साईं बाबा के बारे में आज भी पूरा सच नहीं जानते कई लोग, पढ़ें ये खबर

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By: Starzspeak 

जिस तरह पर्वतों में हिमालय को श्रेष्ठ माना जाता है उसी तरह संतों में सांई को श्रेष्ठ माना जाता है. इसलिए सांई के नाम के आगे 'थे' लगाना उचित नहीं है, क्योंकि सांई आज भी हमारे बीच हैं. बस, आपको एक बार उनकी शरण में होना जरूरी है, उसके बाद वह आपके आसपास होंगे और यह आपको खुद अनुभूत होगा.

सांई बाबा के बारे में कई बार ये भ्रम फैला है कि वह हिन्दू थे या मुसलमान? या वह कबीर, नामदेव, पांडुरंग आदि के अवतार थे. कुछ लोग कहते हैं कि वह शिव के अंश हैं और कुछ को उनमें दत्तात्रेय का अंश नजर आता है. अन्य लोग कहते हैं कि वह अक्कलकोट महाराज के अंश हैं.

कट्टर धार्मिक युग में व्यक्ति हर संत को धर्म के आईने में देखना चाहता है. कट्टरपंथी हिन्दू भी जानना चाहते हैं कि वह हिन्दू थे या मुसलमान? यदि मुसलमान थे तो फिर हम उनकी पूजा क्यों करें? मुसलमान भी जानना चाहते हैं कि अगर यदि वह हिन्दू थे तो फिर हम उनकी समाधि पर जाकर दुआ क्यों करें?

सांई बाबा के बारे में अधिकांश जानकारी श्रीगोविंदराव रघुनाथ दाभोलकर द्वारा लिखित 'श्री सांई सच्चरित्र' से मिलती है. मराठी में लिखित इस मूल ग्रंथ का कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है. यह सांई सच्चरित्र सांई बाबा के जिंदा रहते ही 1910 से लिखना शुरू किया. 1918 के समाधिस्थ होने तक इसका लेखन चला.

लेकिन अब सवाल यह उठता है कि कितने हैं, जो 'सबका मालिक एक' की घोषणा करते हैं. यह देखा गया है कि सांई को मानने वाले भी ज्योतिषी, तथाकथित बाबा और अन्य लोगों के चक्कर में भटकते रहते हैं. इससे पता चलता है कि वे सब भ्रमित हैं व उन्हें सांई पर भरोसा नहीं है.

सांई बाबा का मिशन था- लोगों में एकेश्वरवाद के प्रति विश्वास पैदा करना. उन्हें कर्मकांड, ज्योतिष आदि से दूर रखना और उनके दुख-दर्द को दूर करना साथ ही समाज में भाईचारा कायम करना.

सांई अपना ज्यादातर वक्त मुस्लिम फकीरों के संग बिताते थे, लेकिन माना जाता है कि उन्होंने किसी के साथ कोई भी व्यवहार धर्म के आधार पर नहीं किया. जो लोग सांई बाबा को हिन्दू मानते हैं वे उनके हिन्दू होने का तर्क देते हैं, जैसे- 

हिन्दू होने के कुछ कारण:
1. बाबा धुनी रमाते थे. धुनी तो सिर्फ शैव और नाथपंथी संत ही जलाते हैं.
2. बाबा के कान बिंधे हुए थे. कान छेदन सिर्फ नाथपंथियों में ही होता है.
3. सांई बाबा हर सप्ताह नाम कीर्तन का आयोजन करते थे जिसमें विट्ठल (कृष्ण) के भजन होते थे. बाबा कहते थे- ठाकुरनाथ की डंकपुरी, विट्ठल की पंढरी, रणछोड़ की द्वारिका यही तो है.
4. सांई बाबा कपाल पर चंदन और कुंकू लगाते थे.
5. जहां बाबा पहली बार लोगों को दिखे थे उस स्थान पर बाबा के गुरु का तप स्थान था. जब उस समाधि की खुदाई की गई तब वहां चार दीपक जल रहे थे. म्हालसापति तथा शिर्डी के अन्य भक्त इस स्थान को बाबा के गुरु का समाधि-स्थान मानकर सदैव नमन किया करते थे. 

सांई के बारे में जानकार मानते हैं कि वे नाथ संप्रदाय का पालन करते थे. हाथ में पानी का कमंडल रखना, धूनी रमाना, हुक्का पीना, कान बिंधवाना और भिक्षा पर ही निर्भर रहना- ये नाथ संप्रदाय के साधुओं की निशानी हैं. नाथों में धूनी जलाना जरूरी होता है जबकि इस्लाम में आग हराम मानी गई है. सिर्फ इस एक कर्म से ही उनका नाथपंथी होना सिद्ध होता है.