नटराज: कहानी नृत्य करते शिव की

शिवजी के स्वरूप नटराज को सबसे उत्तम नर्तकों में से एक माना जाता है. भगवान शिव को लेकर कई पौराणिक कथाएं हैं जिनमें उनके नटराज स्वजरूप का भी वर्णन मिलता है. चलिए जानते हैं नृत्य करते शिव जी लीलाओं के बारे में. 

भगवान शिव को त्रि‍देवों में सबसे शक्तिशाली और महत्वपूर्ण माना जाता है. पौराणिक धर्म ग्रंथों की मान्यताओं के कारण भगवान शिव के अर्धनारीश्वर रूप से लेकर हरिहर रूप भारत में अपनी अलग महत्ता स्थापित कर चुके हैं. यूं भी भगवान शिव के विविध रूप हमेशा से ही जिज्ञासा का विषय रहे हैं. इनमें से एक नटराज स्वरूप है. 

शिवजी का सर्वोत्तम नर्तक स्वरूप नटराज उनके संपूर्ण काल और स्थान को दर्शाता है. शिव का तांडव नृत्य प्रसिद्ध है ऐसे में नटराज स्वरूप से ये मान्यता और प्रबल हो जाती है कि ब्रह्माण्ड में स्थित जीवन, उनकी गतिविधियां, कंपन और सभी कुछ भगवान शिव में ही निहित है. 

नटराज दो शब्दों से मिलकर बना है नट और राज. नट का अर्थ है कला. नटराज शब्द में शिव की संपूर्ण कलाओं का रहस्य छुपा हुआ है. 

नटराज मूर्ति की महत्ता‍-

मशहूर नटराज मूर्ति को देवता की नाचती हुई मूर्ति के रूप में पूजा जाता है जो नृत्य की संपूर्ण कलाओं में पारंगत हैं. नृत्य करने वाले सभी कलाकार और शिष्य नृत्य सीखने और नृत्य करने से पहले नटराज की मूर्ति को पूजते हैं और उनकी मूर्ति को सामने रखकर ही नृत्य करते हैं. 

शिवजी के प्रसिद्ध स्वरूप नटराज की चार भुजाएं हैं और वे चारों ओर से अग्नि से घिरे नृत्य करते प्रतीत होते हैं. नटराज मूर्ति में चार भुजाओं के अलावा भगवान शिव का एक पांव बौने के ऊपर और दूसरा पांव नृत्य मुद्रा में दिखाई देता है. नटराज मूर्ति में ऊपर की तरफ उठे हुए दाएं हाथ में एक डमरू हैं. वहीं ऊपर की तरफ उठे हुए बाएं हाथ में अग्नि है. दूसरे दाएं हाथ में आशीर्वाद देने की मुद्रा में है. दूसरा बाएं हाथ उस पैर की तरफ मुड़ा है तो नृत्य मुद्रा में है. 

नटराज के हाथ में डमरू यानि सृष्टि का सृजन, अग्नि यानि सृष्टि का विनाश, आशीर्वाद यानि बुराईयों से रक्षा और उठा हुआ पैर यानि मोक्ष मार्ग वहीं बाएं हाथ मोक्ष मार्ग का रास्ता सुझा रहा है. उनके एक पांव के नीचे बौना यानि राक्षस है जो कि अज्ञानता की तरफ भटक गया और उसका नाश हो गया. नटराज की मूर्ति इस ओर इंगित करती है कि मोक्ष का मार्ग भगवान शिव के चरणों में है. मूर्ति के चारों और की लपटें ब्रह्माण्ड हैं. नटराज की संपूर्ण मूर्ति पूरे ब्रह्माण्ड को खुद में समेटे हुए हैं.  


भगवान शिव के नटराज स्वरूप की कथा-

पुराणों में भगवान शिव के नटराज स्वरूप की कई कथाएं मौजूद हैं. उनमें से एक ये है- 

देवी काली और भगवान शिव के बीच एक बार प्रतियोगिता हुई जिसमें दोनों को अपना सर्वश्रेष्ठ नृत्य और अभिव्यक्ति दिखानी थी. इस प्रतियोगिता का अंतिम निर्णय भगवान विष्णु को करना था. भगवान शिव ने नृतक का अवतार से बेहद कुशलता और सरलता से प्राकृतिक रूवरूप के साथ अपनी अभिव्यक्ति दी और नृत्य किया. भगवान शिव का नृत्य देख सभी देवता और ऋषि मुनि मंत्रमुग्ध हुए. ऐसा देखकर देवी काली ने भी अपनी कुशलता से हर मुद्रा में नृत्य किया और अभिव्यक्ति की. लेकिन भगवान शिव ने इस दौरान अपनी लीलाएं दिखाईं. इस प्रतियोगिता का विजेता बनने के लिए उन्होंने अपने पांव को कुमकुम में डुबोकर देवी काली के माथे पर लगा दिया. ये सब देख देवी काली हैरान रह गई. वे भगवान शिव के साथ ऐसा नहीं कर सकती थीं क्योंकि वे उनकी पत्‍नी थीं. ऐसे में देवी काली ने अपना नृत्य मुस्कुाराते हुए बंद कर दिया. भगवान विष्णु ने प्रतियोगिता के अंत में शिवजी को विजेता घोषित करते हुए उन्हें नटराज की उपाधि दी. 

नटराज का रहस्य- 

नटराज नाम जब भी आता है तो नृत्य करती मूर्ति आंखों के सामने आ जाती है. नटराज को मूर्ति के माध्यम से ही जाना जाता है. कई हिंदु धर्मग्रंथों में नटराज की मूर्ति का वर्णन है. आमतौर पर नटराज की मूर्ति काष्ठ से बनती है. कई जगहों पर ये तांबे, पीतल और पत्थर से भी बनती है. नटराज मूर्ति के डांस को कॉस्मि‍क डांस के रूप में भी जाना जाता है. कॉस्मिक यानि ब्रह्माण्ड की ऊर्जा. 

इसीलिए नृत्य शाला में दिखते हैं नटराज-

आमतौर पर जब भी देखा गया है कला के केंद्र और नृत्य सिखाने वाली जगहों पर नटराज की मूर्ति जरूर होती है. जो भी नृत्य से प्यार करता है उसके पास आप नटराज की मूर्ति देख सकते हैं. दरअसल, नृतक नटराज का इसीलिए पूजते हैं क्योंकि उन्हें सर्वश्रेष्ठ नृतक माना जाता है. नृत्य के स्वामी ही खुद भगवान शिव यानी नटराज हैं. 


नटराज है ताडंव का दूसरा रूप- 

आमतौर पर सभी भगवान शिव के रौद्र तांडव के बारे में जानते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं शिवजी का आनंद ताडंव भी बहुत प्रचलित है. नटराज को ही आनंद तांडव के रूप में जाना जाता है. इस रूप में संपूर्ण यूनिवर्स आनंदित होकर नृत्य करता है.