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July 9, 2026 Blog

Upang Lalita Vrat 2026: 15 अक्टूबर को है उपांग ललिता व्रत, जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और माँ ललिता त्रिपुरसुंदरी की कथा

BY : Neha Jain – Cultural & Festival Content Writer

उपांग ललिता व्रत 2026: माँ की ममता और दसों दिशाओं को महकाने वाली दिव्य शक्ति का महापर्व (Upang Lalitha Vrat 2026: A grand festival celebrating a mother's love and the divine power that permeates the ten directions.)

जब जीवन की चुनौतियों से जूझते हुए हम थक जाते हैं और अपने आप को अकेला पाते हैं, तो सबसे पहले हमें अपनी माँ की याद आती है। माँ की एक हल्की सी थपकी और उनकी गोदी का सुकून दुनिया के सबसे बड़े दर्द को भी पल भर में दूर कर देता है। हमारी प्राचीन संस्कृति में माँ को साक्षात परमेश्वर के रूप में पूजा जाता है। शारदीय नवरात्रि के नौ दिन भी इसी ममतामयी और कल्याणकारी शक्ति के उत्सव होते हैं।

लेकिन क्या आप जानते हैं कि नवरात्रि के दौरान पंचमी तिथि के दिन एक ऐसा व्रत आता है जो सुख, सौंदर्य और मोक्ष की अधिष्ठात्री देवी को समर्पित है? हम बात कर रहे हैं उपांग ललिता व्रत 2026 (Upang Lalita Vrat 2026) की।

शास्त्रों में माँ ललिता देवी को 'त्रिपुरसुंदरी' भी कहा जाता है, जिनका रूप ब्रह्मांड में सबसे सुंदर और करुणामयी है। इस वर्ष उपांग ललिता व्रत 2026 (Upang Lalita Vrat 2026) की तिथि 15 अक्टूबर 2026 को आ रही है। यह केवल एक उपवास का दिन नहीं है, बल्कि आपके वैवाहिक जीवन में प्रेम का रस घोलने और आपकी सूनी झोली को खुशियों से भरने का दिव्य अवसर है।

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उपांग ललिता व्रत क्या है? (What is Upang Lalita Vrat?)

शारदीय नवरात्रि के पांचवें दिन, यानी अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को उपांग ललिता व्रत 2026 (Upang Lalita Vrat 2026) रखा जाता है। इस दिन माँ दुर्गा के एक विशेष रूप माँ ललिता त्रिपुरसुंदरी की पूजा की जाती है। माँ ललिता दसों महाविद्याओं में से एक हैं और इन्हें अत्यंत शांत, सौम्य और भक्तों को तुरंत फल देने वाली देवी माना गया है। यह व्रत विशेष रूप से सुख-समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और संतान की रक्षा के लिए रखा जाता है।

उपांग ललिता व्रत 2026 (Upang Lalita Vrat 2026): तिथि, शुभ मुहूर्त और समय (Date and Time)

साल 2026 में यह व्रत नवरात्रि की पंचमी तिथि के अद्भुत संयोग में आ रहा है। पंचांग के अनुसार व्रत की सटीक जानकारी इस प्रकार है:

व्रत कब है: 15 अक्टूबर 2026, दिन गुरुवार
पंचमी तिथि का प्रारंभ: 15 अक्टूबर 2026 को सुबह 02:45 AM से
पंचमी तिथि का समापन: 16 अक्टूबर 2026 को रात 01:10 AM तक
माँ ललिता पूजा का सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त: सुबह 06:22 AM से 10:43 AM तक
विशेष: इस वर्ष गुरुवार का दिन होने से इस व्रत का महत्व और बढ़ गया है, क्योंकि गुरुवार का संबंध देवगुरु बृहस्पति और सात्विक ज्ञान से है, जो माँ ललिता की कृपा को और अधिक मांगलिक बनाता है।

धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व (Importance)

