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March 17, 2026 Blog

Nirjala Ekadashi 2026: इस साल कब है निर्जला एकादशी, पूजन का शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

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Nirjala Ekadashi 2026: सनातन धर्म में ज्येष्ठ माह का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। यह महीना भगवान विष्णु की आराधना और भक्ति के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। इसी पावन माह में निर्जला एकादशी का व्रत रखा जाता है, जिसे सबसे पुण्यदायी एकादशियों में से एक माना जाता है। धर्मग्रंथों में इस व्रत की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है। मान्यता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा और नियम के साथ निर्जला एकादशी का व्रत (Nirjala Ekadashi Vrat) करता है, उसे वर्ष भर की सभी एकादशियों के व्रत के बराबर पुण्य प्राप्त होता है। इस कारण इसे भीमसेनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। आइए, इस पवित्र व्रत से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें विस्तार से जानते हैं।


कब मनाई जाती है निर्जला एकादशी? (When is Nirjala Ekadashi celebrated?)

निर्जला एकादशी हर वर्ष ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है। इस पावन दिन पर भक्त भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की श्रद्धा के साथ पूजा करते हैं और दिनभर का कठोर व्रत रखते हैं। इस व्रत का विशेष नियम यह है कि इसमें उपवास के दौरान जल तक का सेवन नहीं किया जाता, इसलिए इसे निर्जला एकादशी (Nirjala Ekadashi 2026) कहा जाता है। व्रत रखने वाले भक्त एकादशी के दिन सूर्योदय से लेकर अगले दिन द्वादशी तिथि के सूर्योदय तक अन्न और जल का त्याग करते हैं और फिर द्वादशी तिथि में विधि-विधान से व्रत का पारण करते हैं।

वैदिक पंचांग के अनुसार इस वर्ष ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी तिथि 24 जून को शाम 6 बजकर 12 मिनट पर आरंभ होगी और 25 जून को रात 8 बजकर 9 मिनट पर समाप्त होगी। इसलिए उदया तिथि के आधार पर निर्जला एकादशी (Nirjala Ekadashi 2026 Date) का व्रत 25 जून को रखा जाएगा।

निर्जला एकादशी तिथि (Nirjala Ekadashi 2026 Date)

  • प्रारंभ: 24 जून, शाम 6:12 बजे
  • समापन: 25 जून, रात 8:09 बजे
nirjala ekadashi

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निर्जला एकादशी पारण का समय (Nirjala Ekadashi 2026 Parana Time)

निर्जला एकादशी का व्रत द्वादशी तिथि के दिन विधि-विधान के साथ खोला जाता है, जिसे पारण कहा जाता है। इस वर्ष साधक 07 जून को दोपहर 01 बजकर 44 मिनट से शाम 04 बजकर 31 मिनट के बीच व्रत का पारण कर सकते हैं। हालांकि, सही और स्थान विशेष के अनुसार पारण का समय जानने के लिए स्थानीय पंडित या विद्वान से परामर्श लेना भी उचित माना जाता है।

पारण के दिन सुबह स्नान करके भगवान लक्ष्मी-नारायण की श्रद्धापूर्वक पूजा करनी चाहिए। इसके बाद जरूरतमंद लोगों को अन्न या अन्य वस्तुओं का दान देना शुभ माना जाता है। पूजा और दान के पश्चात विधिपूर्वक व्रत का पारण कर उपवास को समाप्त किया जाता है। ऐसा करने से व्रत का पूरा पुण्य फल प्राप्त होता है। 

निर्जला एकादशी पर बन रहे विशेष योग (Special yoga is being formed on Nirjala Ekadashi)

इस वर्ष निर्जला एकादशी के दिन कई शुभ और दुर्लभ योगों का संयोग बन रहा है, जो इस व्रत के महत्व को और अधिक बढ़ा देता है। इस दिन शिव योग और सिद्ध योग का निर्माण हो रहा है, जिन्हें धार्मिक दृष्टि से अत्यंत शुभ माना जाता है। इसके साथ ही रवि योग भी बन रहा है, जो किसी भी शुभ कार्य और पूजा-पाठ के लिए अनुकूल माना जाता है।

