जब सूर्य देव अपनी चाल बदलते हैं, तो प्रकृति में बदलाव आता है और मानव जीवन की ऊर्जा भी बदलती है। सनातन धर्म में संक्रांति को आत्मिक जागृति और पुण्य संचय का अवसर माना गया है। कार्तिक मास में जब सूर्य देव तुला राशि से निकलकर वृश्चिक राशि में प्रवेश करते हैं, तो इसे वृश्चिक संक्रांति 2026 (Vrishchika Sankranti 2026) कहते हैं। यह दिन सूर्य देव की पूजा करने और पापों के प्रायश्चित का अवसर है। पवित्र नदी में स्नान करके सूर्य देव को अर्घ्य देना और जरूरतमंदों को दान करना आत्मा को शांति देता है।
सूर्य देव का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करना संक्रांति कहलाता है। जब सूर्य देव तुला राशि से निकलकर वृश्चिक राशि में प्रवेश करते हैं, तोइसे वृश्चिक संक्रांति 2026 (Vrishchika Sankranti 2026) कहते हैं। यह हिंदू पंचांग की आठवीं संक्रांति है। वृश्चिक राशि जल तत्व की राशि है और इसका स्वामी मंगल है, जो अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व करता है। इस दिन सूर्य देव की पूजा करने से जीवन में तेज, पराक्रम और ऊर्जा का संचार होता है। पवित्र नदियों में स्नान, सूर्य देव को अर्घ्य और दान करने की परंपरा है।
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वृश्चिक संक्रांति 2026 (Vrishchika Sankranti 2026), 16 नवंबर, सोमवार को मनाई जाएगी। गोचर समय और पुण्य काल का विवरण नीचे दिया गया है:
वृश्चिक संक्रांति 2026 (Vrishchika Sankranti 2026) का महत्व धार्मिक और ज्योतिषीय दृष्टिकोण से बहुत है। सूर्य देव प्रत्यक्ष देवता हैं जो जीवन शक्ति और आरोग्य प्रदान करते हैं। वृश्चिक राशि में सूर्य का प्रवेश व्यक्ति के आत्मविश्वास, साहस और निर्णय लेने की क्षमता को बढ़ाता है।
शास्त्रों में कहा गया है कि संक्रांति के दिन किया गया दान, जप और तप अधिक फलदायी होता है। पवित्र नदियों में स्नान करने से पाप मिट जाते हैं। जो लोग बीमारियों से ग्रसित हैं, उनके लिए सूर्य साधना करने से आरोग्य की प्राप्ति होती है।
वृश्चिक संक्रांति के दिन सूर्य देव की पूजा शास्त्रीय नियमों से की जाती है। आइए जानते हैं पूजा विधि:

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संक्रांति के पावन अवसर पर कुछ विशेष नियमों का पालन करना चाहिए:
क्या करें:
क्या न करें:
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जब देवताओं और दैत्यों के बीच युद्ध हुआ, तो असुरों ने देवताओं को स्वर्ग से निष्कासित कर दिया। देवता महर्षि कश्यप के पास पहुँचे। तब महर्षि कश्यप की सलाह पर देवताओं ने भगवान सूर्य की कठोर तपस्या की। सूर्य देव देवताओं के भक्ति भाव से प्रसन्न हुए। उन्होंने देवताओं को वरदान दिया कि वे अपने तेज और प्रकाश से असुरों का सर्वनाश करेंगे। सूर्य देव ने अपने अग्नि रूप से असुरों की शक्तियों को भस्म कर दिया और देवताओं को उनका खोया हुआ राजपाट पुनः लौटा दिया। जिस दिन सूर्य देव ने देवताओं को यह विजय दिलाई थी, उस समय वे वृश्चिक राशि में थे। तभी से वृश्चिक संक्रांति 2026 (Vrishchika Sankranti 2026) के दिन सूर्य देव की पूजा करने का विधान चला आ रहा है ताकि मनुष्य के जीवन में छिपे दुखों और शत्रुओं का सर्वनाश हो सके।
वृश्चिक संक्रांति 2026 (Vrishchika Sankranti 2026) का यह पावन पर्व हमें जीवन को नए प्रकाश, सकारात्मकता और ऊर्जा से भरने का अवसर देता है। यह दिन हमें सिखाता है कि जिस प्रकार सूर्य देव बिना पक्षपात के पूरी सृष्टि को अपना प्रकाश देते हैं, उसी प्रकार हमें भी समाज सेवा और परोपकार में योगदान देना चाहिए। जब हम निश्छल मन से सूर्य देव को जल अर्पित करते हैं और जरूरतमंदों की मदद करते हैं, तो ईश्वर का सुरक्षा चक्र हमारे जीवन को संभाल लेता है। वर्ष की वृश्चिक संक्रांति 2026 (Vrishchika Sankranti 2026) आपके जीवन में उत्तम स्वास्थ्य, मान-सम्मान, अपार समृद्धि और असीम शांति लेकर आए। भगवान सूर्य नारायण की जय
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1. वृश्चिक संक्रांति 2026 (Vrishchika Sankranti 2026) में कब है?
वृश्चिक संक्रांति 2026 (Vrishchika Sankranti 2026) का पावन पर्व 16 नवंबर, सोमवार को मनाया जाएगी।
2. वृश्चिक संक्रांति पर किस देवता की पूजा की जाती है?
इस दिन मुख्य रूप से प्रत्यक्ष देव भगवान सूर्य नारायण की पूजा की जाती है।
3. वृश्चिक संक्रांति पर दान का सबसे शुभ समय क्या है?
16 नवंबर 2026 को दोपहर 01:45 बजे से दोपहर 03:36 बजे तक महा पुण्य काल का समय दान के लिए सबसे शुभ रहेगा।
4. वृश्चिक संक्रांति के दिन किन वस्तुओं का दान करना चाहिए?
इस दिन गुड़, तिल, गेहूं, लाल वस्त्र, तांबे के बर्तन और कंबल का दान करना अत्यंत फलदायी माना जाता है।
5. क्या वृश्चिक संक्रांति पर सूर्य नमस्कार करना फलदायी होता है?
जी हां, इस दिन सूर्य नमस्कार करने और आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करने से शारीरिक आरोग्यता और मानसिक बल प्राप्त होता है।
Neha Jain is a festival writer with 7+ years’ experience explaining Indian rituals, traditions, and their cultural meaning, making complex customs accessible and engaging for today’s modern readers.