वेद क्या हैं और कैसे हुआ वेदों का विस्तार?

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लेखक: सोनू शर्मा

हिन्दू धर्म में वेदों को बहुत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है तथा हिन्दू शास्त्र के अनुसार वेद ईश्वर की वाणी मानी जाती है । वेद चार है;  ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद व अथर्ववेद, इनमे सबसे प्राचीन ऋग्वेद माना जाता है । वेद मानव सभ्यता की सबसे प्राचीन पाण्डुलिपिया है । इन चारो वेदों के उपवेद भी है, ऋग्वेद का आयुर्वेद, यजुर्वेद का धनुर्वेद, सामवेद का गंधर्ववेद, अथर्ववेद का अर्थशास्त्र।  हिन्दू धार्मिक ग्रन्थों के अनुसार वेदों की रचना स्वयं भगवान ब्रह्मा ने की हैं और उन्होंने इन वेदों के ज्ञान तपस्या में लीन अंगिरा, आदित्य, अग्नि और वायु ऋषियों को दिया था, जिसके बाद वेदों का ज्ञान पीड़ी दर पीड़ी चलता रहा। यूनेस्को की 158 सूची में से भारत की पांडुलिपियों की सूची 38 है।

ऋग्वेद में अग्नि, अश्‍विनी कुमार, इंद्र, विश्‍वदेवा, सरस्वती, वरुण, उषा, पूषा, सूर्य, वैश्वानर, ऋभुगण आदि देवी-देवताओं को समर्पित ऋचाएं है तो वही सामवेद में अग्नि, वायु, पूषा,  उषा, मरुत, अश्विनी, इंद्राग्नि, द्यावापृथिवी, सोम, मित्रावरुण आदि को समर्पित ऋचाएं हैं। यजुर्वेद में सविता,  प्रजापति, इंद्र, वायु, विद्युत, धौ, द्यावा, पृथ्वी आदि देवी-देवताओं को समर्पित ऋचाएं शामिल है और अथर्ववेद में वाचस्पति, सूर्य, आशपाल, पृथ्‍वी, विश्‍वेदेवा, हरिण्यम:, ब्रह्म, गंधर्व, अग्नि, प्राण, वायु, मित्रावरुण, आदि देवी-देवताओं को समर्पित ऋचाएं हैं।  हर वेद के चार भाग हैं; संहिता जिसमे मंत्रों की विवेचना की गई है, ब्राह्मण ग्रन्थ, आरण्यक तथा उपनिषद जिसमे आत्मा के स्वभाव और सम्बन्ध का वर्णन है। वेदों की 28 हजार पांडुलिपियाँ भारत में पुणे के 'भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट' में रखी हुई हैं।