Papmochani Ekadashi 2026: जीवन की राह पर चलते हुए हम सभी अपने पिछले कर्मों का असर साथ लेकर चलते हैं—चाहे वे जानबूझकर किए गए हों या अनजाने में। कई बार मन में यह इच्छा उठती है कि काश कोई ऐसा अवसर मिले, जब हम भीतर से हल्का महसूस कर सकें और नई शुरुआत कर सकें।
पापमोचन एकादशी इसी भाव को समर्पित एक पावन दिन है। इसके नाम में ही इसका अर्थ छिपा है—‘पाप’ यानी गलत कर्म और ‘मोचन’ यानी उनसे मुक्ति। अर्थात यह वह एकादशी है, जो आत्मा को नकारात्मक कर्मों के बोझ से मुक्त करने का संदेश देती है। यह तिथि भगवान विष्णु की उपासना के लिए समर्पित होती है और चैत्र मास के कृष्ण पक्ष में आती है। इसका मुख्य उद्देश्य भक्तों को आत्मचिंतन का अवसर देना, बीते कर्मों का प्रायश्चित करने की प्रेरणा देना और आध्यात्मिक रूप से शुद्ध एवं सकारात्मक जीवन की ओर अग्रसर करना है।
धार्मिक विश्वास है कि इस दिन सच्चे मन से की गई पूजा, व्रत और दान से जीवन के कष्ट दूर होते हैं तथा मन में शांति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। पापमोचनी एकादशी (Papmochani Ekadashi 2026) आत्मशुद्धि, संयम और भक्ति का संदेश देती है, इसलिए इसे आध्यात्मिक उन्नति का विशेष अवसर माना जाता है।
वर्ष 2026 में पापमोचनी एकादशी चैत्र माह के कृष्ण पक्ष में मनाई जाएगी। हिंदू पंचांग के अनुसार यह तिथि उदया काल के आधार पर मान्य होती है। इस दिन देशभर के मंदिरों में भगवान विष्णु की विशेष आराधना की जाती है। भक्त प्रातःकाल स्नान कर व्रत का संकल्प लेते हैं और पूरे दिन सात्विक जीवन अपनाते हैं। यह एकादशी होली के बाद आने वाली पहली एकादशी मानी जाती है, इसलिए इसका आध्यात्मिक महत्व और भी बढ़ जाता है।
व्रत का पारण (व्रत खोलने का शुभ समय) अगले दिन,
निर्धारित समय के अनुसार श्रद्धा और विधि से व्रत का पालन करना शुभ माना जाता है।
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‘पापमोचनी’ शब्द अपने आप में इसका अर्थ स्पष्ट कर देता है—पापों से छुटकारा दिलाने वाली। मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन और शुद्ध भाव से भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की उपासना करने से जीवन में संचित नकारात्मक कर्मों का प्रभाव कम होता है। यह केवल बाहरी अनुष्ठान नहीं, बल्कि भीतर से पश्चाताप, सुधार और सकारात्मक संकल्प लेने का अवसर भी है।
चैत्र मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली यह एकादशी, हिंदू नववर्ष और चैत्र नवरात्रि से पहले की अंतिम एकादशी मानी जाती है। इसलिए इसका आध्यात्मिक महत्व और बढ़ जाता है। यह भक्तों को आत्मशुद्धि का एक विशेष अवसर देती है, ताकि वे आने वाले पवित्र पर्वों में निर्मल मन और नई ऊर्जा के साथ प्रवेश कर सकें।
पापमोचनी एकादशी केवल कर्मों के प्रायश्चित तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मन और चेतना की शुद्धि पर भी जोर देती है। इस दिन हरे कृष्ण महामंत्र का जाप, भजन-कीर्तन, हरिनाम संकीर्तन, अन्नदान, गौसेवा या अन्य सेवा कार्य करने से व्यक्ति के भीतर सकारात्मकता का संचार होता है। ऐसी भक्ति गतिविधियाँ मन को स्थिर करती हैं और नकारात्मक विचारों व आदतों से दूर रहने की प्रेरणा देती हैं।
मोक्ष का अर्थ है जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति—आध्यात्मिक दृष्टि से यह जीवन की सर्वोच्च अवस्था मानी गई है। श्रद्धा और नियमपूर्वक पापमोचनी एकादशी का पालन करने से व्यक्ति आत्मिक उन्नति की ओर अग्रसर होता है। भगवद् गीता में भी कहा गया है कि जो भक्त परमात्मा को प्राप्त कर लेता है, वह इस दुखमय संसार के चक्र में पुनः नहीं लौटता, क्योंकि वह सर्वोच्च सिद्धि को प्राप्त कर चुका होता है।
