अनंत चतुर्दशी के व्रत से मिलता है अखंड सुख!

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लेखिका : रजनीशा शर्मा

भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की चतुदर्शी को भगवान अनंत देव का व्रत और पूजन किया जाता है | इसे साधारण बोलचाल की भाषा में अनंता भी कहते है | भगवान श्री कृष्ण के कहने पर इसे पांडवो ने भी  किया था और अखंड और निष्कंटक राज्य प्राप्त किया | जो भी इस व्रत और पूजन को करता है वह अखंड सुख और सौभग्य पाता है इसकी विधि इस प्रकार है -

* इस दिन व्रती को बह्म मुहूर्त में उठ कर स्नान आदि से निवृत होकर कलश की स्थापना करनी चाहिए | कलश पर कुश से अनंत की स्थापना की जाती है | कुश को भगवान अनंत का रूप मान कर कुश का पूजन किया जाता है |

* इस पर चौदह गांठो वाला हल्दी , कुमकुम से रंगा हुआ कच्चे धागो से बना अनंत रखा जाता है |

* सम्भव हो तो नदी के किनारे इस व्रत का पूजन करे अन्यथा घर पर ही स्थापना कर भगवान विष्णु का पूजन  एवं गुणगान करे |

*धुप दीप , फूल , फल, नैवैद्य  आदि से पूजन करे , कथा सुने और लोगो को भी सुनाये इससे फल अधिक मिलता है |

* पूजन समाप्त कर पुरुष धागे को दाए हाथ में और स्त्रियाँ बाए हाथ में धारण करे और भगवान अनंत से अपनी मनोकामना कहे |

* ऐसा कहा जाता  है की चौदह वर्षो तक यदि यह व्रत किया जाए तो व्यक्ति को भगवान विष्णु के लोक में स्थान प्राप्त हो जाता  है |

* इस व्रत की कथा भगवान श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर को सुनाई थी |उसी कथा का श्रवण इस व्रत में किया जाता है |