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August 18, 2026 Blog

Devutthana Ekadashi 2026: जानिए सही तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, महत्व और कथा

BY : Neha Jain – Cultural & Festival Content Writer

चार महीने की लंबी योगनिद्रा के बाद जब सृष्टि के पालनहार भगवान श्री हरि विष्णु जागते हैं, तो पूरे ब्रह्मांड में भक्ति, आनंद और शुभता की नई तरंगें दौड़ने लगती हैं। चातुर्मास के सन्नाटे को तोड़कर विवाह, मुंडन और नए कार्यों के शहनाई की गूंज फिर से सुनाई देने लगती है। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की इस पावन एकादशी को हम देवउठनी एकादशी 2026 (Devutthana Ekadashi 2026), प्रबोधिनी एकादशी या देवोत्थान एकादशी के नाम से जानते हैं। यह केवल एक तिथि नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रति हमारे अटूट विश्वास, समर्पण और प्रतीक्षा का फल है। इस दिन जब भक्त भावविभोर होकर प्रभु के चरणों में दीप जलाते हैं और उन्हें जगाते हैं, तो जीवन के सारे कष्ट और अंधकार पल भर में छंट जाते हैं। यदि आप भी वर्ष में देवउठनी एकादशी 2026 (Devutthana Ekadashi 2026) की सही तिथि, शुभ मुहूर्त और संपूर्ण पूजन विधि की तलाश कर रहे हैं, तो यह लेख आपके लिए संपूर्ण मार्गदर्शिका साबित होगा।

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देवउठनी एकादशी क्या है? (Introduction)

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को देवउठनी एकादशी 2026 (Devutthana Ekadashi 2026) या देवोत्थान एकादशी कहा जाता है। आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी एकादशी) को क्षीरसागर में चार महीनों के लिए योगनिद्रा में जाने वाले भगवान विष्णु इसी पावन दिन जागते हैं। इस दिन से ही चार महीनों से रुके हुए सभी प्रकार के मांगलिक और शुभ कार्य जैसे विवाह, सगाई, गृह प्रवेश और मुंडन संस्कार पुनः आरंभ हो जाते हैं। इस दिन भगवान विष्णु के स्वरूप शालिग्राम और माता तुलसी का विवाह रचाने की भी विशेष परंपरा है। भक्त इस दिन निर्जला या फलाहारी उपवास रखकर प्रभु की विशेष आराधना करते हैं।

देवउठनी एकादशी 2026 तिथि और शुभ मुहूर्त (Date and time)

वर्ष  में देवउठनी एकादशी (Devutthana Ekadashi 2026) का महापर्व 20 नवंबर, शुक्रवार को पूरे देश में अपार श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाएगा। पंचांग के अनुसार तिथियों और पारण के शुभ समय का विवरण नीचे दिया गया है:

  • देवउठनी एकादशी तिथि: 20 नवंबर 2026, शुक्रवार
  • कार्तिक शुक्ल एकादशी तिथि प्रारंभ: 19 नवंबर 2026 को रात 11:20 बजे से
  • कार्तिक शुक्ल एकादशी तिथि समाप्त: 20 नवंबर 2026 को रात 09:45 बजे तक
  • पूजा का सबसे शुभ मुहूर्त (प्रातःकाल): सुबह 06:46 बजे से सुबह 09:30 बजे तक
  • अमृत सर्वोत्तम मुहूर्त: सुबह 08:08 बजे से सुबह 09:30 बजे तक
  • व्रत पारण का समय: 21 नवंबर 2026, शनिवार को सुबह 06:47 बजे से सुबह 08:55 बजे तक

देवउठनी एकादशी का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व (Importance)

धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार देवउठनी एकादशी का आध्यात्मिक महत्व अत्यंत विशाल है। शास्त्रों में सभी 24 एकादशियों में से देवउठनी एकादशी 2026 (Devutthana Ekadashi 2026) को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। पद्म पुराण के अनुसार जो फल अश्वमेध यज्ञ करने से मिलता है, उससे कहीं अधिक फल देवउठनी एकादशी 2026 (Devutthana Ekadashi 2026) का व्रत रखने से प्राप्त होता है।

