माँ बह्मचारिणी का अद्धुत स्वरूप करता है हर कामना की  सिद्धि!

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लेखिका : रजनीशा शर्मा

नवरात्रि का दूसरा दिन माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा अर्चना का दिन है | माँ ब्रह्मचारिणी तप , व्रत , नियम , शुद्धि और त्याग की प्रति मूर्ति है | माँ ब्रह्मचारिणी से अर्थ होता है तपश्चारिणी अर्थात तप करने वाली | माता पार्वती ने भगवान शिव को पति स्वरूप प्राप्त करने के लिए वन में अत्यंत कठिन व्रत का पालन किया था | उन्होंने कुछ वर्षो तक केवल कंद अर्थात फल खाकर तपस्या की | उसके बाद फल त्याग कर केवल पत्ते खा कर तप किया और फिर पत्तो का भी त्याग कर दिया जिस कारण उनका नाम अपर्णा पड़ा | फिर केवल जल पीकर कुछ वर्ष केवल धुएं का सेवन किया | कड़ती ठण्ड में जल में तप किया और भयानक ग्रीष्म ऋतू में अग्नि के समक्ष तप किया फिर अन्न, जल, वायु सभी का त्याग कर घोर तप किया | ऐसे कठिन व्रत के कारण ही उनका नाम तपश्चारिणी और ब्रह्मचारिणी पड़ा |ब्रह्म  का अर्थ तप और चारिणी का अर्थ है आचरण अर्थात तप आचरण करने वाली |

                                                                      माँ ब्रह्मचारिणी एक हाथ में अक्षमाला और दूसरे हाथ में कमंडल धारण करती है | माँ के मुख की कांति एवं तेज तीनो लोको को प्रकाशित करता है | माँ शान्ति एवं तप की मूर्ति है जो सदा संसार के कल्याण के लिए तप में लीन रहती है |   माँ बह्मचारिणी सभी मनोकामनाओ की पूर्ति करने वाली है | माँ बह्मचारिणी की कृपा से वायु की गति से भी तेज गति से चलने वाले मन को संयमित करने की शक्ति प्राप्ति होती है | माँ बह्मचारिणी सर्वसिद्धि , ज्ञान और सफलता देने वाली है | माँ की कृपा से व्यक्ति की सभी समस्याओं का अंत हो जाता है और मनुष्य इहलोक और परलोक में सुख पाता है |

                   माँ बह्मचारिणी की साधना से साधक का स्वाधिष्ठान चक्र जाग्रत होता है और भक्त अपने मन पर विजय प्राप्त करने में सफल होता है | माँ बह्मचारिणी भक्तो पर कृपा कर उनकी हर मनोकामना पूर्ण करती है |