Desktop Special Offer Mobile Special Offer
February 27, 2026 Blog

Buddha Purnima 2026: जाने बुध पूर्णिमा की तिथि, महत्त्व और अनुष्ठान और रीति रिवाज

BY : Neha Jain – Cultural & Festival Content Writer

Buddha Purnima 2026: बुद्ध पूर्णिमा, जिसे बुद्ध जयंती (Buddha Jayanti) या वेसाक के नाम से भी जाना जाता है, भगवान गौतम बुद्ध के जन्म, ज्ञान प्राप्ति और महापरिनिर्वाण की याद में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण बौद्ध त्योहार है। यह दिन बौद्ध समुदाय के लिए अत्यधिक पवित्र माना जाता है और इसे बड़े हर्षोल्लास के साथ श्रद्धालुओं द्वारा देशभर में मनाया जाता है। केवल भारत ही नहीं, बल्कि श्रीलंका, थाईलैंड, इंडोनेशिया, मलेशिया और अन्य दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में भी यह पर्व श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है।

बुद्ध पूर्णिमा (Buddha Purnima) बौद्ध धर्म का अत्यंत पावन और महत्वपूर्ण पर्व है, जो भगवान बुद्ध की स्मृति में मनाया जाता है। महात्मा बुद्ध को विश्वभर में सत्य की खोज और करुणा के संदेश के लिए याद किया जाता है। यह दिन उनके जीवन, ज्ञान और उपदेशों को श्रद्धा से स्मरण करने का अवसर देता है। बुद्ध पूर्णिमा को कई स्थानों पर वेसाक (वेसक) के नाम से भी जाना जाता है और बौद्ध अनुयायियों के लिए यह सबसे प्रमुख उत्सवों में से एक है। कुछ परंपराओं में इसे सत्य विनायक पूर्णिमा भी कहा जाता है। इस दिन लोग शांति, अहिंसा और सद्भाव का संदेश अपनाने का संकल्प लेते हैं।

बुद्ध पूर्णिमा (Buddha Purnima 2026) का त्योहार हिंदू और बौद्ध चंद्र-पंचांग के अनुसार वैशाख महीने की पूर्णिमा को पड़ता है। संस्कृत में ‘पूर्णिमा’ का अर्थ होता है पूर्ण चंद्रमा, और ‘जयंती’ का अर्थ है जन्मदिन। इसलिए यह दिन केवल गौतम बुद्ध के जन्म का प्रतीक नहीं है, बल्कि उनके जीवन में हुए आध्यात्मिक परिवर्तन और ज्ञान की प्राप्ति का उत्सव भी है।


बुद्ध पूर्णिमा 2026: तिथि और समय (Buddha Purnima 2026: Date and Time)

बुद्ध पूर्णिमा हिंदू वैशाख महीने की पूर्णिमा के दिन पड़ती है, इसलिए यह दिन पूर्व-एशियाई देशों जैसे थाईलैंड, श्रीलंका, जापान, चीन और कोरिया में बड़े उत्साह के साथ वेसाक के नाम से मनाया जाता है। साल 2026 (Buddha Purnima 2026 Date) में यह पर्व शुक्रवार, 1 मई को है। इस वर्ष की पूर्णिमा तिथि 30 अप्रैल 2026 की रात 9:15 बजे से शुरू होकर अगले दिन 1 मई 2026 की रात 10:55 बजे तक रहेगी। इस दौरान श्रद्धालु पूरे दिन ध्यान, प्रार्थना और धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेते हैं, और यह समय बुद्ध की शिक्षाओं पर चिंतन करने और उनके जीवन की याद में समर्पित रहता है।

बुद्ध पूर्णिमा क्या है? (What is Buddha Purnima)

बुद्ध पूर्णिमा 2026 (Buddha Purnima) बौद्ध धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण त्योहार है, जिसे पूरे दक्षिण, दक्षिण-पूर्व और पूर्वी एशिया में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह दिन राजकुमार सिद्धार्थ गौतम के जन्म की याद में मनाया जाता है, जो बाद में गौतम बुद्ध बने और बौद्ध धर्म की स्थापना की। ऐतिहासिक मान्यताओं और पुरातात्विक खोजों के अनुसार, उनका जन्म लगभग 563-483 ईसा पूर्व नेपाल के लुम्बिनी में हुआ था। उनके जन्म स्थल को आज मायादेवी मंदिर और उसके आसपास के उद्यानों के साथ-साथ 249 ईसा पूर्व का अशोक स्तंभ चिन्हित करता है।

