माता पार्वती
Starzspeak :
माता पार्वती (गिरिजा भवानी): स्वरूप एवं धार्मिक महत्व
सनातन धर्म में माता पार्वती (आदिशक्ति) की उपासना अत्यंत कल्याणकारी और सर्वसुख प्रदान करने वाली मानी जाती है। भगवान शिव की अर्धांगिनी, जगज्जननी और प्रेम व तपस्या की मूर्ति माँ पार्वती की पूजा-अर्चना करने से साधक के जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और अखंड सौभाग्य का वास होता है।
शास्त्रों के अनुसार, माता पार्वती का पूजन और ध्यान अखंड सौभाग्य, योग्य जीवनसाथी और संतान सुख देने वाला होता है। जिन घरों में माँ पार्वती और शिव परिवार की नियमित सेवा, धूप-दीप और चालीसा का पाठ किया जाता है, वहाँ कभी धन-धान्य, आरोग्य और खुशहाली की कमी नहीं होती। माता पार्वती चालीसा का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से हृदय में निष्काम भक्ति, पवित्रता और अपार आत्मबल का संचार होता है।
जय गिरि तनये दक्षजे शंभु प्रिये गुणखानि ।
गणपति जननी पार्वती अम्बे ! शक्ति ! भवानि ॥
॥ चौपाई ॥
ब्रह्मा भेद न तुम्हरो पावे । पंच बदन नित तुमको ध्यावे ॥
षड्मुख कहि न सकत यश तेरो । सहसबदन श्रम करत घनेरो ॥
तेऊ पार न पावत माता । स्थित रक्षा लय हित सजाता ॥
अधर प्रवाल सदृश अरुणारे । अति कमनीय नयन कजरारे ॥
ललित ललाट विलेपित केशर । कुंकुम अक्षत शोभा मनहर ॥
कनक बसन कंचुकी सजाए । कटि मेखला दिव्य लहराए ॥
कंठ मदार हार की शोभा । जाहि देखि सहजहि मन लोभा ॥
बालारुण अनंत छबि धारी । आभूषण की शोभा प्यारी ॥
नाना जड़ित सिंहासन । तापर राजति हरि चतुरानन ॥
इंद्रादिक परिवार पूजित । जग मृग नाग रक्ष रव कूजित ॥
गिर कैलास निवासिनी जय जय । कोटिक प्रभा विकासिन जय जय ॥
त्रिभुवन सकल कुटुम्ब तिहारी । अणु अणु महं तुम्हारी उजियारी ॥
हैं महेश प्राणेश ! तुम्हारे । त्रिभुवन के जो नित रखवारे ॥
उनसो पति तुम प्राप्त कीन्ह जब । सुकृत पुरातन उदित भए तब ॥
बूढ़ा बैल सवारी जिनकी । महिमा का गावै कोउ तिनकी ॥
सदा श्मशान बिहारी शंकर । आभूषण है भुजंग भयंकर ॥
कण्ठ हलाहल को छबि छाई । नीलकंठ की पदवी पाई ॥
देव मगन के हित अस कीन्हों । विष लै आरपु तिनहि अमि दीन्हों ॥
ताकी तुम पत्नी छवि धारिणि । दूरित विदारिणि मंगल कारिणि ॥
देखि परम सौंदर्य तिहारो । त्रिभुवन चकित बनावन हारो ॥
भय भीता सो माता गंगा । लज्जा मय है सलिल तरंगा ॥
सौत समान शम्भु पह आयी । विष्णु पदाब्ज छोड़ि सो धायी ॥
तेहिकों कमल बदन मुरझायो । लखि सत्वर शिव शीश चढ़ायो ॥
नित्यानंद करी बरदायिनी । अभय भक्त कर नित अनपायिनी ॥
अखिल पाप त्रयताप निकन्दिनि । माहेश्वरी हिमालय नंदिनि ॥
काशी पुरी सदा मन भायी । सिद्ध पीठ तेहि आपु बनायी ॥
भगवती प्रतिदिन भिक्षा दात्री । कृपा प्रमोद सनेह विधात्री ॥
रिपुक्षय कारिणि जय जय अम्बे । वाचा सिद्ध करि अवलम्बे ॥
गौरी उमा शंकरी काली । अन्नपूर्णा जग प्रतिपाली ॥
सब जन की ईश्वरी भगवती । प्रतिप्राणा परमेश्वरी सती ॥
तुमने कठिन तपस्या कीनी । नारद सों जब शिक्षा लीनी ॥
अन्न न नीर न वायु अहारा । अस्थि मात्रतन भयौ तुम्हारा ॥
पत्र गहस को खाद्य न भायउ । उमा नाम तब तुमने पायउ ॥
तप बिलोकि रिषि सात पधारे । लगे डिगावन डिगी न हारे ॥
तब तव जय जय जय उच्चारेउ । सप्तरिषी निज गेह सिधारेउ ॥
सुर विधि विष्णु पास तब आए । वर देने के वचन सुनाए ॥
मांगे उमा वर पति तुम तिनसों । चाहत जग त्रिभुवन निधि जिनसों ॥
एवमस्तु कहि ते दोऊ गए । सुफल मनोरथ तुमने लए ॥
करि विवाह शिव सों हे भामा । पुन: कहाई हर की बामा ॥
जो पढ़िहै जन यह चालीसा । धन जन सुख देइहै तेहि ईसा ॥
॥ दोहा ॥
कूट चंद्रिका सुभग शिर जयति जयति सुख खानि ।
पार्वती निज भक्त हित रहहु सदा वरदानि ॥
