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July 22, 2026 Blog

Vakratunda Sankashti Chaturthi 2026: 28 अक्टूबर को है वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी, जानें शुभ मुहूर्त, चंद्रोदय समय और पूजा विधि

BY : Neha Jain – Cultural & Festival Content Writer

जीवन की यात्रा में, जब परेशानियाँ हमें चारों ओर से घेर लेती हैं, तो हम एक ऐसे सहारे की तलाश करते हैं जो बिना किसी शर्त के हमारा साथ दे। ऐसे समय में, एक ही नाम याद आता है - 'विघ्नहर्ता श्री गणेश'। उनके बड़े-बड़े कान हमारी हर छोटी पुकार सुन लेते हैं, उनकी सूंड हर बाधा को दूर कर देती है, और उनकी मूरत ही मन में एक गहरी शांति भर देती है। सनातन परंपरा में, जब दुखों का पहाड़ टूटे, तो बप्पा को मनाने का सबसे अच्छा दिन होता है संकष्टी चतुर्थी। हर महीने चतुर्थी आती है, लेकिन कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली चतुर्थी का स्थान सबसे ऊंचा माना जाता है। इसे ही हम कहते हैं - वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी 2026 (Vakratunda Sankashti 2026)।

इस साल, वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी  (Vakratunda Sankashti 2026) 28 अक्टूबर को आ रही है। यह केवल एक धार्मिक उपवास नहीं है, बल्कि आपके परिवार से हर छोटी-बड़ी मानसिक, आर्थिक, और शारीरिक बाधा को दूर करने का एक महान अवसर है। आइए, एक सच्चे भक्त की तरह, दिल की गहराई से समझते हैं कि इस पावन तिथि का क्या महत्व है और बप्पा को रिझाने की सही और सरल पूजा विधि क्या है।

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वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी क्या है? (What is Vakratunda Sankashti Chaturthi?)

यह सनातन पंचांग के अनुसार, पूर्णिमान्त कैलेंडर के हिसाब से कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है। 'संकष्टी' शब्द का अर्थ ही है संकटों को हरने वाली। इस दिन भगवान गणेश के 'वक्रतुंड' स्वरूप की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। यह व्रत दिन भर के उपवास के बाद रात को चंद्र देव दर्शन और उन्हें अर्घ्य देने के बाद ही पूरा होता है। मान्यता है कि स्वयं भगवान शिव ने भी इस व्रत की महिमा का बखान किया था।

वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी 2026: तिथि, शुभ मुहूर्त, और चंद्रोदय का समय (Date and time)

साल 2026 में यह पावन चतुर्थी बुधवार के दिन आ रही है। बुधवार का दिन स्वयं भगवान गणेश का ही प्रिय दिन माना जाता है, जिससे इस व्रत का महत्व और फल अनंत गुना बढ़ गया है। पंचांग के अनुसार सटीक समय इस प्रकार है:

व्रत कब है: 28 अक्टूबर 2026, दिन बुधवार
कार्तिक कृष्ण चतुर्थी तिथि प्रारंभ: 28 अक्टूबर 2026 को सुबह 07:42 AM से
कार्तिक कृष्ण चतुर्थी तिथि समापन: 30 अक्टूबर 2026 को सुबह 06:15 AM तक
संध्या काल पूजा का शुभ मुहूर्त: शाम 05:40 PM से रात 07:12 PM तक

वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी 2026 चंद्रोदय (चांद निकलने) का समय: रात 07:54 PM पर (अलग-अलग शहरों के पंचांग के अनुसार 5-10 मिनट का अंतर हो सकता है)

धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व (Importance)

भारतीय संस्कृति में बप्पा के वक्रतुंड रूप का महत्व हमारी आत्मिक शुद्धि से जुड़ा है। 'वक्र' का अर्थ है टेढ़ी और 'तुंड' का अर्थ है सूंड। यह स्वरूप हमें सिखाता है कि सीधे रास्ते पर चलने वाले सज्जनों के लिए बप्पा बेहद कोमल हैं, लेकिन टेढ़े रास्ते पर चलने वाली आसुरी शक्तियों और संकटों के लिए वे उतने ही कठोर हैं।

इस व्रत का आध्यात्मिक महत्व यह है कि जब आप पूरे दिन भूखे-प्यासे रहकर शाम को गणपति की आराधना करते हैं, तो आपकी सोई हुई आत्मिक शक्ति जागृत होती है। चूंकि यह व्रत बुधवार के दिन पड़ रहा है, इसलिए बुध ग्रह के दोष दूर होने का महा लाभ भी जातकों को मिलेगा, जिससे बुद्धि तीव्र होती है और व्यापार में उन्नति होती है।

