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June 12, 2026 Blog

हल षष्ठी 2026 : संतान की लंबी उम्र के लिए व्रत कब है? जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और कथा

BY : Neha Jain – Cultural & Festival Content Writer

हल षष्ठी 2026 की पावन महिमा: संतान के प्रति माँ का असीम स्नेह

माँ का प्यार अपनी संतान के लिए सबसे सच्चा और अनमोल होता है। बच्चे की मुस्कान माँ को खुशी देती है, और उनके आंसू माँ के दिल को दुखी कर देते हैं। माँ अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छी सेहत और खुशहाली के लिए कई व्रत रखती हैं। इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण व्रत है हल षष्ठी, जिसे ललही छठ, तिनछठी या हरछठ के नाम से भी जाना जाता है।

साल 2026 में यह पर्व 2 सितंबर को मनाया जाएगा। यह त्योहार सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह एक माँ के अटूट विश्वास और तपस्या की कहानी है। इस दिन माताएं अपनी संतान की रक्षा के लिए कठिन नियमों का पालन करती हैं और अन्न का एक दाना भी ग्रहण नहीं करतीं।

आइए जानते हैं कि यह व्रत कब है, इसकी सही पूजा विधि क्या है और इसके पीछे की पौराणिक कहानी क्या है।

हल षष्ठी व्रत क्या है?

यह व्रत भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है, जो भगवान श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम जी का जन्मदिन है। बलराम जी का मुख्य शस्त्र 'हल' और 'मूसल' है, इसी कारण उनके जन्मोत्सव को हल षष्ठी या हरछठ के रूप में मनाया जाता है। यह व्रत माताएं अपनी संतान की दीर्घायु और समृद्धि के लिए रखती हैं।

हल षष्ठी 2026 तिथि और शुभ मुहूर्त

साल 2026 में हल षष्ठी का व्रत 2 सितंबर, बुधवार को रखा जाएगा। इस दिन संतान के कल्याण के लिए पूजा करना बहुत फलदायी माना गया है।

पूजा का सबसे अच्छा समय: 2 सितंबर 2026 को सुबह 06:03 AM से सुबह 09:15 AM तक।

हल षष्ठी व्रत का धार्मिक महत्व

इस व्रत का बहुत बड़ा धार्मिक महत्व है। बलराम जी को शेषनाग का अवतार माना जाता है, जो पूरी धरती का भार अपने कंधों पर उठाए हुए हैं। इस दिन उनकी पूजा करने से संतान को शक्ति, बुद्धि और लंबी आयु का वरदान मिलता है। इसके अलावा, खेती-किसानी से जुड़े परिवारों के लिए भी इस पर्व का विशेष महत्व है क्योंकि हल को अन्नदाता का प्रतीक माना जाता है।

हल षष्ठी की पूजा विधि

यह व्रत पारंपरिक और प्राकृतिक चीजों का उपयोग करके किया जाता है। आइए जानते हैं इसकी चरणबद्ध पूजा विधि:

  • स्नान और संकल्प: सुबह 05:30 बजे स्नान करें और साफ-सुथरे कपड़े पहनें। इसके बाद हाथ में जल लेकर अपनी संतान की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए व्रत का संकल्प लें।
  • झरबेरी की झाड़ और महुआ की स्थापना: घर के आंगन या मंदिर में गोबर से लीपकर एक छोटा सा तालाब बनाएं। इसमें पानी भरें और किनारे पर झरबेरी की झाड़ी, पलाश और महुआ की शाखाएं गाड़कर 'हरछठ' की स्थापना करें।
  • पूजन और श्रृंगार: स्थापित हरछठ देवी और बलराम जी को हल्दी, रोली, चंदन और अक्षत का तिलक लगाएं। इसके बाद उन्हें महुआ के पत्ते, सात प्रकार के भुने हुए अनाज और पसही के चावल अर्पित करें।
  • भोग और आरती: भैंस के दूध, दही और घी से बने पंचामृत का भोग लगाएं। ध्यान रहे कि इस पूजा में गाय के किसी भी उत्पाद का उपयोग वर्जित है। अंत में धूप-दीप जलाकर व्रत की कथा सुनें और आरती करें।

हल षष्ठी व्रत के नियम

यह व्रत अपनी कठोरता के लिए जाना जाता है, इसलिए इसके नियमों का पालन बहुत सावधानी से करना चाहिए:

  •  हल से जुते अनाज का निषेध: इस दिन हल से जोती हुई किसी भी खाद्य सामग्री का सेवन नहीं किया जाता है।
  •  भैंस के दूध का प्रयोग: इस व्रत में गाय के दूध, दही या घी का इस्तेमाल पूरी तरह वर्जित है।
  •  सब्जियों का नियम: इस दिन केवल वही सब्जियां खाई जाती हैं जो बिना हल चलाए स्वतः उगती हैं।

इस पावन व्रत को करने के लाभ

माताएं जब इस कठिन तप को पूरा करती हैं, तो उन्हें इसके कई दिव्य लाभ प्राप्त होते हैं:

  • संतान की लंबी आयु: पौराणिक काल से ही यह मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से संतान को दीर्घायु और निरोगी जीवन मिलता है।
  • संकटों से रक्षा: बच्चे के जीवन में आने वाली हर छोटी-बड़ी मुसीबत या दुर्घटना का भय समाप्त हो जाता है।
  • घर में समृद्धि: बलराम जी और हरछठ माता की कृपा से परिवार में कभी अन्न और धन की कमी नहीं होती, घर खुशियों से चहक उठता है।

