Sheetala Ashtami 2026: शीतला अष्टमी, जिसे बसौदा (Basoda) भी कहा जाता है, आस्था, स्वास्थ्य और आत्मिक शुद्धता से जुड़ा एक अत्यंत पावन पर्व है। यह दिन रोगों और महामारियों से रक्षा करने वाली माता शीतला की आराधना के लिए समर्पित होता है। शीतला अष्टमी को शीतलता और उपचार का प्रतीक माना जाता है, जो हमें स्वच्छता, संयम और भक्ति के साथ संतुलित जीवन जीने की सीख देता है। यह पर्व याद दिलाता है कि स्वस्थ शरीर और शांत मन के लिए आध्यात्मिकता के साथ स्वच्छता का पालन भी उतना ही आवश्यक है।
वर्ष 2026 में शीतला अष्टमी (Sheetala Ashtami 2026) बुधवार, 11 मार्च को मनाई जाएगी। इस दिन श्रद्धालु व्रत रखते हैं और देवी शीतला को पहले से बना हुआ भोजन यानी बसौदा, नीम की पत्तियां, हल्दी और शुद्ध जल अर्पित करते हैं। भक्त शीतला अष्टकम जैसे स्तोत्रों का पाठ करते हैं और दान-पुण्य के माध्यम से समाज कल्याण की भावना को आगे बढ़ाते हैं। मान्यता है कि श्रद्धा और नियमों के साथ शीतला अष्टमी (Sheetala Ashtami) मनाने से तन-मन की शुद्धि होती है, रोगों से रक्षा मिलती है और परिवार में सुख, शांति व देवी का कृपा-आशीर्वाद बना रहता है।शीतला अष्टमी (Sheetala Ashtami 2026 Date) से एक दिन पहले, मंगलवार 10 मार्च 2026 को शीतला सप्तमी मनाई जाएगी, जिस दिन बसौदा का भोजन तैयार किया जाता है। पंचांग के अनुसार अष्टमी तिथि की शुरुआत 11 मार्च को तड़के 1:54 बजे होगी और इसका समापन 12 मार्च को सुबह 4:19 बजे होगा। इस प्रकार पूरे दिन भक्त व्रत, पूजा और परंपरागत विधियों के साथ माता शीतला (Sheetala Mata) का आशीर्वाद प्राप्त करेंगे।
शीतला अष्टमी का महत्व केवल एक पर्व तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आस्था, स्वास्थ्य और अनुशासित जीवनशैली का सुंदर संगम है। यह दिन देवी शीतला की आराधना के लिए समर्पित होता है, जिन्हें रोगों और विपत्तियों से रक्षा करने वाली करुणामयी देवी माना जाता है। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर मनाया जाने वाला यह पर्व देवी के शीतल, उपचारक और कल्याणकारी स्वरूप का प्रतीक है। मान्यता है कि माता शीतला अपने भक्तों को चेचक, चिकनपॉक्स और अन्य संक्रामक रोगों से बचाती हैं तथा जीवन में शांति और समृद्धि प्रदान करती हैं। इस दिन की पूजा मन, तन और आत्मा—तीनों स्तरों पर संतुलन और शुद्धता का अनुभव कराती है।
शीतला अष्टमी (Importance Of Sheetala Ashtami) हमें केवल स्वास्थ्य की नहीं, बल्कि स्वच्छता, संयम और सजग जीवन जीने की सीख भी देती है। इस दिन ताजा भोजन न बनाकर पहले से तैयार किया गया बसौदा अर्पित किया जाता है, जो आत्मसंयम और सादगी का प्रतीक है। यह परंपरा यह संदेश देती है कि भोग से दूरी और अनुशासन से ही जीवन में वास्तविक शांति आती है। शीतला अष्टकम का पाठ, नीम के पत्ते और हल्दी अर्पित करना, तथा प्रसाद का वितरण जैसे कर्म भक्तों के भीतर करुणा, कृतज्ञता और आध्यात्मिक चेतना को जाग्रत करते हैं।
इस पावन अवसर पर देवी शीतला की कृपा से न केवल रोगों से रक्षा होती है, बल्कि घर-परिवार में सुख, शांति और समृद्धि भी बनी रहती है। दान-पुण्य और सेवा के कार्यों के माध्यम से यह पर्व सामूहिक कल्याण की भावना को भी मजबूत करता है। कुल मिलाकर, शीतला अष्टमी (Sheetala Ashtami) हमें यह याद दिलाती है कि सच्चा स्वास्थ्य और सुरक्षा भक्ति, स्वच्छता और संतुलित जीवनशैली अपनाने से ही संभव है। यह दिन आत्मचिंतन का है, जहां आस्था और मानव कल्याण एक-दूसरे से गहराई से जुड़ते दिखाई देते हैं।
