अहोई माता
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अहोई माता: महत्व एवं धार्मिक मान्यता
सनातन धर्म में अहोई माता की पूजा का विशेष महत्व है, जो संतान की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य और समृद्धि की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती हैं। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को अहोई अष्टमी का व्रत रखा जाता है। यह व्रत विशेष रूप से माताएं अपनी संतान की रक्षा, दीर्घायु और कल्याण की कामना से निर्जला रखकर करती हैं।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, अहोई माता पार्वती जी का ही एक रूप हैं। इस दिन शाम के समय दीवार पर अहोई माता, उनके सात पुत्रों और स्याऊ (स्याही/सेही) व उसके बच्चों का चित्र बनाकर पूजा की जाती है। तारों को अर्घ्य देकर व्रत का पारण किया जाता है। अहोई माता की पूजा और आरती करने से संतान पर आने वाले समस्त संकट दूर होते हैं और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।
॥ अहोई माता की आरती ॥
जय अहोई माता, जय अहोई माता ।
तुमको निशदिन ध्यावत, हर विष्णु विधाता ॥
जय अहोई माता...॥
कार्तिक कृष्ण अष्टमी, कर कंचन थारी ।
दया करे जगदम्बा, सिर ऊपर धारी ॥
जय अहोई माता...॥
जो जन तुमको ध्यावत, ध्यान लगाके मन में ।
पाप कटे दुख भागे, सुख उपजे तन में ॥
जय अहोई माता...॥
संतान की रक्षा कीजै, मात हमारी ।
आस पूर पूर्ण कीजै, आये शरण तुम्हारी ॥
जय अहोई माता...॥
धन-धान्य और संपत्ति, जो जन तुमसे पावे ।
निशदिन गुण गाये तेरे, आरती उतारे ॥
जय अहोई माता...॥
अहोई माता की आरती, जो कोई जन गावे ।
कहत दास हरि हर जी, वो वैकुण्ठ जावे ॥
जय अहोई माता, जय अहोई माता ।
तुमको निशदिन ध्यावत, हर विष्णु विधाता ॥
