बसंत पंचमी के दिन ही क्यों होती है मां सरस्वती की पूजा ?

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लेखक: सोनू शर्मा

बसंत पंचमी हिन्दुओं का एक विशेष पर्व है, यह हर वर्ष शुक्ल पंचमी के दिन बहुत उल्लास के साथ मनाया जाता है । बसंत के मौसम में हर ओर फूलों की बहार होती है, गेहू में नई बाती आ जाती है, आम में बोर खिल जाती है तथा खेतों में पीली सरसों लहलहाने लगती, चारों ओर वातावरण सुहावना होता है ।

इस दिन सरस्वती की पूजा करने का विधान है, इस दिन स्त्रियाँ पीले वस्त्र धारण करके सरस्वती की पूजा करती है, इसके पीछे एक पौराणिक कथा प्रचलित है । जब ब्रह्मा जी सृष्टि का  निर्माण करने के बाद उसका अवलोकन करने के लिए पृथ्वी लोक में आये तो उन्हें पृथ्वी में नीरसता तथा सूनापन प्रतीत हुआ । उन्होंने अपने कमंडल से पृथ्वी पर जल छिड़का जिसके फलस्वरूप पृथ्वी पर कम्पन हुआ तथा चार भुजाओं वाली स्त्री प्रकट हुई जिसके एक साथ में वीणा थी तथा दूसरा हाथ वर मुद्रा में था और उसके बाक़ी दोनों हाथों में पुस्तक व माला विद्यमान थी ।

ब्रहमा जी के अनुरोध पर जैसे ही उन्होंने वीणा बजाई, सारे संसार में मधुरता फैल गई और ब्रहमा जी द्वारा उस देवी को सरस्वती नाम प्रदान किया गया । तब से बसंत पंचमी के दिन सरस्वती जी की पूजा बहुत ही विधि विधान पूर्वक हर्षोल्लास से की जाती है । ऐसा माना जाता है की यदि बसंत पंचमी को सरस्वती का पूजन किया जाए तो बुद्धि और ज्ञान में वृद्धि होती है । सरस्वती साहित्य, संगीत तथा कला की देवी मानी जाती है । यह दिन विद्या ग्रहण करने के लिए शुभ माना जाता है, इसीलिए बच्चों को विद्यारम्भ भी इसी दिन करने का विशेष महत्व है ।