बुद्ध पूर्णिमा का समय (Time Of Buddha Purnima) चंद्र और चंद्र-सौर कैलेंडरों के अनुसार बदलता रहता है, इसलिए यह आमतौर पर अप्रैल या मई में पड़ता है, और कभी-कभी लीप वर्ष में जून तक भी जा सकता है। दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में इसे अक्सर वेसाक उत्सव के रूप में मनाया जाता है, जो बुद्ध के जन्म, ज्ञान प्राप्ति और महापरिनिर्वाण का प्रतीक है। तिब्बती और पूर्वी एशियाई परंपराओं में इन तीनों घटनाओं के लिए अलग-अलग दिन तय किए गए हैं।

भारत में बुद्ध पूर्णिमा (Buddha Purnima) की सार्वजनिक छुट्टी की शुरुआत डॉ. बी.आर. अंबेडकर के कार्यकाल में हुई थी। देश के कई हिस्सों में इसे बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है, जैसे सिक्किम, लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश, बोधगया और उत्तरी बंगाल के जिले। महाराष्ट्र में भी यह पर्व खास महत्व रखता है, क्योंकि यहाँ देश की बौद्ध आबादी का बड़ा हिस्सा निवास करता है। इस अवसर पर श्रद्धालु बौद्ध विहारों में इकट्ठा होकर सूत्र पाठ, ध्यान और अनुष्ठान में भाग लेते हैं, जो इस दिन को आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से बेहद खास बनाता है।

Budh Purnima 2026


गौतम बुद्ध के बारे में (About Gautam Buddha)

गौतम बुद्ध का जन्म नेपाल के लुम्बिनी में राजा सुद्धोदन और रानी माया देवी के घर राजकुमार सिद्धार्थ गौतम के रूप में हुआ था। उनके बचपन और पालन-पोषण में सभी विलासिताएँ उपलब्ध कराई गई थीं, ताकि वे दुनिया के दुख-दर्द से दूर रहें। जन्म के समय ही भविष्यवाणी की गई थी कि सिद्धार्थ या तो एक महान सम्राट बनेंगे या फिर आध्यात्मिक मार्ग अपनाकर दुनिया के दुखों को समझने वाले गुरु बनेंगे। इसलिए उन्हें महल की चारदीवारी के भीतर रखा गया और बाहरी दुनिया से दूर रखा गया।

लेकिन 29 वर्ष की आयु में सिद्धार्थ ने महल से बाहर निकलने का निर्णय लिया और अपने रथ से बाहरी दुनिया की यात्रा शुरू की। इन यात्राओं के दौरान उन्होंने बूढ़ा व्यक्ति, बीमार व्यक्ति और शव देखा। यह उनके लिए एक बहुत बड़ा अनुभव था, क्योंकि उन्हें पहले कभी बुढ़ापा, बीमारी और मृत्यु का सामना नहीं करना पड़ा था। इन दृश्यों ने उनके मन में गहरा प्रभाव डाला। यात्रा के अंत में उन्होंने एक भिक्षु को देखा, जो अपने आसपास की मुश्किल परिस्थितियों के बावजूद शांत और संतुष्ट था। इस अनुभव ने सिद्धार्थ को प्रेरित किया कि उन्हें यह जानना है कि लोग इतनी विपत्तियों के बावजूद शांति और संतोष कैसे पा सकते हैं।

इसके बाद उन्होंने महल और अपने पुराने जीवन को छोड़कर घुमंतू तपस्वी बनना चुना। उन्होंने अपने ज्ञान की खोज में अलारा कलामा और उदराका रामपुत्र के अधीन ध्यान और योग का अभ्यास किया और उनके मार्ग में दक्षता हासिल की। हालांकि उन्होंने रहस्यवादी अनुभव की ऊँचाइयाँ देखीं, फिर भी वे संतुष्ट नहीं हुए। उनका लक्ष्य था निर्वाण, यानी दुखों से पूर्ण मुक्ति और सर्वोच्च ज्ञान। अंततः, एक बरगद के वृक्ष के नीचे ध्यान में बैठे और ध्यान और साधना के माध्यम से उन्होंने पूर्ण ज्ञान प्राप्त किया। इस ज्ञान को प्राप्त करने के बाद उन्होंने दूसरों तक इसके संदेश को पहुँचाना शुरू किया और इसी के साथ बौद्ध धर्म की स्थापना हुई, जिसने शांति, करुणा और ज्ञान के मार्ग को दुनिया के सामने रखा।

