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August 18, 2026 Blog

Guruvayur Ekadashi 2026: जानिए सही तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, महत्व और पौराणिक कथा

BY : Neha Jain – Cultural & Festival Content Writer

गुरुवायूर एकादशी 2026: जानिए सही तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, महत्व और कथा

जब भक्ति और समर्पण से भरा दिल प्रभु के चरणों में झुकता है, तो जीवन की सारी उलझनें स्वयं ही सुलझ जाती हैं। दक्षिण भारत के केरल राज्य में स्थित प्रसिद्ध गुरुवायूर श्री कृष्ण मंदिर में मनाया जाने वाला गुरुवायूर एकादशी 2026 (Guruvayur Ekadashi 2026) का पर्व एक ऐसा अलौकिक अवसर है जो साधक को साक्षात भगवान श्री कृष्ण के दिव्य रूप के दर्शन कराता है। वृश्चिक मास (कार्तिक-मार्गशीर्ष) की शुक्ल पक्ष एकादशी को गुरुवायूर मंदिर में गुरुवायूर एकादशी के रूप में बड़ी ही धूमधाम और भक्ति भाव के साथ मनाया जाता है। इसे कई स्थानों पर वृश्चिक एकादशी भी कहा जाता है। मान्यता है कि इस पावन तिथि पर स्वयं भगवान गुरुवायूरप्पम (बाल-कृष्ण) अपने भक्तों के सारे दुखों का हरण कर उन्हें मोक्ष का वरदान देते हैं। यदि आप भी वर्ष 2026 में गुरुवायूर एकादशी (Guruvayur Ekadashi 2026) की सही तिथि, शुभ मुहूर्त और संपूर्ण पूजन विधि की तलाश कर रहे हैं, तो यह लेख आपके लिए संपूर्ण और भावपूर्ण मार्गदर्शिका साबित होगा।

गुरुवायूर एकादशी क्या है? (परिचय)

वृश्चिक मास की शुक्ल एकादशी को गुरुवायूर एकादशी कहा जाता है। यह पर्व मुख्य रूप से केरल के प्रसिद्ध गुरुवायूरप्पम मंदिर में अत्यंत भव्य रूप से आयोजित किया जाता है। गुरुवायूर मंदिर को 'दक्षिण की द्वारका' भी कहा जाता है। यहाँ स्थापित भगवान कृष्ण की दिव्य प्रतिमा स्वयं देवगुरु बृहस्पति और वायुदेव द्वारा स्थापित की गई थी। इस पावन दिन मंदिर परिसर को हजारों दीपों (विळक्कू) से सजाया जाता है और भव्य हाथियों की शोभायात्रा (ईळुन्नल्लइप्पू) निकाली जाती है। इस दिन व्रत रखकर भगवान गुरुवायूरप्पम की पूजा करने से जन्म-जन्मांतर के पाप मिट जाते हैं और व्यक्ति को परम पद की प्राप्ति होती है।

गुरुवायूर एकादशी 2026 तिथि और शुभ मुहूर्त

वर्ष 2026 में गुरुवायूर एकादशी (Guruvayur Ekadashi 2026) का यह पावन पर्व 21 नवंबर, शनिवार को पूरे देश और विशेष रूप से दक्षिण भारत में अपार भक्ति के साथ मनाया जाएगा। पंचांग के अनुसार तिथियों और पारण के शुभ समय का विवरण नीचे दिया गया है:

  • गुरुवायूर एकादशी तिथि: 21 नवंबर 2026, शनिवार
  • एकादशी तिथि प्रारंभ: 20 नवंबर 2026 को रात 11:20 बजे से
  • एकादशी तिथि समाप्त: 21 नवंबर 2026 को रात 09:45 बजे तक
  • पूजा का सबसे शुभ मुहूर्त: सुबह 06:47 बजे से सुबह 09:30 बजे तक
  • उत्तम मुहूर्त (अभिजित): सुबह 11:45 बजे से दोपहर 12:28 बजे तक
  • व्रत पारण का समय: 22 नवंबर 2026, रविवार को सुबह 06:48 बजे से सुबह 08:58 बजे तक

गुरुवायूर एकादशी का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व

धार्मिक और पौराणिक दृष्टिकोण से गुरुवायूर एकादशी का महत्व अत्यंत अगाध है। माना जाता है कि इसी पावन तिथि को भगवान श्री कृष्ण ने कुरुक्षेत्र के युद्ध मैदान में अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीता का दिव्य उपदेश दिया था। इसलिए इसे गीता जयंती के रूप में भी आदर दिया जाता है।

