण करने से पहले अन्न देवता और माँ अन्नपूर्णा का धन्यवाद करें।

क्या न करें:

  • अन्नपूर्णा जयंती के दिन भूलकर भी अन्न (भोजन) का अपमान या बर्बादी न करें।

  • थाली में झूठा भोजन न छोड़ें।

  • रसोईघर में तामसिक चीजें जैसे मांस, मदिरा, लहसुन या प्याज का प्रयोग न करें।

अन्नपूर्णा जयंती की पौराणिक कथा (Annapurna Jayanti Story)

पौराणिक अन्नपूर्णा जयंती कथा (Annapurna Jayanti Vrat Katha) के अनुसार, एक बार पृथ्वी पर भयंकर सूखा और अकाल पड़ गया। चारों ओर पानी और अन्न की एक-एक बूंद के लिए हाहाकार मच गया। नदियाँ सूख गईं, खेत बंजर हो गए और पशु-पक्षी व मनुष्य भूख से तड़प-तड़पकर मरने लगे।

सभी देवता और मुनि व्याकुल होकर देवों के देव महादेव के पास कैलाश पर्वत पहुँचे। उन्होंने भगवान शिव से प्रार्थना की कि हे प्रभु! पृथ्वी लोक को इस भयंकर संकट से बचाइए। भगवान शिव ने संसार का यह कष्ट देखकर स्थिति को संभालने का निर्णय लिया।

भगवान शिव ने एक भिक्षुक का रूप धारण किया और माता पार्वती ने साक्षात 'माँ अन्नपूर्णा' का दिव्य रूप प्रकट किया। माँ अन्नपूर्णा के एक हाथ में अन्न का पात्र और दूसरे हाथ में स्वर्ण का करछुल था।

भगवान शिव ने भिक्षुक बनकर माँ अन्नपूर्णा से अन्न की भीख मांगी। माता अन्नपूर्णा ने अपने पावन हाथों से भगवान शिव की झोली में अन्न डाल दिया। उस दिव्य अन्न को भगवान शिव ने ले जाकर पृथ्वी लोक के समस्त जीवों में बांट दिया। क्षण भर में पूरी पृथ्वी पर हरियाली छा गई, नदियाँ जल से भर गईं और अन्न के भंडार लबालब हो गए। जिस दिन माता पार्वती ने अन्नपूर्णा का रूप लेकर जीवों का उद्धार किया था, वह मार्गशीर्ष पूर्णिमा का दिन था। तभी से यह पावन तिथि 'अन्नपूर्णा जयंती' के रूप में पूजी जाने लगी।

निष्कर्ष (Conclusion)

अन्नपूर्णा जयंती का यह पावन पर्व हमें केवल एक दिन की पूजा का संदेश नहीं देता, बल्कि हमें जीवन भर अन्न का सम्मान करने और भूखों को भोजन कराने की प्रेरणा देता है। हमारी थाली में आया अन्न माँ अन्नपूर्णा का प्रसाद है। यदि आप भी अपने जीवन में सुख, समृद्धि और सेहत का आशीर्वाद चाहते हैं, तो अन्नपूर्णा जयंती 2026 (Annapurna Jayanti 2026) के शुभ अवसर पर अपनी रसोई की पवित्रता बनाएं रखें, अन्न का कभी निरादर न करें और किसी जरूरतमंद को भोजन अवश्य कराएं। माँ अन्नपूर्णा की कृपा से आपका घर हमेशा खुशियों से भरा रहेगा।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q1: अन्नपूर्णा जयंती 2026 (Annapurna Jayanti 2026) में कब है?

अन्नपूर्णा जयंती 23 दिसंबर 2026, बुधवार के दिन मनाई जाएगी।

Q2: अन्नपूर्णा जयंती के दिन किसकी पूजा की जाती है?

इस दिन धन-धान्य की देवी माँ अन्नपूर्णा (माता पार्वती) और रसोईघर के चूल्हे की पूजा की जाती है।

Q3: अन्नपूर्णा जयंती पर रसोई में क्या उपाय करना चाहिए?

इस दिन रसोई की पूरी सफाई करके गैस के चूल्हे पर हल्दी और रोली से स्वास्तिक बनाएं और जल का छिड़काव करें।

Q4: क्या अन्नपूर्णा जयंती 2026 (Annapurna Jayanti 2026)के दिन दान करना चाहिए?

जी हां, इस दिन किसी निर्धन या भूखे व्यक्ति को कच्चे अनाज (चावल, आटा, दाल) या पके हुए भोजन का दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है।

Q5: माँ अन्नपूर्णा किस स्थान से विशेष रूप से जुड़ी हुई हैं?

माँ अन्नपूर्णा काशी (वाराणसी) की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती हैं, जहाँ उनका प्रसिद्ध मंदिर स्थित है।

Author: Neha Jain – Cultural & Festival Content Writer

Neha Jain is a festival writer with 7+ years’ experience explaining Indian rituals, traditions, and their cultural meaning, making complex customs accessible and engaging for today’s modern readers.