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June 12, 2026 Blog

Ashtami Rohini 2026 : व्रत कब है? जानें श्री कृष्ण के प्रिय नक्षत्र का शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व

BY : Neha Jain – Cultural & Festival Content Writer

जब सृष्टि सजी कान्हा के रंग में: अष्टमी रोहिणी 2026 की अलौकिक महिमा (When Creation Was Adorned in Kanha’s Colors: The Divine Glory of Ashtami Rohini 2026)

भाद्रपद महीने की घनघोर अंधेरी रात, आसमान से बरसती बारिश की बूंदें, और अचानक चारों तरफ फैल जाने वाली अलौकिक रोशनी। सदियों पहले, भगवान श्री कृष्ण ने अपने बाल रूप में कंस के क्रूर कारागार में कदम रखा था, और प्रकृति ने उनका स्वागत किया था। ज्योतिष शास्त्र में श्री कृष्ण के जन्म के समय, दो योग सबसे महत्वपूर्ण माने गए हैं - भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का सुंदर मिलन। इस पावन और दिव्य संयोग को दक्षिण भारत से लेकर उत्तर भारत तक, अष्टमी रोहिणी 2026 (Ashtami Rohini 2026) के महापर्व के रूप में मनाया जाता है। इस साल यह महासंयोग 4 सितंबर को बन रहा है।

अष्टमी रोहिणी 2026 (Ashtami Rohini 2026) केवल एक कैलेंडर की तारीख नहीं है, बल्कि यह हर कृष्ण भक्त के दिल के तार झंकृत करने वाला दिन है। जब कान्हा के जन्मोत्सव पर मंदिरों में शंख गूंजते हैं और घरों में नन्हे कान्हा के पैरों के निशान बनाए जाते हैं, तो ऐसा लगता है मानो साक्षात द्वारकाधीश हमारे घर पधार रहे हैं। आइए इस पावन लेख के जरिए जानते हैं कि साल 2026 में इस महापर्व का शुभ मुहूर्त क्या है, इसकी सरल पूजा विधि क्या है, और यह व्रत हमारे जीवन में क्या बदलाव लाता है।

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अष्टमी रोहिणी क्या है? (What is Ashtami Rohini?)

सरल और आम भाषा में कहें, तो भगवान श्री कृष्ण का जन्म भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। जब ये दोनों परिस्थितियां एक साथ एक ही दिन मिलती हैं, तो उसे 'अष्टमी रोहिणी' या 'रोहिणी अष्टमी' कहा जाता है। केरल और तमिलनाडु समेत दक्षिण भारत के राज्यों में इस दिन को मुख्य रूप से 'श्री कृष्ण जयंती' के रूप में बेहद धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन बाल गोपाल को प्रसन्न करने के लिए विशेष व्रत रखने और झांकियां सजाने की अनूठी परंपरा है।

अष्टमी रोहिणी 2026 तिथि और शुभ मुहूर्त (Date and Time)

साल में अष्टमी रोहिणी (Ashtami Rohini 2026) का यह पावन महासंयोग 4 सितंबर, शुक्रवार को आ रहा है। इस दिन तिथि और नक्षत्र का मिलन रात के समय होने से पूजा का फल अनंत गुना बढ़ गया है। पंचांग गणना के अनुसार मुख्य समय कुछ इस प्रकार हैं:

अष्टमी रोहिणी व्रत तारीख: 4 सितंबर 2026, दिन शुक्रवार
अष्टमी तिथि का प्रारंभ: 3 सितंबर 2026 को सायंकाल 05:15 बजे से
अष्टमी तिथि की समाप्ति: 4 सितंबर 2026 को सायंकाल 06:40 बजे तक
रोहिणी नक्षत्र का प्रारंभ: 4 सितंबर 2026 को दोपहर 12:55 बजे से शुरू
रोहिणी नक्षत्र की समाप्ति: 5 सितंबर 2026 को दोपहर 02:30 बजे तक
निशीथ काल (मध्यरात्रि पूजा का समय): रात्रि 11:58 PM से रात 12:44 AM तक (यह कान्हा के स्वागत का सबसे मुख्य समय है)।

इस महासंयोग का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व (Importance)

सनातन संस्कृति में अष्टमी रोहिणी 2026 (Ashtami Rohini 2026) व्रत का बहुत बड़ा महत्व बताया गया है। रोहिणी नक्षत्र के स्वामी स्वयं चंद्रमा हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जब चंद्रमा अपनी उच्च राशि वृषभ में रहकर रोहिणी नक्षत्र से मिलता है, तो ब्रह्मांड में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बहुत तेज हो जाता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से मनुष्य के पिछले कई जन्मों के पाप कट जाते हैं। यह पर्व हमें सिखाता है कि चाहे जीवन में कंस जैसी परेशानियां कितनी भी बड़ी क्यों न हों, यदि ईश्वर के प्रति हमारा विश्वास अडूट है, तो जीत हमेशा धर्म और सत्य की ही होगी। जो लोग जीवन में बार-बार असफल हो रहे हैं या मानसिक रूप से परेशान हैं, उनके लिए यह दिन नई मानसिक शांति प्राप्त करने का एक महाद्वार है।