गणपति बाप्पा की संपूर्ण पूजा विधि (Pooja rituals)

Vakratunda Sankashti Chaturthi 2026 festival

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28 अक्टूबर की पावन तिथि पर बप्पा को प्रसन्न करने के लिए इस प्रकार पूजा विधि अपनाएं:

  • प्रातः काल की शुरुआत: सुबह सूर्योदय से पहले उठें। घर की सफाई करें और स्नान के जल में गंगाजल मिलाकर पवित्र स्नान करें। पीले या हरे रंग के वस्त्र पहनना अत्यंत शुभ होगा।
  • व्रत का संकल्प: पूजा घर में बप्पा की मूरत के सामने हाथ में जल, अक्षत, और दूर्वा लेकर संकल्प लें "हे वक्रतुंड महागणपति, मैं आज आपके संकष्टी चतुर्थी व्रत का पालन कर रहा/रही हूँ। मेरे जीवन के सभी विघ्न दूर करें।"
  • दिन भर का मानसिक जाप: दिनभर निराहार रहें या फलाहार लें और मन ही मन “ॐ गं गणपतये नमः” का जाप करते रहें।
  • शाम की मुख्य पूजा: शाम के शुभ मुहूर्त (05:40 PM) में चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर गणेश जी की मूर्ति रखें। उन्हें लाल चंदन, कुमकुम, हल्दी और सिंदूर का तिलक लगाएं।
  • दूर्वा और मोदक का अर्पण: बप्पा को सबसे प्रिय 21 दूर्वा घास की पत्तियां अर्पित करें। इसके बाद बेसन या बूंदी के 21 मोदक/लड्डू का भोग लगाएं। संकष्टी व्रत की पौराणिक कथा ध्यान से सुनें।
  • चंद्र दर्शन और अर्घ्य: रात को 07:54 PM पर जब चंद्र देव उदित हों, तो चांदी के लोटे में जल, दूध, चंदन और अक्षत मिलाकर चंद्रमा को अर्घ्य दें। इसके बाद बप्पा का प्रसाद खाकर व्रत का पारण करें।

संकष्टी चतुर्थी के जरूरी नियम (Rules)

इस पावन अनुष्ठान का पूरा फल पाने के लिए इन व्रत के नियम का पालन जरूर करें:

  • चंद्र दर्शन के बिना पारण निषेध: जब तक आसमान में चंद्रमा न दिख जाए या चंद्रोदय का समय न हो जाए, तब तक अन्न का एक दाना भी ग्रहण न करें।
  • तुलसी दल वर्जित: भगवान गणेश की पूजा में कभी भी तुलसी के पत्ते का प्रयोग न करें, यह शास्त्रों में वर्जित माना गया है।
  • पूर्ण सात्विकता: इस दिन घर की रसोई में प्याज, लहसुन या किसी भी प्रकार का तामसिक भोजन बिल्कुल न बनने दें।

वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी व्रत के महालाभ (Benefits)

जो श्रद्धालु पूरे नियम और विश्वास से यह व्रत रखते हैं, उन्हें निम्नलिखित लाभ मिलते हैं:

  • संकटों से मुक्ति: कोर्ट-कचहरी के मामले, भारी कर्ज और पारिवारिक झगड़ों से मुक्ति का महा लाभ मिलता है।
  • बुद्धि और करियर में उन्नति: बच्चों की एकाग्रता बढ़ती है और नौकरी में मनचाहा प्रमोशन मिलता है।
  • घर में सुख-शांति: गणेश जी की कृपा से घर की नकारात्मक ऊर्जा विदा होती है और रिद्धि-सिद्धि का वास होता है।

क्या करें और क्या न करें (Do's and Don'ts)

क्या करें:

  • पूजा संपन्न होने के बाद गाय को हरा चारा या गुड़-लोई अवश्य खिलाएं, इससे गणेश जी अत्यंत प्रसन्न होते हैं।
  • इस दिन अपने माता-पिता के पैर छूकर उनका आशीर्वाद जरूर लें।

क्या न करें:

  • संकष्टी चतुर्थी के दिन किसी भी बेजुबान जानवर (विशेषकर चूहे, जो बप्पा का वाहन है) को न मारें और न ही परेशान करें।
  • दिनभर में किसी भी व्यक्ति से कटु वचन न बोलें और न ही किसी की निंदा करें।