इस प्रकार, पापमोचनी एकादशी केवल एक व्रत नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, शुद्धि और आध्यात्मिक प्रगति का महत्वपूर्ण अवसर है।
धर्म ग्रंथों में बताया गया है कि पापमोचनी एकादशी मनुष्य के मन को निर्मल बनाती है। जाने-अनजाने में किए गए गलत कर्म, क्रोध, अहंकार और ईर्ष्या जैसे दोष इस व्रत के प्रभाव से कम होने लगते हैं। यह एकादशी हमें क्षमा, करुणा और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। माना जाता है कि जो व्यक्ति इस दिन भगवान विष्णु का नाम जपता है, उसके जीवन के संकट धीरे-धीरे दूर हो जाते हैं।
पापमोचनी एकादशी का व्रत रखने वाले भक्त एक दिन पहले से ही तैयारी आरंभ कर देते हैं। दशमी तिथि को सात्विक और हल्का भोजन ग्रहण किया जाता है। घर की सफाई, पूजा स्थान की शुद्धि और आवश्यक पूजा सामग्री पहले से जुटा ली जाती है। एकादशी के दिन प्रातः स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनकर भगवान विष्णु के सामने व्रत का संकल्प लिया जाता है।
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पापमोचनी एकादशी का व्रत श्रद्धा और नियमों के साथ किया जाए तो इसका आध्यात्मिक लाभ अधिक माना जाता है। यह व्रत मन, शरीर और आत्मा की शुद्धि के लिए रखा जाता है। इसकी सरल विधि इस प्रकार है:
ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें। इसके बाद भगवान विष्णु के सामने बैठकर व्रत का संकल्प लें। मन ही मन यह निश्चय करें कि आप दिनभर श्रद्धा, संयम और नियमों का पालन करेंगे।
पूजा स्थान को साफ-सुथरा करें। भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। पूजा सामग्री में तुलसी दल, फूल, फल, धूप, दीप, चंदन और प्रसाद शामिल रखें।
पूजा के दौरान “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप करें। विष्णु सहस्रनाम या नारायण स्तोत्र का पाठ करना भी शुभ माना जाता है। इससे मन में शांति और भक्ति भाव जागृत होता है।
पापमोचनी एकादशी की कथा पढ़ना या सुनना इस व्रत का महत्वपूर्ण अंग है। इससे व्रत का महत्व समझ में आता है और श्रद्धा मजबूत होती है।
रात में भगवान विष्णु के भजन गाएं या कीर्तन करें। यदि संभव हो तो जागरण भी करें, क्योंकि इसे पुण्य बढ़ाने वाला माना जाता है।
अगले दिन द्वादशी तिथि में स्नान के बाद ब्राह्मणों या जरूरतमंद लोगों को भोजन और दान दें। इसके बाद विधि अनुसार व्रत का पारण करें।
श्रद्धा, संयम और सच्चे मन से किया गया यह व्रत आत्मिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है।
पापमोचनी एकादशी (Papmochani Ekadashi 2026) केवल उपवास का नाम नहीं है, बल्कि यह आत्मसंयम का अभ्यास है। इस दिन झूठ बोलना, किसी की निंदा करना और क्रोध करना वर्जित माना जाता है। भोजन में अनाज का त्याग कर फलाहार या निर्जल व्रत किया जाता है। सात्विक आहार और सरल व्यवहार को अपनाने से व्रत का वास्तविक फल प्राप्त होता है।
पापमोचनी एकादशी की कथा का वर्णन प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। यह प्रसंग भगवान श्रीकृष्ण और धर्मराज युधिष्ठिर के संवाद के माध्यम से बताया गया है। (Papmochani Ekadashi Ki katha)
कथा के अनुसार, चित्ररथ वन में मेधावी नाम के एक तपस्वी ऋषि कठोर साधना किया करते थे। वे भगवान शिव के परम भक्त थे और गहन ध्यान में लीन रहते थे। उसी वन में देवराज इंद्र भी कभी-कभी अप्सराओं के साथ आया करते थे। उन्हीं अप्सराओं में से एक, मंजुघोषा, ऋषि मेधावी की तपस्या और तेज से प्रभावित हो गई। धीरे-धीरे उसके मन में आकर्षण उत्पन्न हुआ और उसने उनकी साधना भंग करने का विचार किया।