यह दिन अध्यात्मिक चेतना के जागृत होने का प्रतीक है। भगवान विष्णु का योगनिद्रा से उठना यह दर्शाता है कि अज्ञानता की नींद से जागकर ज्ञान और भक्ति के मार्ग पर चलना ही मानव जीवन का असली उद्देश्य है। इस दिन तुलसी दल अर्पित करके भगवान शालिग्राम की पूजा करने से अक्षय पुण्य और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

देवउठनी एकादशी की संपूर्ण पूजा विधि (Pooja rituals)

देवउठनी एकादशी 2026 (Devutthana Ekadashi 2026)  पर भगवान श्री हरि विष्णु की पूजा शास्त्रीय नियमों के साथ की जाती है। आइए जानते हैं step-by-step पूजा विधि:

  1. प्रातः स्नान और संकल्प: एकादशी के दिन सुबह सूर्योदय से पूर्व उठकर किसी पवित्र नदी या घर पर ही नहाने के पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान करें। स्वच्छ पीले वस्त्र धारण करें और भगवान विष्णु के समक्ष व्रत का संकल्प लें।
  2. पूजा स्थल और चौकी स्थापना: घर के मंदिर या आंगन में एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाएं। उस पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
  3. प्रभु का श्रृंगार: भगवान विष्णु को पीले चंदन, रोली, कुमकुम और अक्षत लगाएं। उन्हें पीले वस्त्र, पीले फूल और जनेऊ अर्पित करें।
  4. गन्ने का मंडप और चरण चिन्ह: घर के आंगन में गेरू से भगवान के चरण चिन्ह बनाएं। पूजा स्थल पर चार गन्नों का मंडप बनाएं और उसके बीच में भगवान शालिग्राम व तुलसी का पौधा रखें।
  5. भोग और तुलसी दल: प्रभु को सिंघाड़ा, शकरकंद, गन्ना, केला, पेड़ा और हलवे का भोग लगाएं। ध्यान रहे कि भोग में तुलसी पत्र अवश्य शामिल करें।
  6. प्रभु को जगाना: दीप प्रज्वलित करके 'उठो देवा, बैठो देवा, अंगुरिया चटकाओ देवा' या 'उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविंद त्यज निद्रां जगत्पते' मंत्र बोलते हुए प्रभु के चरणों को हल्के से स्पर्श करें या घंटी-मंजीरा बजाकर उन्हें जगाएं।
  7. कथा और आरती: देवउठनी एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें। अंत में 'ॐ जय जगदीश हरे' की आरती गाकर क्षमा प्रार्थना करें।

देवउठनी एकादशी व्रत के जरूरी नियम (Rules)

Devuttana ekadashi 2026 festival

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एकादशी व्रत का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए कुछ शास्त्रीय नियमों का पालन अनिवार्य है:

  • दशमी तिथि के नियम: एकादशी से एक दिन पहले यानी दशमी तिथि की शाम को सूर्यास्त के बाद अन्न ग्रहण न करें और पूरी तरह सात्विक रहें।
  • चावल का पूरी तरह त्याग: एकादशी के दिन घर में चावल पकाना और खाना सख्त वर्जित माना गया है।
  • तुलसी दल न तोड़ें: एकादशी तिथि के दिन तुलसी के पत्ते नहीं तोड़ने चाहिए। पूजा के लिए तुलसी दल एक दिन पहले यानी दशमी को ही तोड़कर रख लें।
  • ब्रह्मचर्य और संयम: पूरे दिन मन में सात्विकता बनाए रखें, किसी पर गुस्सा न करें और पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करें।

देवउठनी एकादशी व्रत के मुख्य लाभ (Benefits)

  • समस्त पापों से मुक्ति: जाने-अनजाने में हुए जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं।
  • वैकुंठ धाम की प्राप्ति: जीवन के अंत में आत्मा को विष्णु लोक यानी मोक्ष प्राप्त होता है।
  • मनोकामना पूर्ति: विवाह में आ रही रुकावटें दूर होती हैं और सुख-समृद्धि बढ़ती है।
  • स्वास्थ्य और ऊर्जा: शारीरिक और मानसिक तंदुरुस्ती मिलती है।

क्या करें और क्या न करें (Do's and Don'ts)

क्या करें:

  • सुबह उठकर माता-पिता और बुजुर्गों के चरण स्पर्श करके आशीर्वाद लें।
  • रात के समय भगवान विष्णु के भजनों का संकीर्तन और जागरण करें।
  • जरूरतमंदों को गन्ने, सिंघाड़े, गर्म कपड़े और अन्न का दान करें।