सनातन परंपरा में इस व्रत का महत्व बहुत निराला है। माना जाता है कि माँ ललिता के हृदय में पूरी सृष्टि के लिए अगाध प्रेम है। इनका यह महत्व इसलिए भी है क्योंकि यह व्रत जातक के भीतर छुपे हुए तनाव, अवसाद और हीनभावना को समाप्त कर देता है। आध्यात्मिक रूप से, माँ ललिता त्रिपुरसुंदरी की साधना से आज्ञा चक्र जागृत होता है और भक्त को इस संसार के सभी भौतिक सुख भोगने के बाद अंत में मोक्ष का आशीर्वाद मिलता है।

माँ ललिता त्रिपुरसुंदरी की सरल पूजा विधि (Pooja Rituals)

इस पावन दिन पर अपने घर में सुख-शांति स्थापित करने के लिए इस प्रकार पूजा विधि अपनाएं:

  • प्रातः काल की तैयारी: 15 अक्टूबर की सुबह जल्दी उठें। स्नान के जल में गंगाजल मिलाकर स्नान करें और साफ-सुथरे या पीले/लाल रंग के वस्त्र पहनें।
  • पूजा स्थल का निर्माण: पूजा घर में एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं। उस पर माँ ललिता या माँ दुर्गा की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। साथ ही भगवान गणेश की भी स्थापना करें।
  • कलश और दीप पूजा: माँ के सामने शुद्ध गाय के घी का दीपक जलाएं और कलश देव की पूजा करें।
  • श्रृंगार और पुष्प अर्पण: माँ ललिता को रोली, अक्षत और चंदन का तिलक लगाएं। उन्हें लाल रंग के फूल (विशेषकर गुड़हल या गुलाब) अर्पित करें। सुहागिन महिलाएं माँ को पूरी सुहाग सामग्री (सिंदूर, चूड़ियाँ, बिंदी, आदि) भेंट करें।
  • नैवेद्य भोग: माँ को मखाने की खीर, पेड़े या सफेद रंग की मिठाई का भोग लगाएं।
  • मंत्र और आरती: माँ ललिता देवी के विशेष मंत्र 'ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ललितायै नमः' का जाप करें या ललिता सहस्रनाम का पाठ करें। अंत में व्रत की कथा सुनें और कपूर से आरती उतारें।

उपांग ललिता व्रत के जरूरी नियम (Rules)

Upang Lalita Vrat 2026 festival

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इस दिव्य व्रत की पूर्णता के लिए कुछ व्रत के नियम तय किए गए हैं:

  • फलाहारी उपवास: यह व्रत मुख्य रूप से फलाहार रहकर (दूध, फल, कुट्टू का आटा) किया जाता है। रात्रि में पारण के समय भी सात्विक भोजन ही लें।
  • पूर्ण स्वच्छता: घर और मन दोनों को साफ रखें। इस दिन किसी के प्रति कटु वचन न बोलें और न ही मन में ईर्ष्या लाएं।
  • ब्रह्मचर्य का पालन: नवरात्रि के दिनों की तरह इस दिन भी पूर्ण संयम और ब्रह्मचर्य का पालन अनिवार्य है।

उपांग ललिता व्रत करने के महालाभ (Benefits)

जो श्रद्धालु पूरे समर्पण से माँ ललिता की शरण में जाते हैं, उन्हें ये लाभ प्राप्त होते हैं:

  • अखंड सौभाग्य की प्राप्ति: सुहागिन महिलाओं के पति की आयु लंबी होती है और वैवाहिक जीवन का कलह हमेशा के लिए खत्म हो जाता है।
  • आर्थिक समृद्धि: माँ त्रिपुरसुंदरी की कृपा से घर में कभी भी सुख-साधनों और धन-धान्य की कमी नहीं होती।
  • संतान सुख और आरोग्य: निसंतान दंपतियों को योग्य संतान मिलती है और बच्चों की सेहत अच्छी रहती है।

क्या करें और क्या न करें (Do’s and Don’ts)

क्या करें:

  • पूजा संपन्न होने के बाद सुहाग का सामान किसी सुहागिन महिला या मंदिर में ब्राह्मण की पत्नी को दान स्वरूप दें।
  • कन्याओं को आदरपूर्वक भोजन कराएं या उन्हें फल भेंट करें।