मंजुघोषा ने वन में रहकर मधुर गीतों के माध्यम से ऋषि का ध्यान अपनी ओर खींचने का प्रयास किया। शुरुआत में मेधावी अपनी तपस्या में अडिग रहे, लेकिन समय के साथ वे उसके आकर्षण में पड़ गए और उनका ध्यान भंग हो गया। वे सांसारिक मोह में इतने डूब गए कि उन्हें समय का भी बोध नहीं रहा। कहा जाता है कि वे दोनों कई वर्षों तक साथ रहे।
एक दिन मंजुघोषा ने वहाँ से जाने का निश्चय किया। तब ऋषि को अपनी भूल का एहसास हुआ। उन्हें लगा कि उन्होंने अपनी तपस्या और संयम खो दिया है। क्रोध और पश्चाताप में उन्होंने मंजुघोषा को श्राप दे दिया। बाद में जब उनका क्रोध शांत हुआ, तो वे स्वयं भी दुखी हुए और अपने पिता ऋषि च्यवन के पास गए।
ऋषि च्यवन ने उन्हें समझाया कि पश्चाताप और भगवान विष्णु की भक्ति ही इस भूल का प्रायश्चित है। उन्होंने पापमोचनी एकादशी का व्रत (Papmochani Ekadashi vrat) रखने और श्रद्धा से भगवान विष्णु की पूजा करने की सलाह दी। कहा गया कि इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य अपने पापों से मुक्त होकर पुनः शुद्ध जीवन की ओर अग्रसर हो सकता है।
यह कथा हमें संयम, आत्मचिंतन और भक्ति की शक्ति का संदेश देती है।
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इस दिन दान को बहुत पुण्यकारी माना गया है। जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र या जल देना श्रेष्ठ कर्म है। मंदिरों में भंडारा करना, गाय को चारा खिलाना और असहाय लोगों की सहायता करना भगवान को प्रसन्न करता है। दान से मन में करुणा का भाव जागता है।
आज के व्यस्त जीवन में यह एकादशी मन को शांति देने का माध्यम बनती है। यह सिखाती है कि सुख अच्छे विचारों में है, न कि केवल भौतिक साधनों में। एक दिन का संयम भी मनुष्य को नई ऊर्जा दे देता है।
इस दिन पूरा परिवार साथ पूजा करता है। बच्चों में संस्कार विकसित होते हैं और घर में सकारात्मक वातावरण बनता है। समाज में सहयोग और भाईचारे की भावना मजबूत होती है।
तुलसी में जल अर्पित करना, मंदिर में दीपक जलाना, गीता पाठ करना, जरूरतमंद को भोजन कराना और मीठे वचन बोलना इस दिन के उत्तम उपाय हैं। इनसे जीवन में शुभता आती है।
यह एकादशी बताती है कि मनुष्य अपने कर्मों से ही मुक्त होता है। बुराइयों को छोड़कर भक्ति का मार्ग अपनाने से जीवन सरल और सुंदर बनता है।
पापमोचनी एकादशी (Papmochani Ekadashi) जीवन सुधारने का पावन अवसर है। यह दिन नई शुरुआत, पश्चाताप और आत्मशुद्धि की प्रेरणा देता है। सच्चे मन से किया गया व्रत व्यक्ति के जीवन में शांति, संतोष और सकारात्मकता भर देता है। भगवान विष्णु की कृपा से भय और बाधाएँ दूर होती हैं और मनुष्य उज्ज्वल भविष्य की ओर बढ़ता है।
पापमोचनी एकादशी (Papmochani Ekadashi) आत्मशुद्धि, पश्चाताप और आध्यात्मिक जागरण का विशेष अवसर है। यह केवल एक व्रत नहीं, बल्कि जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने का संकल्प भी है। श्रद्धा, नियम और भक्ति के साथ किया गया यह व्रत मन को शांति, कर्मों को शुद्धता और जीवन को नई दिशा देने में सहायक माना जाता है। भगवान विष्णु की कृपा से साधक अपने भीतर की नकारात्मकता को त्यागकर धर्म और सद्गुणों के मार्ग पर आगे बढ़ सकता है।
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Meera Joshi, a spiritual writer with 12+ years’ expertise, documents pooja vidhis and rituals, simplifying traditional ceremonies for modern readers to perform with faith, accuracy, and devotion.