Desktop Special Offer Mobile Special Offer
February 23, 2026 Blog

Baisakhi 2026: बैसाखी पर्व कब है,जाने तिथि, समय, महत्व और इस पर्व की खास परंपराएं

BY : Neha Jain – Cultural & Festival Content Writer

Baisakhi 2026: बैसाखी, जिसे वैसाखी (vaisakhi) भी कहा जाता है, सिख धर्म का एक अत्यंत पवित्र और ऐतिहासिक पर्व है। यह सिर्फ नई फसल के आगमन की खुशी नहीं, बल्कि वर्ष 1699 में गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा खालसा पंथ की स्थापना की गौरवशाली याद भी दिलाता है। इसी दिन आनंदपुर साहिब में खालसा पंथ की नींव रखी गई थी, जिसने सिख इतिहास को नई दिशा दी।

भारत में वैसाखी (vaisakhi) को बसंत ऋतु के आगमन और नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। खेतों में लहलहाती सुनहरी फसल किसानों के परिश्रम का फल होती है, इसलिए यह त्योहार उनके लिए विशेष उत्साह और कृतज्ञता का अवसर बन जाता है।

इस दिन गुरुद्वारों में विशेष कीर्तन, अरदास और लंगर का आयोजन होता है। लोग पारंपरिक परिधान पहनकर भांगड़ा और गिद्धा जैसे लोकनृत्य करते हैं, और स्वादिष्ट पकवानों के साथ खुशियां साझा करते हैं। हालांकि पंजाब और हरियाणा में बैसाखी बड़े ही धूमधाम से मनाई जाती है, लेकिन भारत के अलग-अलग हिस्सों में यह अलग नामों और परंपराओं के साथ मनाई जाती है। असम में इसे रोंगाली बिहू, बंगाल में नोबो बोरशो, तमिलनाडु में पुथंडु, केरल में विशु और बिहार में वैशाखा के रूप में जाना जाता है।

बैसाखी का महत्व (The Importance of Baisakhi)

बैसाखी (Baisakhi) का महत्व केवल एक त्योहार के रूप में नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास और प्रकृति के साथ जुड़ी गहरी भावना के रूप में समझा जाता है। यह दिन सिख धर्म के लिए विशेष इसलिए है क्योंकि वर्ष 1699 में गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना कर समाज को एक नई दिशा दी थी। इस घटना ने साहस, समानता और धर्म की रक्षा के संकल्प को मजबूत किया। इसलिए बैसाखी केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, त्याग और एकता की याद दिलाने वाला दिन है।

कृषि प्रधान भारत में वैसाखी (Importance Of Vaisakhi) का महत्व किसानों के जीवन से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। जब खेतों में गेहूं की सुनहरी बालियां लहराती हैं, तब किसान अपनी मेहनत का फल पाकर ईश्वर का आभार व्यक्त करते हैं। यह पर्व उनके लिए नई उम्मीद, समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक बनकर आता है। लोग प्रकृति के प्रति कृतज्ञता जताते हैं और आने वाले वर्ष के लिए सुख-शांति की कामना करते हैं।

सामाजिक रूप से भी बैसाखी (Baisakhi  festival) लोगों को जोड़ने का कार्य करती है। गुरुद्वारों में विशेष कीर्तन, अरदास और लंगर का आयोजन होता है, जहां सभी लोग बिना किसी भेदभाव के साथ बैठकर भोजन करते हैं। यह समानता और भाईचारे का संदेश देता है। गांवों और शहरों में मेले, भांगड़ा और गिद्धा जैसे लोकनृत्य उत्सव को और भी जीवंत बना देते हैं।

देश के विभिन्न राज्यों में अलग-अलग नामों से मनाया जाने वाला यह पर्व भारत की सांस्कृतिक विविधता को भी दर्शाता है। इस प्रकार बैसाखी केवल एक धार्मिक तिथि नहीं, बल्कि नई शुरुआत, कृतज्ञता, साहस और सामूहिक खुशी का प्रतीक है, जो हर साल लोगों के जीवन में नई ऊर्जा भर देता है।

baisakhi 2026

यह भी पढ़ें - Varuthini Ekadashi 2026: जाने वरुथिनी एकादशी की तिथि महत्व, व्रत कथा, पूजा विधि

बैसाखी तिथि और महत्वपूर्ण समय (Baisakhi 2026 Date and Important Times)

बैसाखी का त्योहार हर साल 13 या 14 अप्रैल को मनाया जाता है। वर्ष 2026 (Baisakhi 2026 date) में यह पर्व 14 अप्रैल, मंगलवार के दिन मनाया जाएगा। इसी दिन सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है, जिसे बैसाखी संक्रांति कहा जाता है। वर्ष 2026 में संक्रांति का शुभ समय सुबह 09:39 बजे है। इस समय को बहुत पवित्र माना जाता है, इसलिए लोग स्नान, दान और पूजा करते हैं।

