Gangaur 2026: राजस्थान की धरती अपने रंगों, लोकगीतों, परंपराओं और गहरी आस्था के लिए जानी जाती है। यहां का हर त्योहार सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं होता, बल्कि जीवन को उत्सव की तरह जीने का एक तरीका होता है। इन्हीं खास त्योहारों में से एक है गणगौर महोत्सव। यह पर्व खासतौर पर महिलाओं की श्रद्धा, प्रेम और सौभाग्य से जुड़ा हुआ है, लेकिन इसकी सुंदरता और उत्साह पूरे समाज को एक साथ जोड़ देता है।
गणगौर (gangaur Puja) का नाम सुनते ही आंखों के सामने एक जीवंत तस्वीर उभर आती है—रंग-बिरंगी लहरिया साड़ियां, सिर पर कलश लिए महिलाएं, लोकगीतों की मधुर धुन, सजी-धजी गौरी की प्रतिमाएं और गलियों से गुजरती भव्य शोभायात्राएं। यह त्योहार केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राजस्थान की आत्मा को महसूस करने का अवसर देता है।
गणगौर शब्द दो भागों से मिलकर बना है—“गण” यानी भगवान शिव और “गौर” यानी माता पार्वती। यह पर्व शिव और पार्वती के अटूट दांपत्य प्रेम का प्रतीक है। मान्यता है कि माता गौरी ने कठोर तपस्या कर भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त किया था। इसलिए विवाहित महिलाएं अपने वैवाहिक जीवन की सुख-समृद्धि और पति की लंबी आयु के लिए इस व्रत को करती हैं, वहीं अविवाहित कन्याएं मनचाहा जीवनसाथी पाने की कामना करती हैं।
गणगौर का उत्सव मार्च या अप्रैल महीने में मनाया जाता है, जो होली के एक दिन बाद शुरू होता है और अठारह दिनों तक चलता है।
इस वर्ष 2026 में, गणगौर (Gangaur 2026 Date) 21 मार्च (शनिवार) को मनाया जाएगा और दैनिक पूजा (व्रत) 4 मार्च 2026 से शुरू होकर 21 मार्च 2026 तक जारी रहेगी ।
गणगौर महोत्सव के लिए पंचांग और चौघड़िया मुहूर्त के बारे में अधिक जानकारी के लिए: यहां
इसके अलावा, होली एक और प्रसिद्ध त्योहार है जिसे राजस्थान में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है ।
“गण” का अर्थ है भगवान शिव और “गौर” का अर्थ है माता पार्वती (गौरी)। यह त्योहार शिव-पार्वती के पवित्र दांपत्य प्रेम का प्रतीक है।
मान्यता है कि माता गौरी ने कठोर तपस्या कर भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त किया था। इसलिए महिलाएं उनकी पूजा कर अपने वैवाहिक जीवन में प्रेम, विश्वास और स्थिरता की कामना करती हैं।
यह पर्व केवल धार्मिक नहीं, बल्कि भावनात्मक भी है — यह रिश्तों की मजबूती, समर्पण और स्त्री शक्ति का उत्सव है।
चैत्र नवरात्रि के तीसरे दिन गणगौर (gangaur Puja) का विशेष महत्व होता है। इस दिन महिलाएं सोलह श्रृंगार कर व्रत रखती हैं और पूरे विधि-विधान से माता गौरा की पूजा करती हैं। शाम के समय वे एक साथ बैठकर गणगौर की व्रत कथा पढ़ती और सुनती हैं। इस खास दिन को “बड़ी गणगौर” भी कहा जाता है।
इस अवसर पर नदी, तालाब या किसी सरोवर के किनारे रेत से माता गौरा की प्रतिमा बनाई जाती है। श्रद्धा और प्रेम के साथ उन्हें जल अर्पित किया जाता है। अगले दिन विधिवत पूजा के बाद माता की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। मान्यता है कि जहां पूजा की जाती है, वह स्थान गणगौर का “पीहर” या “मायका” माना जाता है, और जहां विसर्जन होता है, उसे उनका “ससुराल” समझा जाता है। इस परंपरा में बेटी के मायके से ससुराल जाने की भावनात्मक झलक भी दिखाई देती है।
गणगौर पूजा (Gangaur Puja) के दिन महिलाएं मैदा, बेसन या गेहूं के आटे में हल्दी मिलाकर छोटे-छोटे गहने बनाती हैं। इन गहनों को “गुने” कहा जाता है और ये माता पार्वती को अर्पित किए जाते हैं। लोक मान्यता है कि बड़ी गणगौर के दिन जितने अधिक गुने अर्पित किए जाते हैं, परिवार में उतनी ही समृद्धि और सुख-वैभव आता है।
