Desktop Special Offer Mobile Special Offer
October 22, 2026 Blog

Makaravilakku 2027: जानें तिथि, दीप ज्योति दर्शन का शुभ समय, पूजा विधि, महत्व और सबरीमाला की कथा

BY : Neha Jain – Cultural & Festival Content Writer

जब घने जंगलों और ऊंची पहाड़ियों के बीच से 'स्वामी शरणम अयप्पा' के जयकारे गूंज उठते हैं, तो भक्त का हृदय भक्ति और आनंद से सराबोर हो उठता है। केरल की पावन भूमि पर स्थित सबरीमाला मंदिर में मनाया जाने वाला मकरविलक्कू 2027 (Makaravilakku 2027) केवल एक त्यौहार नहीं, बल्कि अटूट आस्था, तपस्या और ईश्वर से मिलन का परम पावन क्षण है। मकर संक्रांति की पावन संध्या पर जब पंडलम राजमहल से लाए गए भगवान अयप्पा के पवित्र आभूषणों (थिरुवाभरणम) से बप्पा का श्रृंगार होता है और पोन्नमबलमेदु पहाड़ी पर दिव्य ज्योति चमक उठती है, तो लाखों भक्तों की आंखें छलक उठती हैं। आइए जानते हैं कि वर्ष 2027 में मकरविलक्कू कब मनाया जाएगा और इसका क्या धार्मिक व आध्यात्मिक महत्व है।

यदि आप भी स्वामी अयप्पा का आशीर्वाद पाना चाहते हैं, तो मकरविलक्कू 2027 की तिथि (Makaravilakku 2027 Date) का यह अवसर आपके लिए बेहद शुभ और कल्याणकारी सिद्ध होने वाला है। आइए जानते हैं इस पावन पर्व की सही तिथि, शुभ समय, सबरीमाला पूजा विधि (Sabarimala Puja Vidhi) और पौराणिक कथा।

Gauna Devuthani Ekadashi 2026: जानिए सही तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, महत्व और पौराणिक कथा

मकरविलक्कू क्या है (What is Makaravilakku?)

मकरविलक्कू उत्सव (Makaravilakku Festival) सबरीमाला मंदिर में आयोजित होने वाले 41 दिनों के मकरविलक्कू उत्सव का सबसे महत्वपूर्ण और अंतिम चरण है। यह उत्सव मकर संक्रांति के दिन मनाया जाता है। 'मकर' का अर्थ मकर संक्रांति और 'विलक्कू' का अर्थ दीपक या ज्योति होता है। इस दिन शाम को भगवान अयप्पा को पवित्र स्वर्ण आभूषण पहनाए जाते हैं और महाआरती की जाती है। इसके ठीक बाद मंदिर से दूर पोन्नमबलमेदु पहाड़ी पर एक दिव्य ज्योति प्रज्वलित होती है, जिसे मकरज्योति (Makarajyothi) कहा जाता है। इस दिव्य ज्योति के दर्शन करने के लिए दुनिया भर से लाखों श्रद्धालु सबरीमाला पहुंचते हैं।

मकरविलक्कू 2027: तिथि और शुभ समय (Makaravilakku 2027 Date and Shubh Time)

वर्ष 2027 में मकरविलक्कू का यह पावन पर्व मकर संक्रांति के दिन 15 जनवरी को मनाया जाएगा। मकरविलक्कू शुभ समय (Makaravilakku Shubh Muhurat) की तालिका नीचे दी गई है:

  • मकरविलक्कू तिथि (Makaravilakku 2027 Date): 15 जनवरी 2027, शुक्रवार

  • थिरुवाभरणम (पवित्र आभूषण) शोभायात्रा: 15 जनवरी 2027 को संध्या काल में सबरीमाला आगमन

  • स्वामी अयप्पा दीपारधना (महाआरती) समय: 15 जनवरी 2027 को शाम 06:15 बजे से 06:45 बजे के बीच

  • मकरज्योति दर्शन समय: 15 जनवरी 2027 की संध्या आरती के तुरंत बाद

(नोट: मकर संक्रांति के सूर्य प्रवेश काल के अनुसार 15 जनवरी 2027 को ही सबरीमाला में मकरविलक्कू की पावन पूजा और दिव्य ज्योति दर्शन होंगे।)

मकरविलक्कू का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व (Significance of Makaravilakku)

शास्त्रों और मान्यताओं के अनुसार, स्वामी अयप्पा (Swami Ayyappa) शिव और मोहिनी (भगवान विष्णु का स्वरूप) के पुत्र हैं। उन्होंने इसी दिन महर्षि अगस्त्य और देवों की उपस्थिति में पोन्नमबलमेदु में अपना दिव्य स्वरूप प्रकट किया था।