वैसाखी (vaisakhi festival) का दिन नई शुरुआत का प्रतीक है। किसान इस समय अपनी फसल कटने की खुशी मनाते हैं और भगवान का धन्यवाद करते हैं। गुरुद्वारों में विशेष कार्यक्रम, कीर्तन और लंगर का आयोजन होता है। लोग नए कपड़े पहनते हैं, एक-दूसरे को बधाई देते हैं और खुशियां बांटते हैं।

सरल शब्दों में कहें तो बैसाखी खुशियों, मेहनत के फल, आस्था और नई उम्मीदों का त्योहार है। यह दिन हमें धन्यवाद देना, मिल-जुलकर रहना और सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ना सिखाता है।

बैसाखी का इतिहास: बैसाखी क्यों मनाई जाती है? (History of Baisakhi: Why is Baisakhi celebrated)

बैसाखी का इतिहास धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। यह पर्व हर साल अप्रैल महीने में मनाया जाता है और खासतौर पर सिख समुदाय के लिए बेहद पवित्र माना जाता है। बैसाखी मनाने के पीछे दो मुख्य कारण हैं – पहला, नई फसल की खुशी और दूसरा, खालसा पंथ की स्थापना।

इतिहास के अनुसार, वर्ष 1699 में आनंदपुर साहिब में दसवें सिख गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी ने बैसाखी के दिन खालसा पंथ की स्थापना की थी। उन्होंने लोगों को अन्याय के खिलाफ खड़े होने, धर्म की रक्षा करने और साहस के साथ जीवन जीने का संदेश दिया। इसी दिन “पांच प्यारों” को दीक्षा दी गई और सिखों को एक नई पहचान मिली। यह घटना सिख इतिहास में एक बहुत बड़ा मोड़ साबित हुई। इसलिए बैसाखी को सिख धर्म में विशेष श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाया जाता है।

इसके अलावा, बैसाखी (Baisakhi festival ) का संबंध खेती और किसानों से भी जुड़ा हुआ है। इस समय गेहूं की फसल तैयार होकर कटाई के लिए तैयार होती है। किसान अपनी मेहनत का फल पाकर खुश होते हैं और ईश्वर का धन्यवाद करते हैं। इसलिए यह त्योहार खुशी, समृद्धि और कृतज्ञता का प्रतीक भी है।

गुरुद्वारों में इस दिन विशेष कीर्तन, अरदास और लंगर का आयोजन किया जाता है। लोग नए कपड़े पहनते हैं, एक-दूसरे को बधाई देते हैं और भांगड़ा-गिद्धा जैसे लोकनृत्य कर उत्सव मनाते हैं।

बैसाखी का ज्योतिषीय महत्व (Astrological Significance of Baisakhi)

बैसाखी का महत्व केवल धार्मिक और ऐतिहासिक ही नहीं, बल्कि ज्योतिष के अनुसार भी बहुत खास माना जाता है। इस दिन सूर्य देव मेष राशि में प्रवेश करते हैं। इसे “मेष संक्रांति” कहा जाता है। ज्योतिष शास्त्र में मेष राशि सूर्य की उच्च राशि मानी जाती है, इसलिए इस समय को बहुत शुभ और ऊर्जावान माना जाता है।

जब सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है, तब सौर नववर्ष की शुरुआत मानी जाती है। यह समय नई योजनाएं शुरू करने, शुभ कार्य करने और सकारात्मक बदलाव लाने के लिए अच्छा माना जाता है। लोग इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करते हैं, दान-पुण्य करते हैं और भगवान से सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

ज्योतिष के अनुसार, सूर्य आत्मविश्वास, ऊर्जा और नेतृत्व का प्रतीक है। मेष राशि में प्रवेश करने से साहस और नई शुरुआत की भावना मजबूत होती है। इसलिए बैसाखी को जीवन में नई दिशा और नई उम्मीदों का प्रतीक भी माना जाता है।

सरल शब्दों में कहें तो बैसाखी (Baisakhi festival) का दिन ग्रहों की दृष्टि से सकारात्मक ऊर्जा लेकर आता है। यह समय मन को मजबूत करने, अच्छे संकल्प लेने और उज्ज्वल भविष्य की ओर कदम बढ़ाने का संकेत देता है।

यह भी पढ़ें -Chaupai Sahib Path In Hindi : पढ़ें चौपाई साहिब का सम्पूर्ण पाठ हिंदी उच्चारण सहित

बैसाखी कैसे मनाई जाती है? (How is Baisakhi celebrated)

बैसाखी खुशियों(Happy Baisakhi) , आस्था और उत्साह से भरा हुआ त्योहार है। यह दिन खासतौर पर सिख समुदाय और किसानों के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है। सुबह लोग जल्दी उठकर पवित्र स्नान करते हैं और भगवान को याद करते हैं। घरों की साफ-सफाई की जाती है, नए और रंग-बिरंगे कपड़े पहने जाते हैं और परिवार के साथ मिलकर इस दिन को खास बनाया जाता है।

