जानिये हिन्दू विवाह का क्या है वैज्ञानिक आधार!

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लेखक: सोनू शर्मा

हिन्दू विवाह विधियों और इसकी भव्यता की चर्चा तो पूरे विश्व में की जाती है| विश्व भर में लोग हिन्दू रीती से विवाह करने के दीवाने है | कई विदेशी जोड़े भारत में आकर यह कई रीती अनुसार विवाह करते है | हमारा देश भारत अपने ज्ञान और आध्यात्म के लिए विश्व में विख्यात है | हमारे हर रीती और रिवाज का वैज्ञानिक आधार होता है | आइये जानते है की विवाह विधियों का क्या है वैज्ञानिक महत्व -

 

1 - हिन्दू धर्म में सिन्दूर को विवाहित महिलाओ की पहचान माना गया हैं | सिन्दूर विवाहितो के लिए जितना आवश्यक है अविवाहितों के लिए उतना ही वर्जित | सिन्दूर लगाने से मस्तिष्क को ठंडक मिलती है और स्वास्थ्य उत्तम रहता है | यह संसर्ग की इच्छा को भी बढ़ाता है | विवाह के समय सिन्दूर की विधि की जाती है उसके पश्चात विवाहिता इसे सदैव धारण करती है |

 

2 - विवाह में प्रज्वल्लित अग्नि सूर्य का प्रतीक मानी जाती है | अग्नि सभी प्रकार की नकारात्मकता को नष्ट कर देती है |

 

3 - विवाह में धारण किये जाने वाले आभूषण भी शरीर को ऊर्जा एवं चमक प्रदान करते है | सोने के आभूषण शरीर को ऊर्जावान एवं कांति प्रदान करते है तो चांदी में रोग प्रतिरोधक क्षमता होती है जो शरीर में कीटाणुओंको प्रवेश करने नहीं देती | पैरो पहनी जाने वाली पायल पैरो की नसों को स्वस्थ रखती है |

 

4 - विवाह पश्चात लगाई जाने वाली बिंदी भी दोनों भौहो के बीच लग कर प्रेशर प्वाइंट को दबा कर ब्लड सर्कुलेशन को नियमित करती है | प्राचीन समय में पुरुष भी टीका अवश्य लगाते थे |

 

5 - हाथो में धारण की जाने वाली चूडिया भी रक्त प्रवाह को नियमित रखने में सहायक है | प्राचीन काल में पुरुष भी सोने के कड़े हाथो में धारण करते थे |

 

6 - पैरो में जो बिछिया विवाह के समय पहनाई जाती है वह एक गुड कंडक्टर का काम करती है | यह पृथ्वी से ध्रुवीय ऊर्जा खींच कर शरीर में पहुँचता है | वैज्ञानिको  की माने तो पेअर की जिस ऊँगली में बिछिया पहनी जाती है वह गर्भाशय से जुडी होती है और इसमें बिछिया पहनने से गर्भाशय स्वस्थ्य रहता है | यह महीने के  चक्र को भी नियमित रखने में सहायक है |