यह पर्व हमें कठिन तपस्या, समानता और आत्म-समर्पण का पाठ पढ़ाता है। सबरीमाला की यात्रा से पहले भक्त 41 दिनों का कठिन 'मंडलम व्रत' रखते हैं। इस व्रत में अमीर-गरीब, ऊंच-नीच का सारा भेद समाप्त हो जाता है और हर भक्त केवल 'स्वामी' कहलाता है। इस दिन दिव्य ज्योति के दर्शन करने से साधक को जन्म-जन्मांतर के पापों से मुक्ति मिलती है और जीवन में दिव्य शांति का अनुभव होता है।

मकरविलक्कू पूजा और यात्रा की सम्पूर्ण विधि (Makaravilakku Puja Vidhi)

Makaravilakku 2027 festival

Guruvayur Ekadashi 2026: जानिए सही तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, महत्व और पौराणिक कथा

भगवान अयप्पा का आशीर्वाद पाने के लिए भक्त कठिन नियमों और श्रद्धा के साथ पूजा करते हैं। आइए जानते हैं चरण-दर-चरण विधि:

  1. मंडल व्रत का पालन: सबरीमाला जाने से पहले कम से कम 41 दिनों तक तुलसी या रुद्राक्ष की माला धारण करके कड़ा व्रत रखें।

  2. इरुमुडी कट्टू बांधना: सबरीमाला यात्रा के लिए 'इरुमुडी' (दो थैलियों वाला पवित्र थैला) तैयार किया जाता है, जिसमें नारियल के भीतर देसी घी भरकर, चावल और पूजा सामग्री रखी जाती है।

  3. पवित्र स्नान: मंदिर पहुंचने से पहले पावन पम्पा नदी में स्नान करें और भगवान का ध्यान करें।

  4. 18 पवित्र सीढ़ियों का आरोहण: इरुमुडी को सिर पर धारण करके 18 पावन स्वर्ण सीढ़ियों (पतिनेत्ताम पडी) पर चढ़कर सबरीमाला मंदिर में प्रवेश करें।

  5. घी अभिषेकम: भगवान अयप्पा की प्रतिमा पर नारियल से निकाला गया शुद्ध देसी घी अर्पित करें।

  6. संध्या दीपारधना व ज्योति दर्शन: शाम को जब थिरुवाभरणम पहनाकर महाआरती होती है, तब स्वामी शरणम अयप्पा का जाप करें और पोन्नमबलमेदु की ओर देखते हुए दिव्य ज्योति का दर्शन करें।

मकरविलक्कू व्रत के कठोर नियम (Makaravilakku Rules)

  • व्रत की अवधि के दौरान पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना अनिवार्य है।

  • केवल काले, नीले या भगवा रंग के साधारण वस्त्र ही धारण किए जाते हैं।

  • पूर्णतः सात्विक भोजन ग्रहण करें और नंगे पांव ही यात्रा व दिनचर्या पूरी करें।

  • वाणी में संयम रखें और हर व्यक्ति में भगवान अयप्पा का रूप देखते हुए 'स्वामी' कहकर संबोधित करें।

इस पावन व्रत और दर्शन से मिलने वाले लाभ (Benefits of Makaravilakku)

  • आध्यात्मिक जागृति: 41 दिनों की कठोर तपस्या से मन शांत होता है और इच्छाओं पर नियंत्रण पाने में सफलता मिलती है।

  • आरोग्य और सहनशक्ति: नंगे पैर पैदल यात्रा करने और सात्विक आहार लेने से शरीर स्वस्थ और सुदृढ़ बनता है।

  • पापों का क्षय: स्वामी अयप्पा के दर्शन और घी अभिषेकम से सारे पाप और शारीरिक कष्ट मिट जाते हैं।

  • इच्छाओं की पूर्ति: निष्काम भाव से की गई प्रार्थना से जीवन के सभी रुके हुए काम पूरे होते हैं।

क्या करें और क्या न करें (Dos and Don'ts)

क्या करें:

  • पूरी यात्रा के दौरान निरंतर 'स्वामी शरणम अयप्पा' का जाप करते रहें।

  • साथी श्रद्धालुओं की निस्वार्थ सेवा करें और बड़ों का सम्मान करें।

  • मंदिर परिसर और पम्पा नदी की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें।

क्या न करें:

  • व्रत या यात्रा के समय किसी भी प्रकार के नशीले पदार्थों या मांसाहार का सेवन न करें।

  • क्रोध, अहंकार, हिंसा या किसी का अनादर करने से बचें।

  • बिना नियम और बिना इरुमुडी धारण किए 18 पवित्र सीढ़ियों पर कदम न रखें।

सबरीमाला और भगवान अयप्पा की पावन कथा (Lord Ayyappa Story)

पौराणिक कथा के अनुसार, महिषासुर की बहन महिषी ने ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त कर लिया था कि उसकी मृत्यु केवल शिव और विष्णु के पुत्र द्वारा ही हो सकती है। इस वरदान के कारण महिषी ने तीनों लोकों में अत्याचार मचा दिया। तब भगवान शिव और भगवान विष्णु (मोहिनी रूप) के मिलन से भगवान अयप्पा (मणिकंदन) का जन्म हुआ।

पंडलम के राजा राजशेखरा ने मणिकंदन को अपने पुत्र की तरह पाला। जब मणिकंदन केवल 12 वर्ष के थे, तब राजा की रानी ने जलन के कारण बीमारी का नाटक किया और मणिकंदन को जंगल से शेरनी का दूध लाने भेजा। रानी को लगा था कि जंगली जानवर बच्चे को मार डालेंगे। परंतु मणिकंदन स्वयं भगवान थे। वे जंगल गए, महिषी का वध किया और स्वयं कई शेरनियों पर सवार होकर राजमहल लौट आए।

यह देखकर राजा को अहसास हुआ कि मणिकंदन कोई साधारण बालक नहीं हैं। मणिकंदन ने राजा से कहा कि उनका अवतार कार्य पूरा हो चुका है। उन्होंने राजा को सबरीमाला में एक मंदिर बनाने का निर्देश दिया। भगवान अयप्पा ने राजा से वादा किया कि हर साल मकर संक्रांति के दिन वे अपने भक्तों को दर्शन देने के लिए ज्योति रूप में प्रकट होंगे।

निष्कर्ष (Conclusion)

मकरविलक्कू केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मा और परमात्मा के मिलन की एक अद्भुत यात्रा है। वर्ष 2027 में 15 जनवरी को मनाया जाने वाला मकरविलक्कू 2027 (Makaravilakku 2027) का यह पावन अवसर हमें सिखाता है कि सच्ची भक्ति में कोई भेदभाव नहीं होता। आइए, इस दिन हम सब अपने घरों में दीया जलाएं, भगवान अयप्पा का ध्यान करें और 'स्वामी शरणम अयप्पा' के साथ अपने जीवन को भक्ति और आनंद से भर लें।

Papankusha Ekadashi 2026: 22 अक्टूबर को है पापांकुशा एकादशी, जानें शुभ मुहूर्त, व्रत विधि और पापों से मुक्ति की कथा

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q1: मकरविलक्कू 2027 (Makaravilakku 2027) में कब है?

मकरविलक्कू का मुख्य पर्व 15 जनवरी 2027, शुक्रवार को मकर संक्रांति के दिन मनाया जाएगा।

Q2: सबरीमाला की 18 सीढ़ियों का क्या महत्व है?

ये 18 सीढ़ियां मनुष्य की 5 ज्ञानेंद्रियों, 8 राग-द्वेष, 3 गुणों और अज्ञान व विद्या का प्रतीक मानी जाती हैं, जिन्हें पार करके ही ईश्वर की प्राप्ति होती है।

Q3: मकरज्योति कहाँ दिखाई देती है?

मकरज्योति सबरीमाला मंदिर से लगभग 4 किलोमीटर दूर पोन्नमबलमेदु की पहाड़ी पर संध्या आरती के बाद दिखाई देती है।

Q4: सबरीमाला यात्रा के लिए कौन सा मंत्र बोला जाता है?

यात्रा के दौरान भक्त निरंतर 'स्वामी शरणम अयप्पा' (Swami Sharanam Ayyappa) मंत्र का जाप करते हैं।

Q5: थिरुवाभरणम क्या होता है?

थिरुवाभरणम भगवान अयप्पा के वे पवित्र सोने के आभूषण हैं, जिन्हें पंडलम राजमहल से एक बक्से में रखकर तीन दिनों की पैदल यात्रा के बाद मकर संक्रांति की शाम सबरीमाला लाया जाता है।

Author: Neha Jain – Cultural & Festival Content Writer

Neha Jain is a festival writer with 7+ years’ experience explaining Indian rituals, traditions, and their cultural meaning, making complex customs accessible and engaging for today’s modern readers.