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शीतला अष्टमी के दिन भक्त प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान करते हैं और घर व पूजा स्थान की अच्छी तरह सफाई करके दिन की शुरुआत करते हैं। इस पर्व का सबसे विशेष नियम यह है कि इस दिन ताज़ा भोजन नहीं पकाया जाता। देवी शीतला को एक दिन पहले बना हुआ भोजन, जिसे बसौदा (Basoda Ashtami) कहा जाता है, अर्पित किया जाता है। यह परंपरा संयम, शुद्धता और इंद्रियों पर नियंत्रण का प्रतीक मानी जाती है।
पूजा के दौरान देवी को नीम की पत्तियां, हल्दी, दही, जल और बसौदा (Basoda) अर्पित किया जाता है। भक्त श्रद्धा के साथ शीतला अष्टकम (Sheetala Ashtakam) का पाठ करते हैं और देवी से परिवार के उत्तम स्वास्थ्य, शांति और रोगों से रक्षा की कामना करते हैं। कई लोग इस दिन शीतला माता के मंदिर जाकर दर्शन-पूजन भी करते हैं।
आरती के समय दीपक और कपूर जलाकर भजन-कीर्तन किया जाता है और देवी को उनकी कृपा के लिए धन्यवाद दिया जाता है। शीतला अष्टमी पर दान-पुण्य का भी विशेष महत्व है। लोग अपनी सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र या धन दान करते हैं, जिससे पुण्य की प्राप्ति होती है।
दिन के अंत में परिवार के सभी सदस्य मिलकर प्रार्थना करते हैं और एक-दूसरे के स्वास्थ्य व सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। श्रद्धा और नियमपूर्वक मनाई गई शीतला अष्टमी (Sheetala Ashtami) न केवल आध्यात्मिक शांति देती है, बल्कि स्वच्छता, अनुशासन और स्वस्थ जीवनशैली का संदेश भी देती है।
शीतला अष्टमी की पूजा देवी शीतला को समर्पित एक पवित्र अनुष्ठान है, जिसे श्रद्धा, स्वच्छता और अनुशासन के साथ किया जाता है। मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से की गई पूजा देवी की कृपा से रोगों से रक्षा, उत्तम स्वास्थ्य और मानसिक शांति प्रदान करती है। नीचे शीतला अष्टमी की पूजा विधि (Sheetala Ashtami puja Vidhi) को आसान और क्रमबद्ध रूप में बताया गया है—
प्रातःकाल की तैयारी
दिन की शुरुआत सूर्योदय से पहले स्नान करके करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर और पूजा स्थान की अच्छी तरह सफाई करें, क्योंकि देवी शीतला को स्वच्छता और पवित्रता अत्यंत प्रिय है।
पूजा स्थल की स्थापना
पूजा के लिए साफ स्थान पर देवी शीतला की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। पूजा वेदी को फूलों, हल्दी और नीम की पत्तियों से सजाएं। नीम को देवी से विशेष रूप से जुड़ा माना जाता है।
बसौदा का भोग अर्पण
इस दिन ताजा भोजन नहीं बनाया जाता। एक दिन पहले तैयार किया गया भोजन जैसे रोटी, चावल, दही और मिठाई देवी को भोग स्वरूप अर्पित करें। यही बसौदा कहलाता है और यह संयम का प्रतीक है।
हल्दी-कुमकुम और दीप प्रज्वलन
देवी को हल्दी और कुमकुम अर्पित करें। इसके बाद दीपक और अगरबत्ती जलाकर पूजा की शुरुआत करें।
मंत्र जाप और स्तुति
शीतला अष्टकम, देवी स्तुति या सरल मंत्रों का श्रद्धा से पाठ करें। माना जाता है कि इससे रोगों से रक्षा और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
पवित्र जल का छिड़काव
