जीवन की राह में जब-जब कठिन परिस्थितियां हमें झकझोरती हैं और मन में असमंजस की स्थिति उत्पन्न होती है, तब हमें एक ऐसे आधार की आवश्यकता होती है जो हमें डिगने न दे। सनातन संस्कृति में भगवान श्री हरि विष्णु का हर अवतार हमें धैर्य, शक्ति और जीवन जीने की राह दिखाता है। पौष मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाया जाने वाला कूर्म द्वादशी 2027 (Kurma Dwadashi 2027) का पावन पर्व भगवान विष्णु के द्वितीय अवतार कूर्म (कछुआ) स्वरूप को समर्पित है। जिस प्रकार कूर्म रूप धारण कर प्रभु ने समुद्र मंथन के समय मंदराचल पर्वत को अपनी पीठ पर धारण किया था, उसी प्रकार यह व्रत हमारे जीवन की सभी डगमगाती परिस्थितियों में स्थिरता और शक्ति प्रदान करता है। आइए जानते हैं कि वर्ष 2027 में कूर्म द्वादशी कब है, इसका शुभ मुहूर्त क्या रहेगा और किस विधि से पूजा करने पर श्री हरि की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
यदि आप भी अपने जीवन में स्थिरता, सुख-समृद्धि और भगवान विष्णु का आशीर्वाद पाना चाहते हैं, तो कूर्म द्वादशी 2027 की तिथि (Kurma Dwadashi 2027 Date) का यह अवसर आपके लिए बेहद शुभ और कल्याणकारी सिद्ध होने वाला है। आइए जानते हैं इस पावन पर्व की सही तिथि, शुभ मुहूर्त, विष्णु पूजा विधि (Vishnu Puja Vidhi) और पौराणिक कथा।
Gauna Devuthani Ekadashi 2026: जानिए सही तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, महत्व और पौराणिक कथा
पौष महीने के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को कूर्म द्वादशी का पर्व (Kurma Dwadashi Festival) के नाम से जाना जाता है। यह दिन भगवान विष्णु के कच्छप यानी कछुआ अवतार की पूजा के लिए अत्यंत पावन माना गया है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, जब देवताओं और असुरों द्वारा समुद्र मंथन किया जा रहा था, तब मंदराचल पर्वत समुद्र में डूबने लगा था। सृष्टि के संतुलन और कल्याण के लिए भगवान विष्णु ने विशालकाय कछुए का रूप धारण कर पर्वत को अपनी पीठ पर संभाला था। इसी पावन तिथि की स्मृति में कूर्म द्वादशी व्रत (Kurma Dwadashi Vrat) रखा जाता है। यह व्रत जीवन में आ रहे भारी से भारी संकट को दूर कर अटूट स्थिरता और सफलता प्रदान करता है।
वर्ष 2027 में कूर्म द्वादशी का यह पावन व्रत 19 जनवरी को मनाया जाएगा। पौष पुत्रदा एकादशी के अगले दिन पड़ने वाली यह द्वादशी तिथि उपासना और दान के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है। कूर्म द्वादशी शुभ मुहूर्त (Kurma Dwadashi Shubh Muhurat) की जानकारी नीचे दी गई है:
कूर्म द्वादशी तिथि (Kurma Dwadashi 2027 Date): 19 जनवरी 2027, मंगलवार
द्वादशी तिथि प्रारम्भ: 18 जनवरी 2027 को देर रात
द्वादशी तिथि समाप्त: 19 जनवरी 2027 को सायंकाल
पूजा का शुभ मुहूर्त (Kurma Dwadashi Puja Muhurat): 19 जनवरी 2027 को प्रातः 07:15 बजे से प्रातः 11:15 बजे तक
(नोट: उदयातिथि के अनुसार 19 जनवरी 2027 को ही कूर्म द्वादशी का पूजन और व्रत विधान किया जाएगा।)
कूर्म द्वादशी का महत्व शास्त्रों में अत्यंत फलदायी बताया गया है। यह पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि हमें सिखाता है कि कठिन से कठिन समय में भी धैर्य और संयम का साथ नहीं छोड़ना चाहिए।
