भाद्रपद महीने की घनघोर अंधेरी रात, आसमान से बरसती बारिश की बूंदें, और अचानक चारों तरफ फैल जाने वाली अलौकिक रोशनी। सदियों पहले, भगवान श्री कृष्ण ने अपने बाल रूप में कंस के क्रूर कारागार में कदम रखा था, और प्रकृति ने उनका स्वागत किया था। ज्योतिष शास्त्र में श्री कृष्ण के जन्म के समय, दो योग सबसे महत्वपूर्ण माने गए हैं - भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का सुंदर मिलन। इस पावन और दिव्य संयोग को दक्षिण भारत से लेकर उत्तर भारत तक, अष्टमी रोहिणी 2026 (Ashtami Rohini 2026) के महापर्व के रूप में मनाया जाता है। इस साल यह महासंयोग 4 सितंबर को बन रहा है।
अष्टमी रोहिणी 2026 (Ashtami Rohini 2026) केवल एक कैलेंडर की तारीख नहीं है, बल्कि यह हर कृष्ण भक्त के दिल के तार झंकृत करने वाला दिन है। जब कान्हा के जन्मोत्सव पर मंदिरों में शंख गूंजते हैं और घरों में नन्हे कान्हा के पैरों के निशान बनाए जाते हैं, तो ऐसा लगता है मानो साक्षात द्वारकाधीश हमारे घर पधार रहे हैं। आइए इस पावन लेख के जरिए जानते हैं कि साल 2026 में इस महापर्व का शुभ मुहूर्त क्या है, इसकी सरल पूजा विधि क्या है, और यह व्रत हमारे जीवन में क्या बदलाव लाता है।
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सरल और आम भाषा में कहें, तो भगवान श्री कृष्ण का जन्म भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। जब ये दोनों परिस्थितियां एक साथ एक ही दिन मिलती हैं, तो उसे 'अष्टमी रोहिणी' या 'रोहिणी अष्टमी' कहा जाता है। केरल और तमिलनाडु समेत दक्षिण भारत के राज्यों में इस दिन को मुख्य रूप से 'श्री कृष्ण जयंती' के रूप में बेहद धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन बाल गोपाल को प्रसन्न करने के लिए विशेष व्रत रखने और झांकियां सजाने की अनूठी परंपरा है।
साल में अष्टमी रोहिणी (Ashtami Rohini 2026) का यह पावन महासंयोग 4 सितंबर, शुक्रवार को आ रहा है। इस दिन तिथि और नक्षत्र का मिलन रात के समय होने से पूजा का फल अनंत गुना बढ़ गया है। पंचांग गणना के अनुसार मुख्य समय कुछ इस प्रकार हैं:
अष्टमी रोहिणी व्रत तारीख: 4 सितंबर 2026, दिन शुक्रवारसनातन संस्कृति में अष्टमी रोहिणी 2026 (Ashtami Rohini 2026) व्रत का बहुत बड़ा महत्व बताया गया है। रोहिणी नक्षत्र के स्वामी स्वयं चंद्रमा हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जब चंद्रमा अपनी उच्च राशि वृषभ में रहकर रोहिणी नक्षत्र से मिलता है, तो ब्रह्मांड में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बहुत तेज हो जाता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से मनुष्य के पिछले कई जन्मों के पाप कट जाते हैं। यह पर्व हमें सिखाता है कि चाहे जीवन में कंस जैसी परेशानियां कितनी भी बड़ी क्यों न हों, यदि ईश्वर के प्रति हमारा विश्वास अडूट है, तो जीत हमेशा धर्म और सत्य की ही होगी। जो लोग जीवन में बार-बार असफल हो रहे हैं या मानसिक रूप से परेशान हैं, उनके लिए यह दिन नई मानसिक शांति प्राप्त करने का एक महाद्वार है।

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अष्टमी रोहिणी 2026 (Ashtami Rohini 2026) के दिन घर में ही बहुत प्यारे और सरल तरीके से बाल गोपाल की पूजा की जा सकती है। आइए जानते हैं इसकी प्रामाणिक पूजा विधि:
इस व्रत का पूरा पुण्य फल प्राप्त करने के लिए कुछ जरूरी नियमों का पालन करना अनिवार्य है:
माताएं और श्रद्धालु जब इस पावन दिन पर व्रत रखते हैं, तो उन्हें निम्नलिखित लाभ मिलते हैं:
इस पावन व्रत के दौरान अनजाने में भी कोई गलती न हो, इसलिए इन बातों का विशेष ध्यान रखें:
क्या करें:
क्या न करें:
पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, द्वापर युग में जब मथुरा का राजा कंस अपने अत्याचारों से पूरी धरती को त्रस्त कर चुका था, तब धरती माता ने गाय का रूप धारण कर भगवान विष्णु से रक्षा की गुहार लगाई। प्रभु ने वचन दिया कि वे देवकी के गर्भ से आठवीं संतान के रूप में जन्म लेकर कंस का अंत करेंगे। कंस ने देवकी और उनके पति वासुदेव को जेल में डाल दिया और उनकी सात संतानों को मार डाला। जब आठवीं संतान के जन्म का समय आया, तो वह भाद्रपद मास की अष्टमी तिथि थी और आकाश में रोहिणी नक्षत्र का उदय हुआ था। जैसे ही मध्यरात्रि को प्रभु का प्राकट्य हुआ, जेल के सारे पहरेदार सो गए, बेड़ियां टूट गईं और दरवाजे अपने आप खुल गए। वासुदेव जी उफनती हुई यमुना नदी को पार करके कन्हा को गोकुल में नंदबाबा के घर छोड़ आए। बाद में इसी दिव्य बालक ने कंस का वध कर सबको भयमुक्त किया और धर्म का परचम लहराया।
4 सितंबर को आने वाला यह अष्टमी रोहिणी (Ashtami Rohini 2026) का पर्व हमारे जीवन में नई खुशियां और भक्ति का सवेरा लेकर आ रहा है। यह महासंयोग हमें याद दिलाता है कि जब हमारे जीवन में अंधेरा बहुत गहरा हो जाता है, तो ईश्वर किसी न किसी रूप में हमारे दुखों को हरने जरूर आते हैं। आइए, इस साल पूरी श्रद्धा से कन्हा का स्वागत करें, अपने घरों को गोकुल की तरह सजाएं और बाल गोपाल से सुख, समृद्धि और आरोग्यता का वरदान मांगें। हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैया लाल की!
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Neha Jain is a festival writer with 7+ years’ experience explaining Indian rituals, traditions, and their cultural meaning, making complex customs accessible and engaging for today’s modern readers.