जब जीवन की चुनौतियों से जूझते हुए हम थक जाते हैं और अपने आप को अकेला पाते हैं, तो सबसे पहले हमें अपनी माँ की याद आती है। माँ की एक हल्की सी थपकी और उनकी गोदी का सुकून दुनिया के सबसे बड़े दर्द को भी पल भर में दूर कर देता है। हमारी प्राचीन संस्कृति में माँ को साक्षात परमेश्वर के रूप में पूजा जाता है। शारदीय नवरात्रि के नौ दिन भी इसी ममतामयी और कल्याणकारी शक्ति के उत्सव होते हैं।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि नवरात्रि के दौरान पंचमी तिथि के दिन एक ऐसा व्रत आता है जो सुख, सौंदर्य और मोक्ष की अधिष्ठात्री देवी को समर्पित है? हम बात कर रहे हैं उपांग ललिता व्रत 2026 (Upang Lalita Vrat 2026) की।
शास्त्रों में माँ ललिता देवी को 'त्रिपुरसुंदरी' भी कहा जाता है, जिनका रूप ब्रह्मांड में सबसे सुंदर और करुणामयी है। इस वर्ष उपांग ललिता व्रत 2026 (Upang Lalita Vrat 2026) की तिथि 15 अक्टूबर 2026 को आ रही है। यह केवल एक उपवास का दिन नहीं है, बल्कि आपके वैवाहिक जीवन में प्रेम का रस घोलने और आपकी सूनी झोली को खुशियों से भरने का दिव्य अवसर है।
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शारदीय नवरात्रि के पांचवें दिन, यानी अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को उपांग ललिता व्रत 2026 (Upang Lalita Vrat 2026) रखा जाता है। इस दिन माँ दुर्गा के एक विशेष रूप माँ ललिता त्रिपुरसुंदरी की पूजा की जाती है। माँ ललिता दसों महाविद्याओं में से एक हैं और इन्हें अत्यंत शांत, सौम्य और भक्तों को तुरंत फल देने वाली देवी माना गया है। यह व्रत विशेष रूप से सुख-समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और संतान की रक्षा के लिए रखा जाता है।
साल 2026 में यह व्रत नवरात्रि की पंचमी तिथि के अद्भुत संयोग में आ रहा है। पंचांग के अनुसार व्रत की सटीक जानकारी इस प्रकार है:
व्रत कब है: 15 अक्टूबर 2026, दिन गुरुवारसनातन परंपरा में इस व्रत का महत्व बहुत निराला है। माना जाता है कि माँ ललिता के हृदय में पूरी सृष्टि के लिए अगाध प्रेम है। इनका यह महत्व इसलिए भी है क्योंकि यह व्रत जातक के भीतर छुपे हुए तनाव, अवसाद और हीनभावना को समाप्त कर देता है। आध्यात्मिक रूप से, माँ ललिता त्रिपुरसुंदरी की साधना से आज्ञा चक्र जागृत होता है और भक्त को इस संसार के सभी भौतिक सुख भोगने के बाद अंत में मोक्ष का आशीर्वाद मिलता है।
इस पावन दिन पर अपने घर में सुख-शांति स्थापित करने के लिए इस प्रकार पूजा विधि अपनाएं:

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इस दिव्य व्रत की पूर्णता के लिए कुछ व्रत के नियम तय किए गए हैं:
जो श्रद्धालु पूरे समर्पण से माँ ललिता की शरण में जाते हैं, उन्हें ये लाभ प्राप्त होते हैं:
क्या करें:
क्या न करें:
पौराणिक कथा के अनुसार, जब कामदेव को भगवान शिव ने अपने तीसरे नेत्र से भस्म कर दिया था, तब कामदेव की राख से 'भंडासुर' नाम का एक भयानक राक्षस पैदा हुआ। भंडासुर ने अपनी तपस्या से ब्रह्मा जी को प्रसन्न कर लिया और तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया। उसने देवताओं को बहुत प्रताड़ित किया। तब सभी देवताओं ने निराश होकर साक्षात आद्याशक्ति की आराधना की।
देवताओं के यज्ञ और भक्ति से प्रसन्न होकर महायज्ञ की अग्नि से माँ ललिता त्रिपुरसुंदरी साक्षात प्रकट हुईं। उनका रूप अत्यंत दिव्य और अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित था। माँ ललिता ने देवताओं को अभयदान दिया और अपनी प्रचंड शक्ति से भंडासुर और उसकी विशाल सेना का समूल नाश कर दिया। देवताओं ने माँ की वंदना की और तभी से इस अश्विन पंचमी को माँ ललिता के प्राकट्य और विजय उत्सव के रूप में मनाया जाने लगा।
उपांग ललिता व्रत 2026 (Upang Lalita Vrat 2026) केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं है, यह माँ के उस अनंत प्रेम को महसूस करने का जरिया है जो हमें हर संकट से बचाता है। जब आप 15 अक्टूबर 2026 को माँ के सामने बैठें, तो अपने सारे दुख-दर्द उनके चरणों में सौंप दीजिएगा। विश्वास रखिए, जिस बच्चे का हाथ स्वयं माँ ललिता त्रिपुरसुंदरी ने थामा हो, उसे दुनिया का कोई भी तूफ़ान डिगा नहीं सकता। माँ की असीम अनुकंपा आपके पूरे परिवार पर हमेशा बरसती रहे!
Neha Jain is a festival writer with 7+ years’ experience explaining Indian rituals, traditions, and their cultural meaning, making complex customs accessible and engaging for today’s modern readers.