पूजा के बाद क्यों करते हैं आरती?

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लेखक: सोनू शर्मा

हिन्दू धर्म में पूजा पाठ का विशेष महत्व है, सभी संप्रदाय के लोग अपने आराध्य की पूजा बड़ी भक्ति भाव व श्रद्धा से करते है, पूजा के बाद यदि आरती न की जाए तो पूजा अधूरी मानी जाती है । वास्तव में आरती पूजा का समापन होती है ।

आरती के संबवन्ध में यह मान्यता है कि यदि कोई व्यक्ति पूजा कि विधि ठीक प्रकार से नहीं जानता या मन्त्र नहीं जानता और वह भक्ति पूर्वक सच्चे मन से आरती कर लेता है तो भगवान उसकी पूजा स्वीकार कर लेते है ।

आरती थाल में सजाई जाती है, उसमें दीपक, घी अदि को जलाकर अपने इष्ट के सामने विशेष विधि से घुमाया जाता है । आरती का अपना वैज्ञानिक महत्व भी है, आरती में प्रयोग होने वाले घी, रुई, कपूर, चन्दन इत्यादि सभी शुद्ध व पवित्र होते है ।

आरती के समय जब यह पदार्थ जलते है वातावरण एकदम शुद्ध व सुगन्धित हो जाता है, आसपास सकारात्मक एनर्जी का प्रवाह हो जाता है । आरती में कपूर व घी के जलने से रोग के कीटाणु समाप्त हो जाते है ।

पूजा चाहे मंदिर में कि जाए या घर में आरती अनिवार्य है, आरती के समय शंख व घंटा नाद किया जाता है। घंटा नाद हमारे मन को एकाग्र करता है, मन उल्लास से भर जाता है तथा नई ऊर्जा का विकास होने लगता है।

आरती के बाद आशिका जरूर लेनी चाहिए, आशिका लेने का अर्थ होता है कि हमने भगवान के जिन गुणों का गुणगान किया है वह सभी गुण हमे भी प्राप्त हो जाए।