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March 26, 2026 Blog

Devshayani Ekadashi 2026: इस साल कब मनाई जाएगी देवशयनी एकादशी, जानिए तिथि, मुहूर्त , पूजा विधि

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Devshayani Ekadashi 2026: हिंदू पंचांग के अनुसार, हर महीने के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि भगवान विष्णु को समर्पित मानी जाती है। इस दिन भक्त व्रत रखकर पूरी श्रद्धा के साथ लक्ष्मी नारायण की पूजा करते हैं। मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से व्यक्ति की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और जीवन में आने वाली बाधाएं धीरे-धीरे दूर हो जाती हैं।

धार्मिक विश्वास के अनुसार, एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति के जाने-अनजाने में हुए पापों का क्षय होता है। इतना ही नहीं, इसे करने से मृत्यु के बाद उत्तम लोक की प्राप्ति का भी आशीर्वाद मिलता है। आइए अब देवशयनी एकादशी 2026 (Devshayani Ekadashi 2026 Date) की तिथि और उससे जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी को विस्तार से जानते हैं।


कब मनाई जाती है देवशयनी एकादशी? (When is Devshayani Ekadashi Celebrated?)

देवशयनी एकादशी हर वर्ष आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है, जो दशमी के अगले दिन आती है। इस पावन अवसर पर भक्तगण भगवान लक्ष्मी-नारायण की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं और श्रद्धा के साथ व्रत रखते हैं।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन से भगवान विष्णु क्षीर सागर में योग निद्रा में चले जाते हैं, जिसे “चातुर्मास” की शुरुआत भी माना जाता है। इसके बाद कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को भगवान विष्णु जागते हैं, जिसे देवउठनी एकादशी के रूप में मनाया जाता है। यह समय भक्तों के लिए विशेष रूप से पूजा, साधना और नियम पालन का माना जाता है।

देवशयनी एकादशी शुभ मुहूर्त (Devshayani Ekadashi Shubh Muhurat)

वैदिक पंचांग के अनुसार, आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 24 जुलाई को सुबह 09 बजकर 12 मिनट से आरंभ होगी और 25 जुलाई को दोपहर 11 बजकर 34 मिनट पर समाप्त हो जाएगी।

सनातन परंपरा में उदया तिथि को प्रमुख माना जाता है, इसलिए इस वर्ष देवशयनी एकादशी 25 जुलाई को मनाई जाएगी। इसी पावन दिन से चातुर्मास की शुरुआत भी होती है, जिसे साधना, नियम और भक्ति के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण समय माना जाता है।

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कब रखें एकादशी का व्रत (When Is Devshayani Ekadashi 2026 Vrat)

तिथि गणना के अनुसार कई बार एकादशी दो दिनों में पड़ती है। ऐसे में सामान्य श्रद्धालु पहले दिन व्रत रखते हैं, जबकि वैष्णव परंपरा के लोग दूसरे दिन एकादशी का पालन करते हैं। इस वर्ष देवशयनी एकादशी 25 जुलाई को मनाई जाएगी, इसलिए इसी दिन व्रत रखना श्रेष्ठ माना गया है।

देवशयनी एकादशी पारण समय (Devshayani Ekadashi Parana Timing)

एकादशी व्रत का पारण 26 जुलाई को किया जाएगा। इस दिन प्रातः 05 बजकर 39 मिनट से 08 बजकर 22 मिनट के बीच स्नान और पूजा करने के बाद विधिपूर्वक लक्ष्मी-नारायण की आराधना करें। इसके पश्चात अन्न का दान कर व्रत का समापन करना शुभ माना जाता है।


देवशयनी एकादशी शुभ योग (Devshayani Ekadashi Shubh Yog)

इस बार आषाढ़ शुक्ल एकादशी पर ब्रह्म योग और इंद्र योग जैसे कई शुभ संयोग बन रहे हैं। साथ ही शिववास योग का भी निर्माण हो रहा है। इन विशेष योगों में भगवान लक्ष्मी-नारायण की पूजा करने से साधक को विशेष कृपा और मनचाहे फल की प्राप्ति होती है।


