नवरात्रि के नौ दिन, सुबह की पावन आरती, पंडालों में ढाक की थाप, धुंची नृत्य की खुशबू और हर चेहरे पर बिखरी सात्विक मुस्कान... ये पवित्र दिन पलक झपकते ही बीत जाते हैं। लेकिन जैसे ही विजयादशमी की सुबह आती है, हर सच्चे भक्त का दिल उदासी और भारीपन से भर जाता है। एक बेटी जब नौ दिनों के लिए अपने मायके आती है, तो पूरा घर चहक उठता है, और जब उसकी विदाई का वक्त आता है, तो आँगन सूना सा लगने लगता है। माँ दुर्गा की विदाई का यही सबसे भावुक और अलौकिक क्षण है दुर्गा विसर्जन 2026 (Durga Visarjan 2026)।
इस वर्ष दुर्गा विसर्जन 2026 (Durga Visarjan 2026) की यह पावन तिथि 20 अक्टूबर 2026 को आ रही है। यह केवल एक मूर्ति को जल में प्रवाहित करने की रस्म नहीं है, बल्कि माँ के दिव्य स्वरूप को हमेशा के लिए अपने हृदय में स्थापित करने और अगले साल उनके फिर से आने का वादा लेने का महापर्व है। आइए, किताबों की जटिल भाषा को छोड़कर एक प्रेमी भक्त के दिल से समझते हैं कि इस विदाई बेला का क्या महत्व है और माँ को आदरपूर्वक विदा करने की सही पूजा विधि क्या है।
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शारदीय नवरात्रि और दुर्गा पूजा के उत्सव का समापन अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को होता है, जिसे हम विजयादशमी या दशहरे के रूप में मनाते हैं। इसी पावन दिन सुबह के समय दुर्गा विसर्जन 2026 (Durga Visarjan 2026) का अनुष्ठान किया जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इन नौ दिनों में माँ दुर्गा कैलाश पर्वत से उतरकर धरती पर अपने मायके आती हैं और अपने बच्चों पर कृपा बरसाती हैं। दशमी के दिन वे पुनः अपने पति भगवान शिव के पास कैलाश लौट जाती हैं। इस दिन सुहागिन महिलाएं माँ को सिंदूर अर्पित करती हैं और आपस में 'सिंदूर खेला' उत्सव मनाती हैं।
साल 2026 में तिथियों के विशेष संयोग के कारण 20 अक्टूबर को सुबह के समय ही विसर्जन की सभी मुख्य धार्मिक क्रियाएं संपन्न की जाएंगी। पंचांग के अनुसार सटीक समय इस प्रकार है:
विदाई उत्सव कब है: 20 अक्टूबर 2026, दिन मंगलवारसनातन संस्कृति में दुर्गा विसर्जन 2026 (Durga Visarjan 2026) का महत्व वैराग्य और प्रकृति के चक्र को दर्शाता है। माँ दुर्गा मिट्टी की मूरत में आकर नौ दिनों तक हमारी पूजा स्वीकार करती हैं और अंत में उसी मिट्टी में समाहित हो जाती हैं। यह हमें सिखाता है कि जो इस संसार में आया है, उसे एक न एक दिन अपने मूल स्वरूप में लौटना ही है।
इसका आध्यात्मिक महत्व यह भी है कि माँ भले ही आंखों से ओझल हो जाती हैं, लेकिन उनका आशीर्वाद हमारे घरों में सकारात्मक ऊर्जा के रूप में हमेशा बना रहता है। इस दिन विसर्जन से पहले की जाने वाली 'सिंदूर खेला' की रस्म का यह महत्व है कि सुहागिन महिलाएं माँ से अपने अखंड सुहाग और खुशहाली का वरदान प्राप्त करती हैं।
20 अक्टूबर की पावन सुबह आपको अपने घर के मंदिर या पूजा पंडाल में इस प्रकार पूजा विधि संपन्न करनी चाहिए:

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इस भावुक बेला में कुछ विशेष व्रत के नियम और मर्यादाओं का पालन करना आवश्यक है:
जो भक्त पूरी निष्ठा और श्रद्धा से माँ को विदा करते हैं, उन्हें निम्नलिखित लाभ मिलते हैं:
क्या करें:
क्या न करें:
पौराणिक कथाओं के अनुसार, माँ दुर्गा साक्षात पर्वतराज हिमालय की पुत्री पार्वती हैं। महिषासुर का वध करने के लिए देवताओं ने जब उनका आह्वान किया, तो वे शेर पर सवार होकर पृथ्वी पर प्रकट हुईं। नौ दिनों तक चले भीषण युद्ध के बाद जब उन्होंने अधर्म पर विजय प्राप्त कर ली, तो पृथ्वी का संकट टल गया।
देवताओं और पृथ्वी वासियों ने उन्हें अपनी बेटी की तरह नौ दिनों तक लाड-प्यार से अपने घर में रखा। लेकिन जैसे ही दशमी तिथि आई, स्वर्ग और कैलाश पर्वत से भगवान शिव और कार्तिकेय-गणेश उन्हें याद करने लगे। माँ ने मुस्कुराकर अपने भक्तों को देखा और कहा कि अब मुझे अपने पति के घर कैलाश लौटना होगा, लेकिन मैं हर साल तुम्हारे दुखों को हरने वापस आऊंगी। माँ की इसी भावुक विदाई को अमर बनाने के लिए हर साल दुर्गा विसर्जन 2026 (Durga Visarjan 2026) की यह पावन परंपरा निभाई जाती है।
दुर्गा विसर्जन 2026 (Durga Visarjan 2026) केवल नवरात्रि का अंत नहीं है, बल्कि यह हमारे भीतर माँ के प्रति छिपे अगाध प्रेम की परीक्षा है। जब आप 20 अक्टूबर 2026 की पावन सुबह माँ की मूरत को जल में विसर्जित करेंगे, तो आँखों में भले ही आँसू हों, पर होठों पर एक ही जयकारा होना चाहिए "अगले बरस तू जल्दी आ"। विश्वास रखिए, माँ भले ही भौतिक रूप से विदा हो रही हैं, लेकिन उनका ममतामयी साया आपके पूरे परिवार को हमेशा हर संकट से बचाता रहेगा।
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Neha Jain is a festival writer with 7+ years’ experience explaining Indian rituals, traditions, and their cultural meaning, making complex customs accessible and engaging for today’s modern readers.