नीम की पत्तियों को जल में डुबोकर घर और पूजा स्थल में छिड़काव करें। यह वातावरण की शुद्धि और नकारात्मक प्रभावों से रक्षा का प्रतीक माना जाता है।(Sheetala Ashtami Puja)
आरती और भजन
कपूर और दीपक से देवी की आरती करें और भक्ति भाव से भजन गाएं। यह देवी के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव दर्शाता है।
कल्याण की प्रार्थना
पूरे परिवार के स्वास्थ्य, सुख और शांति के लिए देवी से प्रार्थना करें और रोगों से सुरक्षा का आशीर्वाद मांगें।
दान-पुण्य
पूजा के बाद जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र या धन का दान करें। शीतला अष्टमी पर दान-पुण्य को विशेष फलदायी माना जाता है।
श्रद्धा और नियमपूर्वक की गई शीतला अष्टमी पूजा (Sheetala Ashtami Puja) न केवल आध्यात्मिक शांति प्रदान करती है, बल्कि स्वच्छता, संयम और स्वस्थ जीवनशैली अपनाने की प्रेरणा भी देती है।
देवी महात्म्य में माँ दुर्गा के अनेक रूपों का वर्णन मिलता है। मान्यता है कि जब भी सृष्टि का संतुलन बिगड़ता है, तब देवी दुर्गा समय, परिस्थिति और आवश्यकता के अनुसार अलग-अलग रूपों में प्रकट होकर संसार की रक्षा करती हैं। राक्षसी शक्तियों का अंत करना और मानव जीवन को सुरक्षित रखना ही उनका उद्देश्य होता है।
एक प्राचीन कथा के अनुसार, एक समय देवी दुर्गा ने ऋषि कात्यायन की पुत्री कात्यायनी का रूप धारण किया। उस काल में कालकेय के नेतृत्व में राक्षस गांवों पर अत्याचार कर रहे थे। इन्हीं राक्षसों में से एक था ज्वरासुर, जिसने गांवों में चेचक, चिकनपॉक्स, हैजा, पेचिश और तेज बुखार जैसी भयानक बीमारियाँ फैला दीं। ‘ज्वर’ का अर्थ ही बुखार होता है, और ज्वरासुर इन रोगों का प्रतीक माना गया।
कात्यायनी ने शुरुआत में बच्चों और ग्रामीणों को इन रोगों से बचाने का प्रयास किया, लेकिन जब बीमारी तेजी से फैलने लगी, तब उन्होंने देवी शीतला (Devi Sheetala) का स्वरूप धारण किया। इस रूप में देवी के हाथों में झाड़ू, सूप, ठंडे जल से भरा घड़ा और पात्र था, जो रोगों को शांत करने और शीतलता प्रदान करने का प्रतीक माना जाता है। देवी शीतला का उद्देश्य था—रोगों का नाश और पीड़ितों को राहत देना।
इस बीच देवी ने अपने गण बटुक से ज्वरासुर को रोकने के लिए कहा। बटुक और ज्वरासुर के बीच भयंकर युद्ध हुआ, जिसमें बटुक वीरगति को प्राप्त हो गया। बटुक के शरीर का धूल में विलीन हो जाना देखकर ज्वरासुर अहंकार से भर गया। तभी उसके सामने एक अत्यंत भयानक रूप प्रकट हुआ—तीन नेत्र, चार भुजाएँ, हाथों में त्रिशूल, तलवार और कुल्हाड़ी, गले में खोपड़ियों की माला। यह रूप था भैरव, यानी स्वयं भगवान शिव का उग्र स्वरूप।
भैरव ने ज्वरासुर को चेतावनी दी कि वह देवी कात्यायनी (दुर्गा) के चरणों में आत्मसमर्पण करे। जब ज्वरासुर ने ऐसा करने से इंकार किया, तो भैरव ने अपने दिव्य त्रिशूल से उसका वध कर दिया और संसार को रोगों के आतंक से मुक्त किया। (Sheetala Ashtami)
इसी घटना के बाद देवी शीतला को रोगों से रक्षा करने वाली देवी के रूप में पूजा जाने लगा। आज भी कई क्षेत्रों में देवी शीतला की आराधना स्थानीय परंपराओं के अनुसार की जाती है। उनके मंदिरों में उन्हें ज्वरासुर, घनतु देवता, रक्तबती और ओलादेवी जैसे रोग-प्रतीकों के साथ दर्शाया जाता है, जो इस बात का संकेत है कि देवी हर प्रकार की बीमारी से रक्षा करने वाली करुणामयी शक्ति हैं।