देवशयनी एकादशी की पूजा विधि (Devshayani Ekadashi Puja Vidhi)

देवशयनी एकादशी के दिन विधिपूर्वक पूजा करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। इस दिन पूजा करने की सरल और पारंपरिक विधि इस प्रकार है—

पूजा की तैयारी:
सबसे पहले पूजा स्थान को अच्छी तरह साफ करें और एक पीला वस्त्र बिछाकर उस पर भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें।

अभिषेक करें:
भगवान को पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और शक्कर) से स्नान कराएं। इसके बाद साफ जल से शुद्धि करें और उन्हें सुंदर वस्त्र पहनाएं।

मंत्र और अर्पण:
भगवान विष्णु को तुलसी दल अर्पित करें और श्रद्धा के साथ “सुप्ते त्वयी जगन्नाथे जगत सुप्तम भवेदिदम्” मंत्र का जाप करें।

शयन अनुष्ठान:
इस दिन भगवान को शयन कराने की परंपरा भी है। इसके लिए मूर्ति को सफेद कपड़े से ढक दिया जाता है या प्रतीकात्मक रूप से छोटे से पलंग पर सुलाया जाता है, जो उनके योगनिद्रा में जाने का संकेत होता है।

व्रत पारण:
अगले दिन द्वादशी तिथि पर ब्राह्मण या जरूरतमंद को भोजन कराने के बाद स्वयं व्रत का पारण करें।

इस तरह श्रद्धा और नियम के साथ की गई पूजा से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है।

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देवशयनी एकादशी व्रत कथा (Devshayani Ekadashi Vrat Katha)

इस पावन कथा का वर्णन भगवान ब्रह्मा ने ऋषि नारद को किया था।

प्राचीन समय में राजा मंधाता का राज्य अत्यंत समृद्ध था, लेकिन एक बार वहाँ लगातार तीन वर्षों तक भयंकर सूखा पड़ा। नदियाँ सूख गईं, खेत बंजर हो गए और प्रजा को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। अपनी प्रजा के दुख से व्याकुल होकर राजा मंधाता समाधान की तलाश में वन की ओर निकल पड़े।

वन में उनकी भेंट महान ऋषि अंगिरस से हुई। राजा ने उन्हें अपनी समस्या बताई, तब ऋषि अंगिरस ने उन्हें देवशयनी एकादशी का व्रत करने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि सत्ययुग में छोटे-छोटे दोष भी बड़े संकट का कारण बन जाते हैं, और यह व्रत भगवान विष्णु को प्रसन्न कर सभी पापों का नाश करने में सक्षम है।

ऋषि की बात मानकर राजा मंधाता अपनी राजधानी लौटे और उन्होंने पूरी प्रजा के साथ मिलकर श्रद्धा और नियमपूर्वक इस व्रत का पालन किया। उनकी सच्ची भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने राज्य पर खूब वर्षा की कृपा बरसाई। देखते ही देखते सूखा समाप्त हो गया, हरियाली लौट आई और राज्य फिर से खुशहाली से भर गया।

निष्कर्ष

देवशयनी एकादशी (Devshayani Ekadashi ) केवल एक व्रत या धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, श्रद्धा और अनुशासन का प्रतीक है। इस दिन भगवान विष्णु की भक्ति, नियमपूर्वक व्रत और पूजा-अर्चना करने से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं। यह पावन अवसर हमें सिखाता है कि सच्ची आस्था और सामूहिक प्रयास से बड़ी से बड़ी समस्या का समाधान संभव है।

चातुर्मास की शुरुआत के साथ यह समय साधना, संयम और अच्छे कर्मों के लिए विशेष माना जाता है। यदि इस दिन श्रद्धा और विश्वास के साथ व्रत और पूजा की जाए, तो न केवल मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, बल्कि जीवन में सुख, शांति और समृद्धि भी बनी रहती है।

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