जब-जब हम किसी गहरी मुसीबत में फंसते हैं और चारों तरफ निराशा का अंधेरा छा जाता है, तब हमारी जुबान पर सिर्फ एक ही नाम आता है—"माँ"। माँ का दिल इतना विशाल और करुणामयी होता है कि वह अपनी संतान को कभी भी संकटों के भंवर में अकेला नहीं छोड़ती। सनातन संस्कृति में आदिशक्ति माँ दुर्गा का एक ऐसा ही ममतामयी और जागृत स्वरूप है, जिसे हम माँ विंध्यवासिनी के नाम से पूजते हैं। विंध्य पर्वत पर साक्षात निवास करने वाली जगत जननी माँ विंध्यवासिनी की जयंती इस साल 4 सितंबर 2026 को पूरे देश में बेहद भावुक और भक्तिमय तरीके से मनाई जाएगी।
विंध्यवासिनी जयंती 2026 (Vindhyavasini Jayanti 2026) का दिन केवल एक पर्व नहीं है, बल्कि यह माँ के प्रति अपनी कृतज्ञता और अटूट विश्वास को प्रकट करने का दिव्य अवसर है। विंध्याचल धाम में जहां त्रिकोण यंत्र पर मां साक्षात विराजमान हैं, वहां इस दिन का उत्सव देखने लायक होता है। भक्तों के कंठ से निकलने वाले 'जय माता दी' के जयकारे और मां की प्यारी मूरत को देखकर आंखों से बहने वाले आंसू भक्ति की पराकाष्ठा को बयां करते हैं। आइए इस पावन लेख के जरिए जानते हैं कि इस साल इस पावन व्रत का शुभ मुहूर्त क्या है और घर पर ही मां भवानी को रिझाने का सरल तरीका क्या है।
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सरल और सहज शब्दों में कहें तो भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को माँ विंध्यवासिनी के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब द्वापर युग में मथुरा की जेल में भगवान श्री कृष्ण का जन्म हुआ था, ठीक उसी समय गोकुल में नंदबाबा के घर महामाया आदिशक्ति ने जन्म लिया था। वासुदेव जी ने जब कन्हा को बचाने के लिए दोनों बच्चों की अदला-बदली की, तो कंस ने इस कन्या को मारना चाहा। कंस के हाथों से छूटकर जो देवी आकाश में विलीन हो गईं और बाद में विंध्य पर्वत पर जाकर प्रतिष्ठित हुईं, वही माँ विंध्यवासिनी हैं। इस विशेष दिन पर श्रद्धालु मां का व्रत रखते हैं और उनकी आराधना करते हैं।
साल में विंध्यवासिनी जयंती 2026 (Vindhyavasini Jayanti 2026) का महापर्व 4 सितंबर, शुक्रवार को मनाया जाएगा। इस वर्ष कृष्ण जन्माष्टमी और माँ विंध्यवासिनी जयंती एक ही दिन पड़ने से यह संयोग बेहद दुर्लभ और महापुण्यदायी हो गया है।
पंचांग गणना के अनुसार पूजा के मुख्य मुहूर्त इस प्रकार हैं:
विंध्यवासिनी जयंती व्रत तारीख: 4 सितंबर 2026, दिन शुक्रवारसनातन परंपरा में विंध्यवासिनी जयंती 2026 (Vindhyavasini Jayanti 2026) का बहुत बड़ा महत्व है। शास्त्रों में विंध्याचल क्षेत्र को साक्षात आदिशक्ति का निवास स्थान माना गया है। मान्यता है कि संसार के अन्य शक्तिपीठों पर देवी के शरीर के अंग गिरे थे, लेकिन विंध्याचल ही वह एकमात्र पावन स्थल है जहाँ माँ ने संपूर्ण रूप से साक्षात अवतार लिया था। इस पावन दिन पर व्रत रखने से भक्तों को सभी प्रकार के लौकिक और पारलौकिक सुखों की प्राप्ति होती है। माँ विंध्यवासिनी अपने बच्चों के जीवन से हर तरह की आर्थिक तंगी, मानसिक तनाव और घरेलू कलह को जड़ से मिटा देती हैं।

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यदि आप विंध्याचल धाम नहीं जा पा रहे हैं, तो अपने घर के मंदिर में ही पूरी श्रद्धा के साथ मां की आराधना कर सकते हैं। आइए जानते हैं माँ की दिव्य पूजा विधि:
पवित्र स्नान और संकल्प:4 सितंबर की सुबह।
सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ-सुथरे वस्त्र धारण करें। पूजा घर की सफाई करें और मां के सामने हाथ में जल लेकर अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए व्रत का संकल्प लें।
मां की स्थापना और श्रृंगार:सुबह 06:30 बजे।
एक लकड़ी की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं और उस पर माँ विंध्यवासिनी की तस्वीर या मूर्ति स्थापित करें। मां को गंगाजल के छींटे देकर पवित्र करें। इसके बाद उन्हें रोली, कुमकुम, अक्षत और चंदन का तिलक लगाएं। माँ को लाल चुनरी, नारियल और श्रृंगार की सामग्री अर्पित करें।
पुष्प और सुगंधित अर्पण:सुबह 07:15 बजे.