क्या न करें:

  • इस दिन किसी भी व्यक्ति या जीव को शारीरिक व मानसिक कष्ट न दें।
  • घर में दातून करना, पेड़-पौधों के पत्ते तोड़ना या शेविंग करना वर्जित माना जाता है।
  • लहसुन, प्याज या तामसिक भोजन का सेवन घर में बिल्कुल न होने दें।

देवउठनी एकादशी की पौराणिक कथा (Story)

पौराणिक कथा के अनुसार शंखासुर नाम का एक अत्यंत शक्तिशाली दैत्य था, जिसने तीनों लोकों में भयंकर उत्पात मचा रखा था। उसने वेदों को चुराकर समुद्र की गहराइयों में छिपा दिया। देवताओं की प्रार्थना पर भगवान श्री हरि विष्णु ने मत्स्य रूप धारण करके शंखासुर का वध किया और वेदों को पुनः देवताओं को सौंपा।

शंखासुर से युद्ध करते हुए भगवान विष्णु अत्यंत थक गए थे। युद्ध समाप्त होने के बाद आषाढ़ शुक्ल एकादशी को भगवान विष्णु क्षीरसागर में जाकर सो गए। वे लगातार चार महीनों तक योगनिद्रा में रहे। देवताओं और ऋषियों ने चार महीनों तक प्रभु की सेवा की और कार्तिक शुक्ल एकादशी के दिन स्तुति गाकर उन्हें जगाया। भगवान विष्णु ने प्रसन्न होकर देवताओं को वरदान दिया कि जो भी मनुष्य कार्तिक शुक्ल एकादशी के दिन उन्हें जगाएगा और व्रत रखकर उनकी पूजा करेगा, उसके जीवन के सारे कष्ट दूर हो जाएंगे। तभी से इस पावन तिथि को देवउठनी एकादशी 2026 (Devutthana Ekadashi 2026) के रूप में मनाया जाने लगा।

निष्कर्ष (Conclusion)

देवउठनी एकादशी का यह पावन पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह हमारे भीतर सोई हुई भक्ति और सकारात्मक ऊर्जा को जगाने का सुंदर माध्यम है। चार महीने के विश्राम के बाद जब भगवान विष्णु जागते हैं, तो वे हमारे जीवन में खुशियों, समृद्धि और मांगलिक अवसरों का नया सबेरा लेकर आते हैं। वर्ष की देवउठनी एकादशी 2026 (Devutthana Ekadashi 2026) आपके और आपके परिवार के जीवन में अपार सुख, शांति, उत्तम स्वास्थ्य और भगवान श्री हरि विष्णु का अलौकिक आशीर्वाद लेकर आए। जय श्री हरि विष्णु जय माता तुलसी

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. देवउठनी एकादशी 2026 (Devutthana Ekadashi 2026) में कब है?
देवउठनी एकादशी का महापर्व 20 नवंबर 2026, शुक्रवार को मनाया जाएगा।

2. देवउठनी एकादशी व्रत का पारण कब किया जाएगा?
देवउठनी एकादशी 2026 (Devutthana Ekadashi 2026) व्रत का पारण 21 नवंबर, शनिवार को सुबह 06:47 बजे से सुबह 08:55 बजे के बीच किया जाएगा।

3. देवउठनी एकादशी पर तुलसी विवाह क्यों कराया जाता है?
माना जाता है कि इस दिन भगवान विष्णु का स्वरूप शालिग्राम और माता तुलसी का विवाह कराने से कन्यादान के समान महापुण्य प्राप्त होता है।

4. क्या देवउठनी एकादशी के दिन चावल खा सकते हैं?
नहीं, हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार किसी भी एकादशी के दिन चावल खाना वर्जित माना जाता है।

5. भगवान विष्णु को नींद से जगाने के लिए कौन सा मंत्र बोला जाता है?
प्रभु को जगाने के लिए 'उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविंद त्यज निद्रां जगत्पते। त्वयि सुप्ते जगन्नाथ जगत् सुप्तं भवेदिदम्॥' मंत्र का जप किया जाता है।

Author: Neha Jain – Cultural & Festival Content Writer

Neha Jain is a festival writer with 7+ years’ experience explaining Indian rituals, traditions, and their cultural meaning, making complex customs accessible and engaging for today’s modern readers.