बुद्ध पूर्णिमा 2026 का उत्सव (Celebration of Buddha Purnima 2026)

बुद्ध पूर्णिमा (Buddha Purnima 2026) के दिन श्रद्धालु अपने-अपने घरों और बौद्ध मंदिरों में बुद्ध प्रतिमाओं की पूजा करते हैं और विशेष प्रार्थना सभाओं में भाग लेते हैं। लोग इस अवसर पर प्रसिद्ध बौद्ध तीर्थ स्थलों की यात्रा करते हैं, धर्मग्रंथों का पाठ करते हैं और ध्यान, सामूहिक प्रार्थना और धार्मिक चर्चाओं में हिस्सा लेकर अपने मन को शांति और स्थिरता प्रदान करते हैं।

इस त्यौहार के अवसर पर, बोधगया स्थित महाबोधि मंदिर को रंग-बिरंगी सजावटों से सजाया जाता है और बोधि वृक्ष के नीचे विशेष प्रार्थनाएँ की जाती हैं, वही स्थान जहां गौतम बुद्ध ने पूर्ण ज्ञान प्राप्त किया था। इसके अलावा, दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेष भी दर्शन के लिए रखे जाते हैं, ताकि श्रद्धालु उनका आशीर्वाद प्राप्त कर सकें। त्यौहार की खुशी को और बढ़ाने के लिए घरों और मंदिरों में चावल और दूध से बनी खीर जैसी मिठाइयाँ भी बनाई जाती हैं, जिसे सभी मिलकर भक्ति और आनंद के साथ खाते हैं।


बुद्ध पूर्णिमा से जुड़े धार्मिक कार्य (Religious activities related to Buddha Purnima) 

मान्यता है कि वैशाख पूर्णिमा (Vaishakh Purnima) के दिन व्रत, दान और पुण्य कर्म करने से विशेष शुभ फल प्राप्त होते हैं। इस दिन किए जाने वाले अनुष्ठान सामान्य पूर्णिमा व्रत की तरह ही माने जाते हैं। बुद्ध पूर्णिमा पर लोग श्रद्धा और नियमपूर्वक निम्न धार्मिक कार्य करते हैं:

  • प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर किसी पवित्र नदी, सरोवर, कुएं या जलाशय में स्नान करना शुभ माना जाता है। स्नान के बाद सूर्य मंत्र का स्मरण करते हुए सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित किया जाता है।
  • इसके बाद व्रत का संकल्प लेकर भगवान विष्णु की विधिपूर्वक पूजा की जाती है।
  • इस दिन धर्मराज के नाम से जल से भरा कलश और भोजन सामग्री का दान करने का विशेष महत्व बताया गया है, जिसे अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है।
  • पांच या सात ब्राह्मणों को तिल और शक्कर का दान करना भी शुभ फलदायी माना जाता है।
  • तिल के तेल का दीपक जलाना और तिल अर्पित करना इस पूर्णिमा (Buddha Purnima) का एक प्रमुख धार्मिक कार्य है।
  • व्रत रखने वाले श्रद्धालु इस दिन एक समय ही भोजन ग्रहण करते हैं और संयम का पालन करते हैं।

इन कार्यों के माध्यम से व्यक्ति शांति, पुण्य और सकारात्मक ऊर्जा की कामना करता है।


बुद्ध पूर्णिमा कैसे मनाई जाती है? (How is Buddha Purnima celebrated)

