2,200 साल पुराना है भगवान श्रीकृष्ण का यह मंदिर,यहां कि मान्या बनाती है इसे सबसे खास

गुजरात के देवधाम द्वारका को सात मोक्ष पुरी में से एक माना जाता है. इस जगह का नाम द्वारका इसलिए रखा क्योंकि द्वार का मतलब प्रवेश द्वार होता है और इस धाम को मोक्ष प्राप्ति का द्वार माना जाता है. गुरू शंकराचार्य द्वारा परिभाषित चार धाम में से एक भारत की पश्चिम दिशा में स्थिति द्वारका धाम है जहां प्रसिद्ध द्वारकाधीश मंदिर है. यह मंदिर द्वारका के राजा यानि भगवान श्री कृष्ण का है.

 

गुजरात का यह स्थान हिंदू तीर्थ स्थल के रूप में इस तरह का एक उच्च सम्मान है. यह चार सिद्धांत पवित्र स्थानों या चारधाम में से एक माना जाता है, यह स्थान मोक्षापुरी के रूप में भी प्रसिद्ध है. द्वारका प्रमुख धाम चार पवित्र हिंदू तीर्थ स्थलों में से एक है, और सप्त पुरी से एक देश के रूप में सात सबसे प्राचीन धार्मिक नगर में से एक है. द्वारका हमेशा से ही द्वारका राज्य, कृष्ण के प्राचीन राज्य के रूप में स्वीकार किया जाता रहा है.

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द्वारका धाम का इतिहास

हिन्दू धर्म के पवित्र ग्रंथों में से एक इस धाम का काफी महत्व माना है. माना जाता है कि इस धाम की यात्रा से मनुष्य के जीवन के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और वह गंगा जल की तरह पवित्र हो जाता है. धर्म ग्रंथ स्कंदपुराण के मुताबिक, द्वारकाधीश के दर्शन करने से कीट-पतंग, पशु पक्षी और सर्प आदि योनियों में पडे हूए समस्त पापी भी मुक्त हो जाते है.

 

श्री कृष्ण के इस पवित्र धाम की महिमा के बारे में कहा जाता है, कि यहां आने वाला मनुष्य द्वारकावासी के दर्शन या स्पर्श करके भी बड़े बड़े पापों से मुक्त हो स्वर्ग लोक में निवास करते हैं. द्वारका की इन मान्यताओं से ही अनुमान लगाया जा सकता है कि जो व्यक्ति साक्षात द्वारका के दर्शन, जप, दान, तप आदि करे तो उसे कितना फल मिलता होगा. द्वारका को सब क्षेत्रों और तीर्थों से उत्तम कहा गया है.

 

धार्मिक पृष्ठभूमि

धार्मिक ग्रंथों और पुराणो के मुताबिक भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तरकाल में शांतिपूर्वक रहने के उद्देश्य से सौराष्ट्र में समुंद्र तट पर द्वारकापुरी नामक नगरी बसाई थी और आस पास के क्षेत्र में अपने राज्य का विकास किया था. उन्होंने विश्वकर्मा की मदद से समुंद्र में द्वारकापुरी बनाई थी. हालांकि, भगवान श्रीकृष्ण के अंतर्ध्यान होने के बाद द्वारका सुमद्र में डूब गई. केवल भगवान श्रीकृष्ण का निजी भवन नहीं डूबा और वहीं उनके मंदिर की स्थापना की गई.

 

भगवान श्री कृष्णों के भक्तों के बीच इस स्थान का काफी महत्व है. यहां का मर्दादितसागर भगवान श्रीकृष्ण के चरणों को धोया करता था. यहां की कंचन और रत्नजड़ित मंदिर की सीढ़ियों पर खड़े होकर ही सुदामा ने मित्रता की दुहाई दी थी. यहीं पर भगवान श्रीकृष्ण, सुदामा का नाम सुनते ही नंगे पावं उठकर मिलने भाग आए थे. इसी नगरी में वियोगिनी मीरा ने अपने प्रियतम के चरणों में अपने प्राण न्यौछावर कर दिए थे.

 

सतयुग में महाराजा रैवत ने यहां समुंद्र के मध्य की भूमि पर कुश बिछाकर यज्ञ किया था. जिसके बाद इस जगह को कुशथली कहा गया. हालांकि, बाद में यहां कुश नामक दानव ने उपद्रव किया. जब दानव को शस्त्रो से नहीं मार पाए तो भगवान ने उसे मूर्ति में गाढ़कर उसके ऊपर उसी की आराध्य कुशेश्वर लिंग मूर्ति स्थापित कर दी. जिसके बाद दैत्य के प्राथना करने पर भगवान ने उसे वरदान दिया कि, कुशेश्वर का जो दर्शन नहीं करेगा उसकी द्वारका यात्रा का आधा पुण्य दैत्य को मिल जाएगा.

 

द्वारकाधीश मंदिर

द्वारकाधीश मंदिर, द्वारका का मुख्य मंदिर है. इसे श्रीरणछोडरायजी का मंदिर भी कहा जाता  है. यह मंदिर एक चारदीवारी के बीच स्थित है, जिसके चारों ओर द्वार हैं. यह मंदिर सात मंजिला है और शिखरयुक्त है. इस मंदिर की चोटी पर एक बहुत बड़ा ध्वज फहराया जाता है. माना जाता है कि यह विश्व का सबसे बड़ा ध्वज है. जिसे चढ़ाते समय यहां महोत्सव होता है. इस मंदिर की लंबाई 40 वर्गफुट है और यह 140 फुट ऊंचा है. मंदिर के फर्श पर सफेद और नीले संगमरमर के टुकड़ों को कलात्मक ढंग से लगाया गया है. श्रीरणछोडराय जी की मूर्ति और मंदिर के द्वार में सोने चांदी का काम किया गया है. भगवान श्रीकृष्ण की इस मूर्ति के नाम के पीछे भी एक कथा है. कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण कालयवन के विरूद्ध युद्ध से भागकर द्वारका पहुंचे थे. जिसके कारण उनका नाम रणछोडजी पड़ गया था.

 

गोमती

दरअसल, द्वारका में पश्चिम और दक्षिण दिशा में एक बड़ा खाल है. जिसमे समुंद्र का जल हमेशा भरा रहता है. इसी जगह को गोमती कहते हैं. यह कोई नदी नही है. इसी कारण इसे गोमती द्वारका कहते हैं. गोमती के तट पर नौ पक्के घाट बनाए गए हैं.

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