पौराणिक व्रत कथा: जब देवताओं के संकट हरने प्रकट हुए गजानन (Story)

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार सभी देवता भगवान शिव के पास अपनी विकट समस्याएं लेकर आए। वे अत्यंत भयभीत थे क्योंकि असुरों का अत्याचार बहुत बढ़ गया था। महादेव ने अपने दोनों पुत्रों कार्तिकेय और गणेश को अपने पास बुलाया और पूछा कि तुम दोनों में से कौन देवताओं के संकटों को दूर कर सकता है? तब दोनों भाइयों ने स्वयं को श्रेष्ठ बताया।

परीक्षा स्वरूप महादेव ने कहा "तुम दोनों में से जो भी सबसे पहले पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करके आएगा, वही देवताओं का तारणहार बनेगा।” कार्तिकेय तुरंत अपने वाहन मयूर (मोर) पर सवार होकर पृथ्वी की परिक्रमा के लिए निकल पड़े। लेकिन गणेश जी का वाहन मूषक था और उनका शरीर भारी था, जिससे उनके लिए यह कठिन था।

गणेश जी ने अपनी तीव्र बुद्धि का प्रयोग किया। उन्होंने अपने माता-पिता (भगवान शिव और माता पार्वती) को एक ऊंचे आसन पर बिठाया और आदरपूर्वक उनकी सात बार परिक्रमा कर ली। शास्त्रों में माता-पिता की परिक्रमा को पूरी पृथ्वी की परिक्रमा के समान माना गया है। गणेश जी की इस बुद्धिमत्ता और भक्ति को देखकर महादेव अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने गणेश जी को प्रथम पूज्य होने का वरदान दिया। इसी महाविजय और देवताओं के संकट दूर होने के पावन दिन को वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी 2026 (Vakratunda Sankashti 2026) के रूप में याद किया जाता है।

निष्कर्ष: विघ्नहर्ता के चरणों में ही हर दुख का अंत है (Conclusion)

वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी 2026 (Vakratunda Sankashti 2026) केवल एक व्रत की तारीख नहीं है, यह बप्पा के प्रति हमारे गहरे विश्वास और सनातनी जड़ों से जुड़ने का जरिया है। जब आप 28 अक्टूबर 2026 की शाम को बुधवार के महायोग में मोदक की थाल सजाकर बप्पा के सामने बैठेंगे, तो अपनी सारी चिंताएं उनके बड़े पेट में विसर्जित कर दीजिएगा। विश्वास रखिए, जिसके रक्षक स्वयं गजानन हों, उसका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता। वक्रतुंड महागणपति का आशीर्वाद आपके पूरे परिवार को हमेशा खुशहाल और समृद्ध रखे।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

  1. वर्ष में वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी 2026 (Vakratunda Sankashti 2026) कब है?
    साल में वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी 2026 (Vakratunda Sankashti 2026)का पावन व्रत 28 अक्टूबर, दिन बुधवार को रखा जाएगा।
  1. इस दिन चंद्रोदय (चांद निकलने) का समय क्या है?
    28 अक्टूबर 2026 को चंद्रोदय का सटीक समय रात 07:54 PM है। इसी समय के बाद अर्घ्य दिया जा सकेगा।
  1. क्या बुधवार के दिन यह व्रत पड़ने से कोई विशेष लाभ होता है?
    जी हाँ, बुधवार का दिन गणेश जी का ही दिन है, इसलिए इस दिन व्रत रखने से कुंडली में बुध ग्रह मजबूत होता है और व्यापार व शिक्षा में अद्भुत लाभ मिलता है।
  1. गणेश जी की पूजा में क्या चढ़ाना सबसे अनिवार्य है?
    बप्पा की पूजा में दूर्वा घास (दूब) और मोदक या बूंदी के लड्डू चढ़ाना सबसे अनिवार्य माना जाता है।
  1. क्या इस व्रत को बिना पानी पिए रखना जरूरी है?
    यह आपकी शारीरिक क्षमता पर निर्भर करता है। सामान्यतः इसे निर्जला रखा जाता है, लेकिन अस्वस्थ होने पर फलाहार और जल ग्रहण करके भी व्रत किया जा सकता है।
Author: Neha Jain – Cultural & Festival Content Writer

Neha Jain is a festival writer with 7+ years’ experience explaining Indian rituals, traditions, and their cultural meaning, making complex customs accessible and engaging for today’s modern readers.