बुद्ध पूर्णिमा का त्योहार (Buddha Purnima Festival) श्रद्धा, शांति और करुणा का संदेश लिए दुनिया भर में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस दिन बौद्ध मंदिरों और समुदायिक केंद्रों में विशेष समारोह आयोजित होते हैं, जहां लोग व्यक्तिगत रूप से या ऑनलाइन माध्यम से ध्यान, प्रार्थना और धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेते हैं। मंदिरों और घरों को फूलों और रोशनी से सजाया जाता है, जिससे वातावरण सौम्य, शांत और दिव्य अनुभव से भर जाता है। अलग-अलग देशों में इसे मनाने का तरीका अलग है। चीन में लोग पैगोडा जाकर अगरबत्ती, मोमबत्ती और लालटेन जलाते हैं, धर्मग्रंथ सुनते हैं और पारंपरिक नृत्यों में हिस्सा लेते हैं। जापान में इसे हनमत्सुरी यानी पुष्प महोत्सव के रूप में मनाया जाता है, जहां बुद्ध की मूर्तियों को ताजे फूलों से सजाकर पुष्प रस से स्नान कराया जाता है और सड़कों पर रंग-बिरंगी लालटेन से त्योहार की रौनक बढ़ाई जाती है। थाईलैंड में इसे वेसाक कहा जाता है और वहां भक्त मंदिरों में इकट्ठा होकर प्रार्थना करते हैं, भिक्षुओं को दान देते हैं और ध्यान एवं उपदेश सुनते हैं।

इस दिन का असली महत्व बुद्ध की शिक्षाओं पर चिंतन और उन्हें अपने जीवन में उतारने में है। लोग इस अवसर का उपयोग दयालुता और करुणा के छोटे-छोटे कार्यों करने के लिए करते हैं, जैसे किसी अजनबी को मुस्कुराना, जरूरतमंद की मदद करना या समाज सेवा में योगदान देना। कई लोग उपवास रखते हैं, जिसे आत्म-अनुशासन और मानसिक शुद्धि का प्रतीक माना जाता है। भारत में श्रद्धालु देशभर से बोधगया, लुम्बिनी और सारनाथ जैसे पवित्र स्थलों की यात्रा करते हैं, मंदिरों में प्रार्थना करते हैं और दूसरों को शाकाहारी भोजन कराते हैं। इस दिन लोग ध्यान और मनन में समय बिताते हैं, अपने कर्मों और विचारों पर विचार करते हैं और सीखते हैं कि कैसे बुद्ध की शिक्षाओं को दैनिक जीवन में अपनाया जा सकता है। इस तरह बुद्ध पूर्णिमा (Happy Buddha Purnima) केवल एक धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि यह शांति, करुणा और आंतरिक जागरूकता का प्रतीक बनकर हमारे जीवन को मार्गदर्शन देती है।


बुद्ध की महत्वपूर्ण शिक्षाएँ (Important teachings of Buddha)

गौतम बुद्ध की शिक्षाएँ आज भी जीवन को सही दिशा में मार्गदर्शन देने वाली मानी जाती हैं। उनकी सबसे महत्वपूर्ण शिक्षा चार आर्य सत्यों में निहित है, जो बताती हैं कि संसार दुखों से भरा है, इच्छाएँ और लालच दुख का कारण बनती हैं, और इच्छाओं से मुक्ति पाने पर ही दुखों से राहत मिलती है। इसके साथ ही उन्होंने अष्टांगिक मार्ग भी बताया, जिसमें सही दृष्टिकोण, सही संकल्प, सही वाणी, सही आचरण, सही आजीविका, सही प्रयास, सही जागरूकता और सही एकाग्रता शामिल हैं। यह मार्ग व्यक्ति को अपने जीवन और मन को अनुशासित करने, आत्म-विकास करने और अंततः दुखों पर विजय पाने में मदद करता है। (Budh Purnima 2026) 

बुद्ध का मानना था कि हर व्यक्ति स्वयं को बदल सकता है और सही मार्ग अपनाकर परम शांति और सच्चा सुख पा सकता है। उन्होंने यह भी बताया कि हमारे कर्म हमारे जीवन को आकार देते हैं, और इसलिए सभी कार्यों के परिणाम का ध्यान रखना आवश्यक है। यही कारण है कि उन्होंने कर्म के नियम को महत्व दिया, जिससे लोग अपने जीवन में जिम्मेदार और नैतिक तरीके से व्यवहार करने के लिए प्रेरित हों।

बुद्ध ने सामाजिक समानता और व्यावहारिक नैतिकता पर भी जोर दिया और सिखाया कि सभी लोग समान हैं, चाहे जाति, लिंग या किसी अन्य आधार पर कोई भेदभाव न किया जाए। उनकी शिक्षाएँ हमें केवल अपने लिए नहीं, बल्कि सभी जीवित प्राणियों के प्रति दया, करुणा और सहानुभूति रखने की प्रेरणा देती हैं। संक्षेप में, बुद्ध की शिक्षाएँ आत्म-विकास, नैतिक आचरण, सामाजिक समानता और करुणा के मूल सिद्धांतों पर आधारित हैं, जो जीवन को अर्थपूर्ण और संतुलित बनाने में मदद करती हैं।