आध्यात्मिक दृष्टि से कछुआ अपनी सभी ज्ञानेंद्रियों को समेटकर सुरक्षा और स्थिरता का प्रतीक बनता है। इस दिन भगवान कूर्म की उपासना करने से व्यक्ति का चंचल मन शांत होता है और एकाग्रता बढ़ती है। मान्यता है कि इस दिन जो भक्त भगवान विष्णु के इस रूप का ध्यान करता है, उसके घर में देवी लक्ष्मी का स्थायी वास होता है, वास्तु दोष दूर होते हैं और संपत्ति व संपत्ति से जुड़े विवाद समाप्त होते हैं।

Guruvayur Ekadashi 2026: जानिए सही तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, महत्व और पौराणिक कथा
कूर्म द्वादशी पर भगवान विष्णु की कृपा पाने के लिए पूरे विधि-विधान से पूजन करना चाहिए। आइए जानते हैं चरण-दर-चरण पूजा विधि:
प्रातः स्नान और संकल्प: सुबह सूर्योदय से पूर्व उठें, घर की सफाई करें और स्नान के जल में थोड़ा गंगाजल व तिल मिलाकर स्नान करें। स्वच्छ वस्त्र पहनकर व्रत का संकल्प लें।
पूजा स्थल की तैयारी: घर के मंदिर में पूर्व दिशा की ओर चौकी पर पीला कपड़ा बिछाएं। उस पर भगवान विष्णु या कूर्म अवतार की मूर्ति अथवा चित्र स्थापित करें। यदि कछुए की धातु या स्फटिक की प्रतिमा हो तो उसे भी जल से स्नान कराकर स्थापित करें।
दीप प्रज्वलन और पंचामृत स्नान: देसी घी का दीपक और धूप जलाएं। प्रतिमा को दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से बने पंचामृत से स्नान कराएं और शुद्ध जल से स्वच्छ करें।
श्रृंगार और अर्पण: प्रभु को पीले फूल, पीला चंदन, अक्षत, रोली और तुलसी पत्र अर्पित करें।
विशेष भोग: माखन-मिश्री, पीली मिठाई, तिल के लड्डू और ऋतुफल का भोग लगाएं। याद रखें कि विष्णु जी की पूजा में तुलसी दल जरूर रखें।
कथा और मंत्र जाप: कूर्म द्वादशी की पावन कथा का पाठ करें। इसके बाद कूर्म मंत्र (Kurma Mantra) 'ॐ कूर्माय नमः' या 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का कम से कम 108 बार जाप करें।
आरती: अंत में कपूर जलाकर आरती करें और सभी में प्रसाद वितरित करें।
एकादशी की रात से ही सात्विक नियमों का पालन करें और ब्रह्मचर्य बनाए रखें।
द्वादशी के दिन फलाहार या निराहार रहकर व्रत का पालन करें।
मन में किसी के प्रति कटु विचार, ईर्ष्या या क्रोध न लाएं।
पूरा दिन भगवान का स्मरण करते हुए व्यतीत करें और संभव हो तो मंदिर जाकर दर्शन करें।
जीवन में स्थिरता: जिस प्रकार कूर्म अवतार ने मंदराचल पर्वत को संभाला, उसी प्रकार यह व्रत व्यापार, नौकरी और परिवार में स्थिरता लाता है।
वास्तु दोष से मुक्ति: घर में धातु का कछुआ रखकर इस दिन पूजा करने से घर के सभी प्रकार के वास्तु दोष मिट जाते हैं।
धन और समृद्धि: माता लक्ष्मी अपने पति भगवान विष्णु के इस रूप से अत्यंत प्रसन्न होती हैं, जिससे घर में धन-धान्य की वृद्धि होती है।
रोग और भय से राहत: गंभीर बीमारियों और शत्रुओं के भय से मुक्ति मिलती है।
क्या करें:
भगवान विष्णु को पीले वस्त्र और पीले फूल अर्पित करें।
किसी जलाशय या नदी के पास जाकर जलचरों (मछलियों और कछुओं) को आटे की गोलियां खिलाएं।
जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र, तिल और जल का दान करें।
क्या न करें:
इस दिन भोजन में चावल या तामसिक पदार्थों (प्याज, लहसुन, मांसाहार) का सेवन न करें।
किसी भी जीव या बेजुबान जानवर को परेशान न करें।
घर में कलह, गाली-गलौज या किसी का अनादर करने से बचें।
तुलसी के पत्तों को द्वादशी के दिन न तोड़ें।
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार महर्षि दुर्वासा के शाप के कारण स्वर्ग लोक श्रीहीन हो गया और सभी देवता अपनी शक्तियां खो बैठे। इस स्थिति का फायदा उठाकर दैत्यों ने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। सभी देवता अपनी व्यथा लेकर भगवान विष्णु की शरण में पहुंचे।
भगवान विष्णु ने देवताओं को दैत्यों के साथ मिलकर समुद्र मंथन करने की सलाह दी, ताकि अमृत की प्राप्ति हो सके। समुद्र मंथन के लिए मंदराचल पर्वत को मथानी और नागराज वासुकि को नेती बनाया गया। परंतु जैसे ही समुद्र मंथन शुरू हुआ, भारी मंदराचल पर्वत का कोई आधार न होने के कारण वह क्षीरसागर में डूबने लगा।
सभी देवता और दैत्य चिंतित हो गए और उन्होंने श्री हरि को पुकारा। तब भगवान विष्णु ने अत्यंत विशाल कछुए (कूर्म) का रूप धारण किया और समुद्र के तल में जाकर मंदराचल पर्वत को अपनी विशाल पीठ पर स्थापित कर लिया। कूर्म देव की कठोर पीठ के आधार पर ही समुद्र मंथन सफलतापूर्वक संपन्न हुआ, जिससे 14 रत्न और अंत में अमृत कलश निकला। देवताओं ने अमृत पान कर अपनी शक्ति पुनः प्राप्त की। भगवान विष्णु के इसी उपकार और संकटमोचन रूप को याद करने के लिए कूर्म द्वादशी का पर्व मनाया जाता है।
कूर्म द्वादशी का यह पावन पर्व हमें सिखाता है कि जब परिस्थितियां विपरीत हों, तो हमें अपने धैर्य और आंतरिक बल को संजोकर रखना चाहिए। वर्ष 2027 में 19 जनवरी को मिलने वाले इस शुभ अवसर पर भगवान विष्णु के कूर्म रूप का ध्यान करें और अपने परिवार की सुख-शांति व समृद्धि के लिए प्रार्थना करें। प्रभु कूर्म की कृपा से आपके जीवन की हर डगमगाती राह आसान हो जाएगी और सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होगा।
Q1: कूर्म द्वादशी 2027 (Kurma Dwadashi 2027) में कब है?
कूर्म द्वादशी का पावन व्रत 19 जनवरी 2027, मंगलवार को मनाया जाएगा।
Q2: कूर्म द्वादशी पर किसकी पूजा की जाती है?
इस दिन भगवान विष्णु के द्वितीय अवतार कूर्म (कछुआ) स्वरूप की विशेष पूजा की जाती है।
Q3: क्या इस दिन घर में कछुआ रखना शुभ होता है?
जी हां, कूर्म द्वादशी के दिन घर के उत्तर या पूर्व दिशा में स्फटिक, तांबे या पीतल का कछुआ स्थापित कर पूजा करना अत्यंत शुभ और समृद्धिदायक माना जाता है।
Q4: कूर्म द्वादशी का मुख्य मंत्र कौन सा है?
इस दिन 'ॐ कूर्माय नमः' और 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जाप करना सर्वोत्तम होता है।
Q5: इस दिन किन वस्तुओं का दान करना चाहिए?
इस दिन तिल, गुड़, पीला कपड़ा, चना दाल, केला और जल का दान करना बहुत पुण्यदायी माना गया है।
Neha Jain is a festival writer with 7+ years’ experience explaining Indian rituals, traditions, and their cultural meaning, making complex customs accessible and engaging for today’s modern readers.