लड्डू गोपाल की चरणबद्ध पूजा विधि (Pooja rituals)

krishna ladoo gopal 2026

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अष्टमी रोहिणी 2026 (Ashtami Rohini 2026) के दिन घर में ही बहुत प्यारे और सरल तरीके से बाल गोपाल की पूजा की जा सकती है। आइए जानते हैं इसकी प्रामाणिक पूजा विधि:

  • पवित्र स्नान और संकल्प: 4 सितंबर की सुबह, सुबह जल्दी उठकर पवित्र स्नान करें। सूर्य नारायण को जल अर्पित करने के बाद हाथ में जल और अक्षत लेकर कान्हा के जन्मोत्सव का व्रत रखने का संकल्प लें। अपने घर के मंदिर को सुंदर फूलों और मोरपंखों से सजाएं।
  • भजन और कीर्तन: दोपहर से शाम तक, दिनभर निराहार या फलाहारी रहकर भगवान श्री कृष्ण के मंत्रों “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” या हरे कृष्ण महामंत्र का कीर्तन करें। शाम के समय कान्हा के लिए झूले (पालने) को सजाकर तैयार रखें।
  • पंचामृत अभिषेक और दिव्य श्रृंगार: रात्रि 11:45 बजे, मध्यरात्रि को शंख और घंटियों की मधुर आवाज के साथ लड्डू गोपाल का प्राकट्य कराएं। उन्हें दूध, दही, घी, शहद, चीनी और गंगाजल से (पंचामृत) दिव्य स्नान कराएं। इसके बाद उन्हें पीले रेशमी वस्त्र पहनाएं, मुकुट, चंदन का तिलक और बांसुरी अर्पित करें।
  • महाभोग और पालना झुलाना: रात 12:15 बजे, कान्हा को उनका सबसे प्रिय भोग—ताजा माखन-मिश्री, धनिए की पंजीरी, मखाने की खीर और तुलसी दल अर्पित करें। उन्हें प्यार से पालने में झुलाएं, कपूर से महाआरती करें और फिर प्रसाद ग्रहण कर अपना व्रत खोलें।

व्रत और उत्सव के जरूरी नियम (Rules)

इस व्रत का पूरा पुण्य फल प्राप्त करने के लिए कुछ जरूरी नियमों का पालन करना अनिवार्य है:

  • तुलसी दल का नियम: कान्हा की पूजा में तुलसी का पत्ता बेहद जरूरी है। लेकिन अष्टमी तिथि के दिन तुलसी तोड़ना वर्जित है, इसलिए एक दिन पहले ही तुलसी के पत्ते तोड़कर रख लें।
  • फलाहार का पालन: इस व्रत में अनाज का सेवन वर्जित होता है। आप दिनभर में दूध, फल, मखाने या कुट्टू के आटे से बनी फलाहारी चीजों का सेवन कर सकते हैं।
  • गौ सेवा: श्री कृष्ण को गायों से बहुत प्रेम था। इसलिए इस दिन किसी भी गाय को सताना नहीं चाहिए, बल्कि उन्हें हरा चारा या गुड़-रोटी खिलानी चाहिए।

अष्टमी रोहिणी व्रत को करने के लाभ (Benefits)

माताएं और श्रद्धालु जब इस पावन दिन पर व्रत रखते हैं, तो उन्हें निम्नलिखित लाभ मिलते हैं:

  • संतान सुख और तरक्की: जिन दंपत्तियों को संतान प्राप्ति में बाधा आ रही है, उन्हें बाल गोपाल की कृपा से उत्तम संतान की प्राप्ति होती है, साथ ही बच्चों का करियर उज्ज्वल होता है।
  • मानसिक तनाव से मुक्ति: रोहिणी नक्षत्र के प्रभाव से चंद्रमा मजबूत होता है, जिससे चिंताएं दूर होती हैं और मन में सकारात्मक विचार आते हैं।
  • सुख-समृद्धि का वास: घर में कभी अन्न और धन की कमी नहीं होती। माँ लक्ष्मी की कृपा से व्यापार और नौकरी में नए मार्ग खुलते हैं।

क्या करें और क्या न करें (Do's and Dont's)

इस पावन व्रत के दौरान अनजाने में भी कोई गलती न हो, इसलिए इन बातों का विशेष ध्यान रखें:

क्या करें:

  • घर के मुख्य द्वार से लेकर मंदिर तक चावल के आटे के घोल से छोटे कान्हा के नन्हे-नन्हे कदम (पगचिह्न) बनाएं, यह बेहद शुभ माना जाता है।
  • रात को 12 बजे खीरे की डंठल को सिक्के से काटकर कान्हा का प्रतीकात्मक जन्म (नाल छेदन) जरूर कराएं।
  • जितना हो सके शांत रहें और घर में भक्तिमय वातावरण बनाकर रखें।

क्या न करें:

  • तामसिक भोजन का निषेध: घर में भूलकर भी लहसुन, प्याज, मांस या मदिरा जैसी चीजों का प्रयोग न होने दें।
  • पेड़-पौधों को न तोड़ें: श्री कृष्ण को प्रकृति से अगाध प्रेम था, इसलिए इस दिन पेड़ों को काटना या नुकसान पहुंचाना अशुभ माना जाता है।
  • किसी का अपमान न करें: अपनी वाणी पर संयम रखें, किसी गरीब या लाचार व्यक्ति को दरवाजे से खाली हाथ न लौटाएं।

अष्टमी रोहिणी की पावन पौराणिक कथा (Story)

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, द्वापर युग में जब मथुरा का राजा कंस अपने अत्याचारों से पूरी धरती को त्रस्त कर चुका था, तब धरती माता ने गाय का रूप धारण कर भगवान विष्णु से रक्षा की गुहार लगाई। प्रभु ने वचन दिया कि वे देवकी के गर्भ से आठवीं संतान के रूप में जन्म लेकर कंस का अंत करेंगे। कंस ने देवकी और उनके पति वासुदेव को जेल में डाल दिया और उनकी सात संतानों को मार डाला। जब आठवीं संतान के जन्म का समय आया, तो वह भाद्रपद मास की अष्टमी तिथि थी और आकाश में रोहिणी नक्षत्र का उदय हुआ था। जैसे ही मध्यरात्रि को प्रभु का प्राकट्य हुआ, जेल के सारे पहरेदार सो गए, बेड़ियां टूट गईं और दरवाजे अपने आप खुल गए। वासुदेव जी उफनती हुई यमुना नदी को पार करके कन्हा को गोकुल में नंदबाबा के घर छोड़ आए। बाद में इसी दिव्य बालक ने कंस का वध कर सबको भयमुक्त किया और धर्म का परचम लहराया।

निष्कर्ष (Conclusion)

4 सितंबर को आने वाला यह अष्टमी रोहिणी (Ashtami Rohini 2026) का पर्व हमारे जीवन में नई खुशियां और भक्ति का सवेरा लेकर आ रहा है। यह महासंयोग हमें याद दिलाता है कि जब हमारे जीवन में अंधेरा बहुत गहरा हो जाता है, तो ईश्वर किसी न किसी रूप में हमारे दुखों को हरने जरूर आते हैं। आइए, इस साल पूरी श्रद्धा से कन्हा का स्वागत करें, अपने घरों को गोकुल की तरह सजाएं और बाल गोपाल से सुख, समृद्धि और आरोग्यता का वरदान मांगें। हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैया लाल की!

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)


  1. साल 2026 में अष्टमी रोहिणी का व्रत कब है?
    साल 2026 में अष्टमी रोहिणी का पावन व्रत 4 सितंबर, शुक्रवार को पूरे देश में श्रद्धापूर्वक मनाया जाएगा।

  1. अष्टमी रोहिणी 2026 (Ashtami Rohini 2026) और सामान्य जन्माष्टमी में क्या अंतर है?
    जब जन्माष्टमी के दिन रोहिणी नक्षत्र का संयोग भी बन जाता है, तो उसे अष्टमी रोहिणी कहा जाता है। यह संयोग बहुत दुर्लभ और पुण्यदायी माना जाता है।

  1. इस दिन कान्हा को मुख्य रूप से किस चीज का भोग लगाया जाता है?
    इस दिन लड्डू गोपाल को माखन-मिश्री, धनिए की पंजीरी, मखाने की खीर, पंचामृत और तुलसी दल का भोग लगाया जाता है।

  1. अष्टमी रोहिणी 2026 (Ashtami Rohini 2026) व्रत का पारण कब करना चाहिए?
    इस व्रत का पारण अगले दिन सुबह सूर्योदय के बाद और नवमी तिथि के आगमन पर किया जाता है। साल 2026 में 5 सितंबर की सुबह व्रत का पारण करना शुभ रहेगा।

  1. क्या दक्षिण भारत में भी यह त्योहार इसी दिन मनाया जाएगा?
    हाँ, साल 2026 में नक्षत्र और तिथि की गणना के अनुसार दक्षिण भारत और उत्तर भारत दोनों ही जगहों पर यह पावन पर्व 4 सितंबर को ही मनाया जा रहा है।
Author: Neha Jain – Cultural & Festival Content Writer

Neha Jain is a festival writer with 7+ years’ experience explaining Indian rituals, traditions, and their cultural meaning, making complex customs accessible and engaging for today’s modern readers.