बुद्ध पूर्णिमा 2026 का महत्व ओर इतिहास (Significance and History of Buddha Purnima 2026)

बुद्ध पूर्णिमा (Buddha Purnima 2026) सिर्फ एक धार्मिक त्योहार नहीं है, बल्कि यह गौतम बुद्ध के जीवन, उनके संदेश और शिक्षाओं की याद दिलाने वाला अवसर है। इस दिन का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह हमें बुद्ध की जीवन यात्रा, उनके ज्ञानोदय और निर्वाण की घटनाओं की याद दिलाता है, जिन्हें बौद्ध धर्म में “तीन बार धन्य” माना जाता है। बुद्ध पूर्णिमा बौद्धों को एक साझा उद्देश्य के लिए एकत्रित करती है और उनके जीवन और शिक्षाओं के मूल संदेश—ज्ञान, अनुशासन, एकाग्रता और करुणा—पर विचार करने का अवसर देती है। यह पर्व न केवल आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि सांस्कृतिक दृष्टि से भी यह लोगों को एकजुट करता है और बुद्ध की शिक्षाओं की सार्वभौमिकता को उजागर करता है, जो आज भी हमारे दैनिक जीवन में प्रासंगिक हैं।

इतिहास में, बुद्ध पूर्णिमा (Buddha Purnima) सदियों से श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाई जाती रही है, लेकिन इसे औपचारिक रूप से मान्यता 1950 में श्रीलंका के कोलंबो में विश्व बौद्ध संघ के पहले सम्मेलन में दी गई। वैशाख मास की पूर्णिमा को इसलिए चुना गया क्योंकि इसी दिन बुद्ध ने निर्वाण प्राप्त किया था। इसके बाद से वैशाख का दिन बौद्ध समुदाय के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बन गया, और इसे दुनिया भर में बुद्ध के जन्म, ज्ञान प्राप्ति और मृत्यु के उत्सव के रूप में मनाया जाने लगा। थेरवाद त्रिपिटक ग्रंथों के अनुसार, गौतम बुद्ध का जन्म लगभग 563 ईसा पूर्व में लुम्बिनी में हुआ था, जो आज नेपाल का हिस्सा है।

बुद्ध धर्म (Budh Purnima ) की लोकप्रियता का एक बड़ा कारण इसकी अहिंसा, सभी जीवों के प्रति सम्मान और महिलाओं की समानता पर आधारित शिक्षाएँ हैं। यह दर्शन देवी-देवताओं की पूजा पर आधारित नहीं है, जिससे यह समावेशी और हर संस्कृति के लोगों के लिए खुला है। समय के साथ बौद्ध धर्म विभिन्न संस्कृतियों में ढल गया और अलग-अलग उप-संप्रदायों का विकास हुआ, लेकिन इसके मूल संदेश—दयालुता, ज्ञान और नैतिक आचरण—विश्वभर के लोगों के जीवन को मार्गदर्शन देते हैं। बुद्ध पूर्णिमा इस संदेश को याद करने, जीवन में लागू करने और अपने समाज में प्रेम और करुणा फैलाने का अवसर है।


निष्कर्ष (Conclusion)

बुद्ध पूर्णिमा (Buddha Purnima) केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं है, बल्कि यह ज्ञान, करुणा और आत्म-जागरूकता का प्रतीक है। इस दिन बौद्ध अनुयायी और अन्य लोग ध्यान, प्रार्थना और दयालुता के कार्यों के माध्यम से अपने जीवन को शांति और नैतिकता की दिशा में मार्गदर्शित करते हैं। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि बुद्ध की शिक्षाएँ आज भी प्रासंगिक हैं और इन्हें अपनाकर हम व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में संतुलन, एकता और सकारात्मकता ला सकते हैं।

Author: Neha Jain – Cultural & Festival Content Writer

Neha Jain is a festival writer with 7+ years’ experience explaining Indian rituals, traditions, and their cultural meaning, making complex customs accessible and engaging for today’s modern readers.