गुरुवायूर मंदिर के इतिहास में इस दिन का विशेष स्थान है क्योंकि इसी दिन महान संत मेलपथूर नारायण भट्टथिरि ने अपने प्रसिद्ध संस्कृत काव्य 'नारायणीयम' की रचना पूरी की थी और उनका पक्षाघात रोग भगवान गुरुवायूरप्पम की कृपा से पूरी तरह ठीक हो गया था। इस दिन व्रत रखने से शारीरिक व्याधियों का नाश होता है और आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता है।

गुरुवायूर एकादशी की संपूर्ण पूजा विधि

गुरुवायूर एकादशी 2026 (Guruvayur Ekadashi 2026) पर भगवान गुरुवायूरप्पम (श्री कृष्ण) की पूजा अत्यंत पवित्रता और निष्ठा के साथ की जाती है:

  1. प्रातः स्नान और संकल्प: एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ पीले या सफेद वस्त्र पहनें। इसके बाद हाथ में जल लेकर भगवान गुरुवायूरप्पम के समक्ष व्रत का संकल्प लें।
  2. पूजा स्थल की सफाई: अपने घर के मंदिर को स्वच्छ करें और उत्तर या पूर्व दिशा में एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाएं।
  3. मूर्ति स्थापना और श्रृंगार: चौकी पर भगवान श्री कृष्ण या लड्डू गोपाल की प्रतिमा स्थापित करें। उन्हें गंगाजल और पंचामृत से स्नान कराएं। तत्पश्चात पीला चंदन, रोली और अक्षत लगाएं।
  4. तुलसी दल और पुष्प अर्पण: भगवान को ताजे पीले फूल, गेंदे की माला और तुलसी दल अर्पित करें। ध्यान रखें कि श्री कृष्ण की पूजा में तुलसी पत्र का होना बेहद आवश्यक है।
  5. विशेष भोग अर्पण: प्रभु को मक्खन, मिसरी, केला, शकरकंद, गुड़ और नारियल का भोग लगाएं।
  6. दीपक और गीता पाठ: घर के मंदिर में सरसों के तेल या घी का दीपक प्रज्वलित करें। इस दिन श्रीमद्भगवद्गीता के 11वें अध्याय का पाठ करना अत्यंत फलदायी होता है।
  7. आरती और क्षमा प्रार्थना: अंत में 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जाप करते हुए कपूर से आरती गाएं और जाने-अनजाने हुई भूलों के लिए क्षमा मांगें।

गुरुवायूर एकादशी व्रत के जरूरी नियम

गुरुवायूर एकादशी 2026 (Guruvayur Ekadashi 2026) का पूर्ण पुण्य प्राप्त करने के लिए इन शास्त्रीय नियमों का पालन अनिवार्य है:

  • दशमी के नियम: एकादशी से एक दिन पूर्व यानी दशमी तिथि की शाम को सात्विक भोजन लें और सूर्यास्त के बाद अन्न ग्रहण न करें।
  • चावल का पूरी तरह त्याग: एकादशी के दिन घर में चावल पकाना और खाना सख्त वर्जित माना गया है।
  • तुलसी के पत्ते न तोड़ें: एकादशी के दिन तुलसी दल नहीं तोड़ना चाहिए। पूजा के लिए तुलसी पत्र एक दिन पहले ही तोड़कर रख लें।
  • पूर्ण संयम और सात्विकता: पूरे दिन मन में किसी के प्रति ईर्ष्या, क्रोध या द्वेष न लाएं और पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करें।

गुरुवायूर एकादशी व्रत के मुख्य लाभ

  • शारीरिक कष्टों से मुक्ति: भगवान गुरुवायूरप्पम की कृपा से गंभीर और असाध्य रोगों से राहत मिलती है।
  • पापों का नाश: जन्म-जन्मांतर के जाने-अनजाने में हुए पाप नष्ट हो जाते हैं।
  • मानसिक शांति और मोक्ष: मन को असीम शांति मिलती है और अंत समय में वैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है।
  • संतान सुख और तरक्की: परिवार में खुशहाली आती है और बच्चों का बौद्धिक विकास होता है।

क्या करें और क्या न करें

क्या करें:

  • सुबह उठकर माता-पिता और बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद लें।
  • घर के मुख्य द्वार पर दीये जलाएं और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।
  • जरूरतमंदों और गरीबों को अन्न, वस्त्र और फलों का दान करें।

क्या न करें:

  • इस दिन किसी भी प्राणी या जीव को नुकसान न पहुँचाएं और न ही कटु शब्द बोलें।
  • घर में लहसुन, प्याज, मदिरा या तामसिक भोजन का प्रयोग बिल्कुल न होने दें।
  • एकादशी के दिन नाखून काटना, दातून करना या बाल धोना वर्जित माना जाता है।

गुरुवायूर एकादशी की पौराणिक कथा

पौराणिक कथा के अनुसार द्वापर युग के अंत में जब भगवान श्री कृष्ण अपनी लीला संवरण करके बैकुंठ लोक लौटने लगे, तो उन्होंने देवगुरु बृहस्पति और वायुदेव को अपनी पूजित प्रतिमा सौंपी। उन्होंने कहा कि इस प्रतिमा को किसी ऐसी अत्यंत पवित्र भूमि पर स्थापित किया जाए जहाँ भक्तों को प्रभु के साक्षात दर्शन हो सकें।

गुरु और वायुदेव उस दिव्य प्रतिमा को लेकर दक्षिण भारत पहुँचे। वहाँ परशुराम जी ने उनका स्वागत किया और एक बेहद पवित्र स्थान दिखाया। गुरु और वायुदेव ने मिलकर उस प्रतिमा की स्थापना की। गुरु (बृहस्पति) और वायु (वायुदेव) द्वारा स्थापित किए जाने के कारण इस स्थान का नाम 'गुरुवायूर' पड़ा और प्रभु 'गुरुवायूरप्पम' कहलाए।

वृश्चिक मास की एकादशी के दिन ही इस प्रतिमा का भव्य प्राकट्य उत्सव मनाया गया था। तभी से हर वर्ष इस पावन तिथि को गुरुवायूर एकादशी 2026 (Guruvayur Ekadashi 2026) के रूप में मनाया जाने लगा। माना जाता है कि इस दिन स्वयं भगवान कृष्ण गुरुवायूर में उपस्थित होकर अपने भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करते हैं।

निष्कर्ष

गुरुवायूर एकादशी 2026 (Guruvayur Ekadashi 2026) केवल एक व्रत नहीं है, बल्कि यह भगवान श्री कृष्ण के प्रति अपने अनन्य प्रेम और भक्ति को व्यक्त करने का अलौकिक अवसर है। जब एक साधक सच्चे मन से गुरुवायूरप्पम के चरणों में अपना शीश झुका देता है, तो उसकी जिंदगी के सारे दुख, कष्ट और बीमारियाँ समाप्त हो जाती हैं। वर्ष 2026 की यह गुरुवायूर एकादशी आपके और आपके पूरे परिवार के जीवन में अपार सुख, शांति, समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और प्रभु का दिव्य आशीर्वाद लेकर आए। जय भगवान गुरुवायूरप्पम! जय श्री कृष्णा!

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. गुरुवायूर एकादशी 2026 (Guruvayur Ekadashi 2026) में कब है?
गुरुवायूर एकादशी 2026 (Guruvayur Ekadashi 2026) का पावन पर्व 21 नवंबर, शनिवार को मनाया जाएगा।

2. गुरुवायूर एकादशी मुख्य रूप से कहाँ मनाई जाती है?
यह पर्व मुख्य रूप से केरल के प्रसिद्ध गुरुवायूर श्री कृष्ण मंदिर में अत्यंत भव्य रूप से मनाया जाता है।

3. गुरुवायूर एकादशी का दूसरा नाम क्या है?
इसे वृश्चिक एकादशी और गीता जयंती के रूप में भी जाना जाता है।

4. गुरुवायूर मंदिर किस राज्य में स्थित है?
गुरुवायूर मंदिर भारत के केरल राज्य के त्रिशूर जिले में स्थित है।

5. गुरुवायूर एकादशी व्रत का पारण कब किया जाएगा?
इस व्रत का पारण 22 नवंबर 2026, रविवार को सुबह 06:48 बजे से सुबह 08:58 बजे के बीच किया जाएगा।

Author: Neha Jain – Cultural & Festival Content Writer

Neha Jain is a festival writer with 7+ years’ experience explaining Indian rituals, traditions, and their cultural meaning, making complex customs accessible and engaging for today’s modern readers.