बटुक भैरव आरती
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भगवान श्री बटुक भैरव जी: स्वरूप एवं महत्व
सनातन धर्म में भगवान बटुक भैरव जी को भगवान शिव का अत्यंत सौम्य, बाल स्वरूप माना गया है। 'बटुक' का अर्थ होता है बालक; इसलिए इन्हें तंत्र और भक्ति मार्ग में शिव जी के सबसे शीघ्र प्रसन्न होने वाले रूपों में गिना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब आपदाओं और दानवों से ऋषियों और देवताओं की रक्षा करनी थी, तब शिव जी के अंश से इस दिव्य बाल रूप का प्राकट्य हुआ।
जहाँ काल भैरव जी का रूप अत्यंत विकराल और उग्र माना जाता है, वहीं बटुक भैरव जी अपने भक्तों के लिए अत्यंत कृपालु, वत्सल और रक्षक रूप में पूजे जाते हैं। इनके दाहिने हाथ में खटवांग, त्रिशूल और बाएं हाथ में कपाल तथा डमरू विराजित होता है। रविवार और भैरव अष्टमी के दिन बटुक भैरव जी की आराधना, जप और आरती करने से अकाल मृत्यु का भय, राहू-केतु के दोष, शत्रु बाधा, तंत्र-मंत्र का प्रभाव और जीवन के समस्त संकट शीघ्र नष्ट हो जाते हैं।
॥ श्री बटुक भैरव जी की आरती ॥
जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा ।
जय काली के लाला, दुष्टों के काला ॥
जय भैरव देवा...॥
तुम हो बटुक कृपाला, संकट हरने वाले ।
भक्तों के दुख मोचन, रक्षा करने वाले ॥
जय भैरव देवा...॥
वाहन श्वान तुम्हारा, शोभित अति सुंदर ।
कर में खप्पर त्रिशूल, गले मुंडमाला मनहर ॥
जय भैरव देवा...॥
रक्त वर्ण है तुम्हारा, ज्वाला सी चमके ।
मुकुट शीश पर सोहे, मुद्रिका कान चमके ॥
जय भैरव देवा...॥
ब्रह्मा विष्णु महेश, सब गुण तेरे गावें ।
नारद शारद शेष, ध्यान तुम्हारा ध्यावें ॥
जय भैरव देवा...॥
भूत पिशाच निकट नहीं आवे, नाम तुम्हारा ध्यावे ।
जो जन करे आरती, सो सुख संपत्ति पावे ॥
जय भैरव देवा...॥
पाप कटे दुख भागे, भक्ति मिले तेरी ।
शरण पड़े की स्वामी, करो न अब देरी ॥
जय भैरव देवा...॥
जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा ।
जय काली के लाला, दुष्टों के काला ॥