नक्षत्रों की दृष्टि से भी यह दिन विशेष रहने वाला है, क्योंकि इस समय स्वाति और विशाखा नक्षत्र का प्रभाव रहेगा। इसके अलावा अभिजित मुहूर्त के साथ वणिज और बव करण का संयोग भी बन रहा है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार ऐसे शुभ योगों में भगवान विष्णु की पूजा, व्रत और दान-पुण्य करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है और साधक को पुण्य लाभ मिलता है।

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निर्जला एकादशी की व्रत विधि (Fasting method of Nirjala Ekadashi)

निर्जला एकादशी को सबसे कठोर और नियमों वाला व्रत माना जाता है, क्योंकि इस दिन व्रती पूरे दिन अन्न के साथ-साथ जल का भी त्याग करते हैं। इस व्रत की शुरुआत प्रातःकाल सूर्योदय से पहले स्नान करके की जाती है। इसके बाद श्रद्धा और नियम के साथ भगवान विष्णु की पूजा की जाती है और पूरे दिन उपवास रखा जाता है। व्रत रखने वाला व्यक्ति अगले दिन द्वादशी तिथि में पारण होने तक न तो भोजन करता है और न ही जल ग्रहण करता है।

धार्मिक मान्यता है कि इस व्रत का पालन करने से व्यक्ति के मन और आत्मा की शुद्धि होती है तथा संयम और भक्ति की भावना मजबूत होती है। व्रत के दौरान भगवान विष्णु का ध्यान करना, तुलसी की पूजा करना, भजन-कीर्तन करना और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है। श्रद्धा और नियम के साथ किया गया यह व्रत भगवान की कृपा प्राप्त करने का एक श्रेष्ठ माध्यम माना जाता है।

पांडवों और निर्जला एकादशी की कथा (Nirjala Ekadashi Ki Katha)

पौराणिक कथाओं के अनुसार जब महर्षि वेदव्यास ने पांडवों को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति के लिए वर्ष भर में आने वाली सभी एकादशियों का व्रत रखने का उपदेश दिया, तब भीमसेन ने अपनी कठिनाई प्रकट की। उन्होंने विनम्रता से कहा कि वे भोजन के बिना लंबे समय तक नहीं रह सकते। भीम ने बताया कि उनके पेट में ‘वृक’ नाम की अग्नि रहती है, जिसे शांत करने के लिए उन्हें बार-बार और अधिक मात्रा में भोजन करना पड़ता है। इसलिए वे नियमित उपवास करना अपने लिए कठिन समझते थे और चिंतित थे कि कहीं वे एकादशी के पुण्य से वंचित न रह जाएं।

भीम की बात सुनकर महर्षि वेदव्यास ने उन्हें एक सरल उपाय बताया। उन्होंने कहा कि धर्म में हर व्यक्ति की क्षमता और परिस्थिति के अनुसार मार्ग बताए गए हैं। यदि भीम ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की निर्जला एकादशी का व्रत पूरी श्रद्धा और नियम के साथ करें, तो उन्हें पूरे वर्ष की सभी एकादशियों के व्रत के समान पुण्य प्राप्त होगा। इस व्रत के प्रभाव से व्यक्ति को सुख, यश और अंततः मोक्ष की प्राप्ति भी होती है।

महर्षि वेदव्यास के इस आश्वासन के बाद भीमसेन ने निर्जला एकादशी का व्रत करने का संकल्प लिया। तभी से यह मान्यता प्रचलित हुई कि जो भी भक्त इस एकादशी का व्रत करता है, उसे सभी एकादशियों के समान फल मिलता है। इसी कारण इस पावन व्रत को भीमसेनी एकादशी या पांडव एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।


निष्कर्ष

निर्जला एकादशी (Nirjala Ekadashi 2026) हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र और फलदायी व्रत माना जाता है। यह व्रत केवल उपवास रखने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति को आत्मसंयम, श्रद्धा और भक्ति का महत्व भी सिखाता है। भगवान विष्णु की आराधना के साथ श्रद्धा और नियम से किया गया यह व्रत साधक को आध्यात्मिक शांति प्रदान करता है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।

मान्यता है कि निर्जला एकादशी का व्रत करने से सभी एकादशियों के बराबर पुण्य फल प्राप्त होता है और व्यक्ति के पापों का नाश होता है। इसलिए इस पावन दिन पर भक्त पूरी श्रद्धा से भगवान विष्णु की पूजा करते हैं, दान-पुण्य करते हैं और ईश्वर से सुख-समृद्धि तथा मंगलमय जीवन की कामना करते हैं।

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