क्या करें और क्या न करें

व्रत की पवित्रता बनाए रखने के लिए इन बातों का विशेष ध्यान रखें:

  •  पूजा के बाद अपनी संतान को तिलक लगाएं और महुआ का प्रसाद उनके सिर पर रखकर आशीर्वाद दें।
  •  मिट्टी के बर्तनों में सात अनाज भरकर पूजा स्थल पर रखें।
  •  दिनभर मन ही मन ईश्वर का स्मरण करें और सात्विक विचार बनाए रखें।
  •  भूलकर भी गाय के दूध का सेवन न करें: इस दिन गाय का दूध या घी छूना भी वर्जित माना गया है।
  •  हल से जुती जमीन पर पैर न रखें: यदि संभव हो, तो इस दिन खेतों में जाने से बचें जहाँ हल चलाया गया हो।
  •  क्रोध और कटु वचन से बचें: माँ को अपनी संतान या किसी भी अन्य व्यक्ति पर गुस्सा नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह व्रत मानसिक शांति और त्याग का  प्रतीक है।

हल षष्ठी की पौराणिक व्रत कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, एक ग्वालिन थी जो गर्भवती थी। उसका प्रसव काल बिल्कुल निकट था, लेकिन वह दूध-दही बेचने के लिए व्याकुल थी। उसने सोचा कि यदि वह घर पर रुक गई तो उसका दूध खराब हो जाएगा। इसलिए वह दूध बेचने निकल पड़ी। रास्ते में ही एक झरबेरी की झाड़ी के पास उसे प्रसव पीड़ा हुई और उसने एक सुंदर बालक को जन्म दिया।

वह बच्चे को वहीं झाड़ी के पास सुलाकर पास के गांव में दूध बेचने चली गई। उस दिन हल षष्ठी का व्रत था। ग्वालिन ने पैसे कमाने के लालच में गांव वालों से झूठ बोल दिया कि यह भैंस का शुद्ध दूध है, जबकि वह गाय और भैंस का मिला हुआ दूध था। दूसरी तरफ, एक किसान खेत में हल चला रहा था। उसके बैल अचानक भड़क गए और हल की नोक सीधे उस झाड़ी में सो रहे बालक के पेट में लग गई, जिससे बच्चे के प्राण पखेरू उड़ गए।

किसान बेहद डर गया और उसने बच्चे के पेट को चीरकर महुआ के पत्तों से ढक दिया। जब ग्वालिन वापस लौटी और उसने अपने बच्चे की यह दशा देखी, तो उसे तुरंत अपनी गलती का अहसास हुआ। उसने रोते हुए स्वीकार किया कि उसने व्रत के दिन झूठ बोलकर गाय का दूध बेचा है। उसने सच्चे मन से हरछठ माता से माफी मांगी और पश्चाताप किया। ग्वालिन की इस सच्ची पुकार और पश्चाताप को देखकर माता प्रसन्न हुईं और उन्होंने उसके मृत बालक को दोबारा जीवित कर दिया।

निष्कर्ष

2 सितंबर 2026 को आने वाला यह हल षष्ठी का व्रत हर माँ के त्याग और उसकी ममता का जीवंत उदाहरण है। आधुनिकता के इस दौर में भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों और इन पावन व्रतों से जुड़े रहना हमें जीवन में धैर्य और अपनों के लिए सर्वस्व न्योछावर करने की सीख देता है। सभी माताओं की तपस्या सफल हो और हर संतान को लंबी उम्र और खुशहाली मिले, इसी मंगल कामना के साथ इस पर्व को मनाएं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल


  1. साल 2026 में हल षष्ठी का व्रत कब है?
    साल 2026 में हल षष्ठी (ललही छठ) का व्रत 2 सितंबर, बुधवार को श्रद्धापूर्वक रखा जाएगा।

  1. हल षष्ठी के व्रत में क्या खाया जाता है?
    इस व्रत में हल से जुता हुआ अनाज नहीं खाया जाता। केवल पसही के चावल और भैंस के दूध या दही का सेवन किया जाता है।

  1. क्या हल षष्ठी व्रत में गाय के दूध का उपयोग कर सकते हैं?
    नहीं, इस व्रत में गाय के दूध, दही, घी या गोबर का उपयोग पूरी तरह वर्जित है। इसकी जगह केवल भैंस के दूध और गोबर का इस्तेमाल किया जाता है।

  1. हल षष्ठी व्रत किसकी याद में या किसके लिए मनाया जाता है?
    यह व्रत भगवान श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम जी के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है, जिन्होंने शस्त्र के रूप में हल को धारण किया था।

  1. क्या यह व्रत केवल पुत्र के लिए रखा जाता है?
    प्राचीन मान्यताओं में इसे पुत्र की लंबी आयु के लिए मुख्य माना गया था, लेकिन आज के समय में माताएं अपनी सभी संतानों (बेटे और बेटी दोनों) की सुरक्षा और दीर्घायु के लिए यह व्रत पूरी श्रद्धा से रखती हैं।
Author: Neha Jain – Cultural & Festival Content Writer

Neha Jain is a festival writer with 7+ years’ experience explaining Indian rituals, traditions, and their cultural meaning, making complex customs accessible and engaging for today’s modern readers.