माँ भवानी को लाल रंग के फूल, विशेषकर गुलाब या गुड़हल के फूल चढ़ाएं। कपूर और गाय के घी का दीपक प्रज्वलित करें और सुगंधित धूप जलाएं।
भोग, मंत्र और महाआरती:सुबह 08:00 बजे.
मां को हलवा-पूरी, काले चने, बताशे और ऋतु फल का भोग लगाएं। इसके बाद “जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी” मंत्र या माँ विंध्यवासिनी के भजनों का पाठ करें। अंत में पूरी श्रद्धा से मां की आरती गाएं और प्रसाद वितरित करें।
इस पावन व्रत का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए इन नियमों का पालन अवश्य करें:
क्या करें और क्या न करें
इस पावन व्रत के दौरान किसी भी प्रकार की त्रुटि से बचने के लिए इन बातों का विशेष ध्यान रखें:
क्या करें:
क्या न करें:
पौराणिक कथा के अनुसार, द्वापर युग में जब कंस के पाप और अत्याचार अपनी चरम सीमा पर पहुंच गए थे, तब भगवान विष्णु ने कृष्ण के रूप में देवकी के गर्भ से जन्म लिया। कंस को यह श्राप था कि देवकी की आठवीं संतान उसका वध करेगी। कंस ने देवकी की सात संतानों को पहले ही मार दिया था। आठवीं संतान के रूप में जब कृष्ण का जन्म हुआ, तब योगमाया के प्रभाव से वासुदेव जी कन्हा को सुरक्षित गोकुल में नंदबाबा के घर छोड़ आए।
नंदबाबा के घर यशोदा माता के गर्भ से साक्षात महामाया आदिशक्ति ने एक कन्या के रूप में जन्म लिया था। वासुदेव जी उस कन्या को मथुरा के कारागार में ले आए। जब कंस को पता चला कि आठवीं संतान का जन्म हो चुका है, तो वह क्रूरता से जेल में पहुंचा। उसने देवकी के हाथों से उस नवजात कन्या को छीन लिया और जैसे ही उसने कन्या को पत्थर पर पटकना चाहा, वह कन्या कंस के हाथों से छूटकर अचानक आसमान में उड़ गई।
आकाश में उस कन्या ने अष्टभुजाधारी साक्षात देवी का रूप धारण कर लिया और कड़कती आवाज में कंस से कहा—"हे पापी कंस! मुझे मारने से तुझे कुछ नहीं मिलेगा। तुझे मारने वाला तो गोकुल में जन्म ले चुका है और सुरक्षित है।” यह कहकर देवी अंतर्ध्यान हो गईं और उन्होंने दुष्टों का संहार करने तथा अपने भक्तों का कल्याण करने के लिए विंध्य पर्वत को अपना निवास स्थान चुना। विंध्य पर्वत पर वास करने के कारण ही वे पूरी सृष्टि में माँ विंध्यवासिनी के नाम से विख्यात हुईं।
4 सितंबर को आने वाली यह विंध्यवासिनी जयंती 2026 (Vindhyavasini Jayanti 2026) हम सभी के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का वरदान लेकर आ रही है। मां का विंध्य स्वरूप हमें यह याद दिलाता है कि भले ही जीवन में मुश्किलें कंस की तरह कितनी भी बड़ी क्यों न दिखें, लेकिन अगर हमारा विश्वास अटूट है, तो मां हमारी रक्षा के लिए हमेशा तत्पर रहती हैं। आइए, इस पावन अवसर पर अपने घरों को भक्ति के रंग में सराबोर करें और मां विंध्यवासिनी के चरणों में अपना सर्वस्व अर्पित कर उनका आशीर्वाद मांगें। प्रेम से बोलिए—सच्चे दरबार की जय!
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Neha Jain is a festival writer with 7+ years’ experience explaining Indian rituals, traditions, and their cultural meaning, making complex customs accessible and engaging for today’s modern readers.