पूजा पूरी होने के बाद महिलाएं ये गुने अपनी सास, ननद, देवरानी या जेठानी को प्रेमपूर्वक भेंट करती हैं। इस परंपरा के पीछे आपसी स्नेह और परिवार में सौहार्द बढ़ाने की भावना छिपी होती है। कुछ विद्वानों का मानना है कि “गुने” शब्द दरअसल “गहने” शब्द का ही बदला हुआ रूप है, जो समय के साथ प्रचलन में आ गया।
इस तरह बड़ी गणगौर (Gangaur Festival) केवल पूजा का दिन नहीं, बल्कि रिश्तों की मिठास, पारिवारिक जुड़ाव और स्त्री श्रद्धा का सुंदर प्रतीक है।
धार्मिक महत्व – शिव-पार्वती की आराधना
सांस्कृतिक महत्व – लोक परंपराओं का संरक्षण
सामाजिक महत्व – महिलाओं का सामूहिक उत्सव
गणगौर के दौरान राजस्थान की गलियां रंगीन पोशाकों, लोकगीतों और पारंपरिक साज-सज्जा से भर जाती हैं।
मुख्य अनुष्ठान इस प्रकार हैं:
यह दिन सबसे खास होता है, जब सजी-धजी मूर्तियों को तालाब या नदी में विसर्जित किया जाता है।
गणगौर का त्योहार (Gangaur Festival) केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि आस्था, प्रेम और समर्पण की जीवंत कहानी है। यह पर्व माता गौरी और भगवान शिव के पवित्र दांपत्य जीवन से जुड़ा हुआ है। राजस्थान और आसपास के कई क्षेत्रों में इसे बहुत श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। गंगौर की पौराणिक कथा (Gangaur ki kahani) हमें भक्ति, धैर्य और सच्चे प्रेम का महत्व समझाती है।
मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। उन्होंने कई वर्षों तक कठिन व्रत और साधना की। उनका विश्वास अटूट था और मन पूरी तरह समर्पित। अंततः उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया। यही कारण है कि गंगौर का पर्व पति-पत्नी के अटूट प्रेम और विश्वास का प्रतीक माना जाता है।
एक और लोकप्रिय कथा के अनुसार, एक बार भगवान शिव और माता पार्वती पृथ्वी पर भ्रमण के लिए आए। वे एक गांव में पहुंचे, जहां साधारण स्त्रियों ने सादगी और सच्चे मन से माता गौरी की पूजा की। उनके पास अधिक साधन नहीं थे, लेकिन उनकी भक्ति सच्ची थी। वहीं कुछ संपन्न स्त्रियों ने भव्य तैयारी की, परंतु उनके मन में उतनी श्रद्धा नहीं थी। माता पार्वती ने सच्ची भक्ति से प्रसन्न होकर साधारण स्त्रियों को अखंड सौभाग्य और सुखी दांपत्य जीवन का आशीर्वाद दिया।
इस कथा का संदेश बहुत सरल है—ईश्वर को दिखावा नहीं, बल्कि सच्ची श्रद्धा प्रिय होती है। यही कारण है कि गंगौर के दौरान महिलाएं पूरी निष्ठा और प्रेम से माता गौरी की पूजा करती हैं। वे मानती हैं कि जैसे माता पार्वती ने अपने धैर्य और समर्पण से भगवान शिव को पाया, वैसे ही वे भी अपने जीवन में प्रेम, स्थिरता और सुख प्राप्त कर सकती हैं।
गणगौर के समय राजस्थान के बाजार रंगीन हो जाते हैं।
पर्यटक यहां अनुभव कर सकते हैं:
यह समय राजस्थान की हस्तकला और संस्कृति को समझने का सबसे अच्छा अवसर होता है।
गणगौर (gangaur 2026) केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि राजस्थान की जीवंत परंपरा और आस्था का प्रतीक है। यह पर्व प्रेम, समर्पण और सांस्कृतिक विरासत का सुंदर संगम है।
अगर आप भारत की असली संस्कृति को महसूस करना चाहते हैं, तो गणगौर के समय राजस्थान की यात्रा जरूर करें। यह अनुभव आपको जीवन भर याद रहेगा।
Neha Jain is a festival writer with 7+ years’ experience explaining Indian rituals, traditions, and their cultural meaning, making complex customs accessible and engaging for today’s modern readers.