बैसाखी के दिन गुरुद्वारों में विशेष कीर्तन, अरदास और कथा का आयोजन होता है। खासकर अमृतसर के Golden Temple में इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। नगर कीर्तन निकाले जाते हैं, जिनमें भक्ति गीत, झांकियां और धार्मिक संदेश दिए जाते हैं। इस दिन वर्ष 1699 में गुरु गोबिंद सिंह द्वारा खालसा पंथ की स्थापना को भी याद किया जाता है। गुरुद्वारों में लंगर लगाया जाता है, जहां सभी लोग एक साथ बैठकर भोजन करते हैं, जो समानता और भाईचारे का प्रतीक है।

गांवों और खेतों में भी वैसाखी (vaisakhi) का अलग ही उत्साह देखने को मिलता है। इस समय गेहूं की फसल तैयार होती है, इसलिए किसान अपनी मेहनत का फल पाकर खुश होते हैं और भगवान का धन्यवाद करते हैं। ढोल की थाप पर भांगड़ा और गिद्धा जैसे लोकनृत्य किए जाते हैं। मेलों का आयोजन होता है और लोग पारंपरिक पकवानों का आनंद लेते हैं।

सरल शब्दों में कहें तो बैसाखी (Happy Baisakhi) मिल-जुलकर खुशियां मनाने, आभार व्यक्त करने और नई शुरुआत का स्वागत करने का पर्व है। यह दिन हर किसी के जीवन में नई ऊर्जा और उम्मीद लेकर आता है।

बैसाखी के बारे में रोचक तथ्य (Interesting facts about Baisakhi)

बैसाखी सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि इतिहास, आस्था और संस्कृति से जुड़ा खास दिन है। आइए जानते हैं इससे जुड़े कुछ दिलचस्प और कम ज्ञात तथ्य —

1. खालसा पंथ की स्थापना का दिन

साल 1699 में गुरु गोबिंद सिंह ने आनंदपुर साहिब में बैसाखी के दिन खालसा पंथ की स्थापना की थी। इसी दिन “पांच प्यारों” को अमृत छकाया गया और सिखों को नई पहचान मिली।

2. सिख नववर्ष की शुरुआत

बैसाखी को सिख समुदाय में नए साल की शुरुआत भी माना जाता है। यह दिन नई ऊर्जा, नए संकल्प और नई उम्मीदों का प्रतीक है।

3. सूर्य का मेष राशि में प्रवेश

ज्योतिष के अनुसार, इस दिन सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है, जिसे मेष संक्रांति कहा जाता है। इसे सौर नववर्ष की शुरुआत भी माना जाता है।

4. कई राज्यों में अलग-अलग नाम

बैसाखी पूरे भारत में अलग-अलग नामों से मनाई जाती है। असम में रोंगाली बिहू, बंगाल में नोबो बोरशो, तमिलनाडु में पुथंडु और केरल में विशु के रूप में यह पर्व मनाया जाता है।

5. किसानों का खास त्योहार

यह समय गेहूं की फसल कटाई का होता है। इसलिए किसानों के लिए यह सबसे खुशी का मौका होता है। वे अपनी मेहनत का फल पाकर भगवान का धन्यवाद करते हैं।

6. स्वर्ण मंदिर में विशेष आयोजन

Golden Temple में बैसाखी के दिन लाखों श्रद्धालु माथा टेकने आते हैं। यहां विशेष कीर्तन और लंगर का आयोजन होता है।

7. भांगड़ा और गिद्धा की धूम

बैसाखी (Baisakhi 2026) के अवसर पर पंजाब में भांगड़ा और गिद्धा जैसे पारंपरिक नृत्य किए जाते हैं। ढोल की थाप पर लोग खुशी से झूम उठते हैं।

इन रोचक तथ्यों से साफ है कि बैसाखी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि इतिहास, परंपरा, खेती और संस्कृति का सुंदर संगम है।

निष्कर्ष (Conclusion)

बैसाखी (Baisakhi 2026) केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास और खुशियों का संगम है। यह दिन हमें 1699 में खालसा पंथ की स्थापना की याद दिलाता है और साहस, समानता तथा धर्म के प्रति समर्पण का संदेश देता है। साथ ही, यह किसानों की मेहनत और नई फसल की खुशी का उत्सव भी है।

14 अप्रैल 2026 को मनाई जाने वाली बैसाखी नई शुरुआत, सकारात्मक ऊर्जा और कृतज्ञता का प्रतीक बनेगी। गुरुद्वारों में होने वाले कीर्तन, लंगर और सामाजिक मेल-मिलाप इस पर्व को और भी खास बनाते हैं। यह त्योहार हमें मिल-जुलकर रहने, अपनी जड़ों से जुड़े रहने और जीवन में नई उम्मीदों के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।

यह भी पढ़ें - Hanuman Jayanti 2026: इस साल कब है हनुमान जयंती, जाने सही तिथि, मुहूर्त और पूजा विधि

Author: Neha Jain – Cultural & Festival Content Writer

Neha Jain is a festival writer with 7+ years’ experience explaining Indian rituals, traditions, and their cultural meaning, making complex customs accessible and engaging for today’s modern readers.