शीतला अष्टमी (Sheetala Ashtami ki Kahani) की यह कथा हमें यह सिखाती है कि भक्ति, संयम और स्वच्छता के माध्यम से न केवल आध्यात्मिक शांति मिलती है, बल्कि स्वास्थ्य और जीवन की रक्षा भी सुनिश्चित होती है।
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वैदिक परंपरा में देवी-देवताओं का प्रत्येक स्वरूप गहरे प्रतीकात्मक अर्थ से जुड़ा होता है। देवी शीतला का स्वरूप भी केवल बाहरी नहीं, बल्कि शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक शुद्धि का संदेश देता है। उन्हें गधे पर विराजमान दिखाया गया है और उनके हाथों में सूप, झाड़ू, जल से भरा पात्र और नीम की पत्तियाँ होती हैं—इन सभी के पीछे एक गहन भाव छिपा है।
सूप (छाज):
देवी शीतला के हाथ में धारण किया गया सूप शुद्धिकरण का प्रतीक है। जैसे सूप से अनाज साफ किया जाता है और भूसा अलग किया जाता है, वैसे ही यह शरीर और मन से रोग व अशुद्धता को दूर करने का संकेत देता है। यह दर्शाता है कि बीमारी से मुक्ति पाने के लिए शुद्धि और संतुलन आवश्यक है।(Sheetala Ashtami)
झाड़ू:
देवी की झाड़ू नकारात्मक शक्तियों और रोगाणुओं को हटाने का प्रतीक मानी जाती है। मान्यता है कि देवी इसी झाड़ू से बुरे तत्वों का नाश करती हैं और रोग से पीड़ित व्यक्ति को राहत देती हैं। यह हमें सिखाती है कि नकारात्मकता को जड़ से हटाना ही वास्तविक उपचार है।
जल से भरा पात्र:
देवी शीतला के हाथ में जल से भरा पात्र शीतलता और उपचार का प्रतीक है। यह जल रोग से तप्त शरीर को शांति और ठंडक प्रदान करता है। यह दर्शाता है कि स्वास्थ्य केवल रोगमुक्त होना नहीं, बल्कि शरीर और मन दोनों का संतुलन लौटना है।
नीम की पत्तियाँ:
नीम की पत्तियाँ आयुर्वेद में औषधीय गुणों के लिए जानी जाती हैं। देवी द्वारा इन्हें धारण करना यह संकेत देता है कि प्रकृति ही सबसे बड़ी चिकित्सक है। नीम शरीर को रोगों से बचाता है और आत्मा को भी शुद्ध करता है, जिससे जीवन में सामंजस्य बना रहता है।
गधा (वाहन):
देवी शीतला का वाहन गधा धैर्य, सरलता और सहनशीलता का प्रतीक है। बीमारी या संकट के समय शांत रहना, विनम्रता बनाए रखना और धैर्यपूर्वक कर्तव्यों का निर्वाह करना—यही इस वाहन का संदेश है।
इस प्रकार देवी शीतला का स्वरूप हमें यह सिखाता है कि सच्चा स्वास्थ्य केवल औषधि से नहीं, बल्कि शुद्ध विचार, संयम, प्रकृति से जुड़ाव और आंतरिक संतुलन से प्राप्त होता है।
शीतला अष्टमी (Sheetala Ashtami 2026) केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आस्था और जीवनशैली के संतुलन का सुंदर उदाहरण है। यह त्योहार हमें याद दिलाता है कि भक्ति के साथ-साथ स्वच्छता, संयम और अनुशासन भी स्वस्थ जीवन की आधारशिला हैं। देवी शीतला की पूजा के माध्यम से भक्त न केवल रोगों और महामारियों से रक्षा का आशीर्वाद मांगते हैं, बल्कि अपने जीवन में शुद्धता और सकारात्मकता को भी अपनाते हैं। बसौदा अर्पण, उपवास और दान-पुण्य जैसी परंपराएं हमें आत्म-संयम, करुणा और सामाजिक जिम्मेदारी का संदेश देती हैं। कुल मिलाकर, शीतला अष्टमी (Sheetala Ashtami 2026) यह सिखाती है कि सच्ची सुरक्षा और सुख आस्था, जागरूक जीवनशैली और दूसरों के कल्याण की भावना से ही प्राप्त होते हैं।
Neha Jain is a festival writer with 7+ years’ experience explaining Indian rituals, traditions, and their cultural meaning, making complex customs accessible and engaging for today’s modern readers.