चित्रगुप्त आरती
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भगवान श्री चित्रगुप्त जी: महत्व एवं धार्मिक मान्यता
सनातन धर्म में भगवान श्री चित्रगुप्त जी को परमपिता ब्रह्मा जी का मानस पुत्र और कर्मों के लेखा-जोखा का स्वामी माना गया है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब ब्रह्मा जी ने पूरी सृष्टि की रचना की, तब जीवों के अच्छे और बुरे कर्मों का हिसाब रखने के लिए उन्होंने एक योग्य एवं निष्पक्ष अधिकारी की आवश्यकता महसूस की। तत्पश्चात, ब्रह्मा जी की काया (शरीर) और योग साधना से भगवान चित्रगुप्त जी का प्राकट्य हुआ। काया से उत्पन्न होने के कारण ही इनकी संतानें 'कायस्थ' कहलाईं।
भगवान चित्रगुप्त जी के हाथों में हमेशा कलम, दवात, शंख और 'अग्रसन्धानी' (पाप-पुण्य की पुस्तिका) सुशोभित रहती है। ये यमराज के साथ मिलकर समस्त संसार के जीवों के कर्मों का लेखा-जोखा रखते हैं और मृत्यु के पश्चात आत्मा को उसके कर्मानुसार फल, न्याय और सद्गति प्रदान करते हैं।
पूजा एवं कलम-दवात की परंपरा
कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि (भाई दूज / यम द्वितीया) को श्री चित्रगुप्त पूजा (दवात पूजा) का विशेष पर्व मनाया जाता है। इस दिन व्यापारी, लेखक, बुद्धिजीवी और कायस्थ समाज के लोग अपनी लेखनी, बही-खातों और दवात की पूजा करते हैं। मान्यता है कि भगवान चित्रगुप्त जी की कृपा से बुद्धि, विद्या, न्यायप्रियता और व्यवसाय में निरंतर वृद्धि होती है।
॥ श्री चित्रगुप्त जी की आरती ॥
ॐ जय चित्रगुप्त हरे, स्वामी जय चित्रगुप्त हरे ।
भक्तजनों के इच्छित, फल को पूर्ण करे ॥
ॐ जय चित्रगुप्त हरे...॥
विघ्न विनाशक मंगलकर्ता, सन्तन सुखदायी ।
भक्तों के प्रतिपालक, त्रिभुवन यश छायी ॥
ॐ जय चित्रगुप्त हरे...॥
रूप चतुर्भुज, श्यामल मूरत, पीताम्बर राजै ।
मातु इरावती, दक्षिणा, वाम अंग साजै ॥
ॐ जय चित्रगुप्त हरे...॥
कष्ट निवारक, दुष्ट संहारक, प्रभु अंतर्यामी ।
सृष्टि सम्हारन, जन दु:ख हारन, प्रकट भये स्वामी ॥
ॐ जय चित्रगुप्त हरे...॥
कलम, दवात, शंख, पत्रिका, कर में अति सोहै ।
वैजयन्ती वनमाला, त्रिभुवन मन मोहै ॥
ॐ जय चित्रगुप्त हरे...॥
विश्व न्याय का कार्य सम्भाला, ब्रम्हा हर्षाये ।
कोटि कोटि देवता तुम्हारे, चरणन में धाये ॥
ॐ जय चित्रगुप्त हरे...॥
नृप सुदास अरू भीष्म पितामह, याद तुम्हें कीन्हा ।
वेग, विलम्ब न कीन्हौं, इच्छित फल दीन्हा ॥
ॐ जय चित्रगुप्त हरे...॥
दारा, सुत, भगिनी, सब अपने स्वास्थ के कर्ता ।
जाऊँ कहाँ शरण में किसकी, तुम तज मैं भर्ता ॥
ॐ जय चित्रगुप्त हरे...॥
बन्धु, पिता तुम स्वामी, शरण गहूँ किसकी ।
तुम बिन और न दूजा, आस करूँ जिसकी ॥
ॐ जय चित्रगुप्त हरे...॥
जो जन चित्रगुप्त जी की आरती, प्रेम सहित गावैं ।
चौरासी से निश्चित छूटैं, इच्छित फल पावैं ॥
ॐ जय चित्रगुप्त हरे...॥
न्यायाधीश बैंकुंठ निवासी, पाप पुण्य लिखते ।
'नानक' शरण तिहारे, आस न दूजी करते ॥
ॐ जय चित्रगुप्त हरे, स्वामी जय चित्रगुप्त हरे ।
भक्तजनों के इच्छित, फल को पूर्ण करे ॥