क्या न करें:

  • इस दिन भूलकर भी घर में लहसुन, प्याज या तामसिक भोजन न लाएं।
  • किसी भी महिला, बुजुर्ग या असहाय व्यक्ति का दिल न दुखाएं, क्योंकि माँ हर स्त्री में वास करती हैं।

पौराणिक व्रत कथा: भंडासुर का वध और माँ का प्राकट्य (Story)

पौराणिक कथा के अनुसार, जब कामदेव को भगवान शिव ने अपने तीसरे नेत्र से भस्म कर दिया था, तब कामदेव की राख से 'भंडासुर' नाम का एक भयानक राक्षस पैदा हुआ। भंडासुर ने अपनी तपस्या से ब्रह्मा जी को प्रसन्न कर लिया और तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया। उसने देवताओं को बहुत प्रताड़ित किया। तब सभी देवताओं ने निराश होकर साक्षात आद्याशक्ति की आराधना की।

देवताओं के यज्ञ और भक्ति से प्रसन्न होकर महायज्ञ की अग्नि से माँ ललिता त्रिपुरसुंदरी साक्षात प्रकट हुईं। उनका रूप अत्यंत दिव्य और अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित था। माँ ललिता ने देवताओं को अभयदान दिया और अपनी प्रचंड शक्ति से भंडासुर और उसकी विशाल सेना का समूल नाश कर दिया। देवताओं ने माँ की वंदना की और तभी से इस अश्विन पंचमी को माँ ललिता के प्राकट्य और विजय उत्सव के रूप में मनाया जाने लगा।

निष्कर्ष: माँ की करुणा ही हमारा संबल है (Conclusion)

उपांग ललिता व्रत 2026 (Upang Lalita Vrat 2026) केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं है, यह माँ के उस अनंत प्रेम को महसूस करने का जरिया है जो हमें हर संकट से बचाता है। जब आप 15 अक्टूबर 2026 को माँ के सामने बैठें, तो अपने सारे दुख-दर्द उनके चरणों में सौंप दीजिएगा। विश्वास रखिए, जिस बच्चे का हाथ स्वयं माँ ललिता त्रिपुरसुंदरी ने थामा हो, उसे दुनिया का कोई भी तूफ़ान डिगा नहीं सकता। माँ की असीम अनुकंपा आपके पूरे परिवार पर हमेशा बरसती रहे!

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

  1. वर्ष में उपांग ललिता व्रत 2026 (Upang Lalita Vrat 2026) कब है?
    साल में उपांग ललिता व्रत 2026 (Upang Lalita Vrat 2026) 15 अक्टूबर, दिन गुरुवार को मनाया जाएगा। यह नवरात्रि की पंचमी तिथि होगी।
  1. माँ ललिता त्रिपुरसुंदरी कौन हैं?
    माँ ललिता दसों महाविद्याओं में से एक हैं, जिन्हें शक्ति का सबसे सुंदर, सौम्य और ममतामयी स्वरूप माना जाता है।
  1. क्या कुंवारी कन्याएं भी यह व्रत रख सकती हैं?
    जी हाँ, कुंवारी कन्याएं जीवन में सुख, समृद्धि और मनचाहा जीवनसाथी पाने के लिए इस व्रत को श्रद्धापूर्वक रख सकती हैं।
  1. इस दिन माँ को क्या भोग लगाना सबसे उत्तम है?
    माँ ललिता को मखाने की खीर, मालपुआ या कोई भी सफेद रंग की सात्विक मिठाई अर्पित करना बेहद शुभ होता है।
  1. उपांग ललिता व्रत 2026 (Upang Lalita Vrat 2026)का मुख्य मंत्र क्या है?
    इस दिन आप माँ के दिव्य मंत्र 'ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ललितायै नमः' का मानसिक या माला से जाप कर सकते हैं।
Author: Neha Jain – Cultural & Festival Content Writer

Neha Jain is a festival writer with 7+ years’ experience explaining Indian rituals, traditions, and their cultural meaning, making complex customs accessible and engaging for today’s modern readers.