गोरखनाथ आरती
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गुरु गोरखनाथ जी: स्वरूप एवं धार्मिक महत्व
सनातन धर्म और नाथ संप्रदाय में गुरु गोरखनाथ जी को भगवान शिव (आदिनाथ) का साक्षात् अवतार और नवनाथों में सबसे प्रमुख माना गया है। वे एक महान सिद्ध योगी, दार्शनिक, समाज सुधारक और हठयोग परंपरा के प्रवर्तक थे। गुरु गोरखनाथ जी ने योग, प्राणायाम और ध्यान के माध्यम से आत्म-साक्षात्कार का मार्ग सुलभ बनाया और भारतवर्ष में नाथ परंपरा का व्यापक प्रचार-प्रसार किया।
गोरखपुर स्थित 'गोरखनाथ मंदिर' इनकी मुख्य तपोभूमि और पीठ मानी जाती है। गुरु गोरखनाथ जी जात-पात, आडंबर और विषमता के घोर विरोधी थे। वे अपने योगबल और सिद्धियों के माध्यम से असहायों की रक्षा और दुष्टों का संहार करते थे। इनकी नियमित पूजा, ध्यान और आरती करने से मानसिक शांति, योगबल, आरोग्यता, भय-मुक्ति और समस्त सिद्धियों की प्राप्ति होती है।
॥ श्री गुरु गोरखनाथ जी की आरती ॥
जय गोरख देवा, प्रभु जय गोरख देवा ।
सिद्ध गुरु अवधूत, करें सब मुनि सेवा ॥
जय गोरख देवा...॥
शिव के रूप अवतारी, योगेश्वर स्वामी ।
अमरपुरी के वासी, प्रभु अंतर्यामी ॥
जय गोरख देवा...॥
शीश जटा अति सोहै, कानों में मुद्रा ।
गल रुद्राक्ष की माला, रूप विशाल रुद्रा ॥
जय गोरख देवा...॥
कर में खप्पर त्रिशूल, भस्म अंग लपटावे ।
झोली कांधे सोहै, ध्यान निरंजन लावे ॥
जय गोरख देवा...॥
नाथ निरंजन स्वामी, तुम ही जग त्राता ।
रिद्धि-सिद्धि के स्वामी, मुक्ति के दाता ॥
जय गोरख देवा...॥
योग मार्ग दिखलाया, हठयोग के स्वामी ।
दुख संकट सब हारो, हे प्रभु अंतर्यामी ॥
जय गोरख देवा...॥
जो जन गोरख जी की आरती, प्रेम सहित गावै ।
कहत दास यह सिद्ध योग का, अमर पद पावै ॥
जय गोरख देवा, प्रभु जय गोरख देवा ।
सिद्ध गुरु अवधूत, करें सब मुनि सेवा ॥
