कंगना ने किया मणिकर्णिका स्नान, क्या होता है मणिकर्णिका स्नान? देखिए पूरी कहानी...

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By: Deepika

जहां पूरे देश ने 15 अगस्त पर अग्रेंजों से आजादी प्राप्त करने का 72 वां जश्न मना रहे थे , वहीं बॉलीवुड़ की क्वीन कंगना का झांसी की क्वीन पर आधारित फिल्म मणिकर्णिका का पोस्टर रिलीज हुआ। चारो तरफ फिल्म मणिकर्णिका की चर्चा हो रही है और हो भी क्यों ना हो जब पोस्टर में कंगना का लुक ऐसा उतारा गया जैसे मानों हकीकत में झांसी की क्वीन ‘मणिकर्णिका’ ही हो।

15 अगस्त वाले दिन मणिकर्णिका फिल्म का पोस्टर रिलीज के बाद वाराणासी के शहर काशी में मर्णिकणिका घाट पर फिल्म की अभिनेत्री कंगना रानौत ‘मणिकर्णिका स्नान’ किया। ‘मणिकर्णिका स्नान’ काशी में बेहद प्रचलित है चलिए बताते है आपकों मणिकर्णिका स्नान घाट की पूरी कहानी ।

मणिकर्णिका घाट में स्नान करना हिन्दू धर्म में बहुत अधिक महत्व है। काशी में यह सबसे पूराना और प्रसिद्ध घाट है। यहां स्नान करने का कार्तिक महीने की शुक्ल पक्ष की चौदस अथार्त बैकुण्ठ चतुदर्शी के दिन यहां स्नान का विशेष महत्व है। वैसे यह श्मशान घाट के रूप में सबसे अधिक प्रचलित है। ऐसा माना जाता है कि यहां भगवान शिवजी का अघोर स्वरूप सदैव निवास करता है। इस श्मशान घाट में चिता की आग कभी भी ठन्डी नही होती है। कुछ लोगों को मानना है कि यहां पर क्रिया क्रम करने के बाद मृतक को सीधा मोक्ष मिलता है। यहां पर अन्तिम क्रिया करने की परम्परा तकरीबन 3 हज़ार वर्ष पूर्व शुरू हुई थी।


मणिकर्णिका घाट कहने के पीछे का रहस्य-

इसें मणिकर्णिका घाट क्यों कहा जाता है इसका कारण पौराणिक कथाओं से प्राप्त हुआ है। पौराणिक कथाओं के अनुसार जब माता सती अपने पिता दक्ष से क्रोधित होकर स्वंय को अग्नि को समर्पित कर दिया, उसके बाद भगवान शिव माता सती के विरह में उनके शरीर को लेकर हजारों साल तक इधर-उधर भटकते रहे। तब भगवान विष्णु ने सृष्टि को बचाने के लिए माता सती के शरीर को अपने सुदर्शन चक्र से खंड-खंड कर दिया। इसके बाद ही 51 शक्तिपीठों की स्थापना हुई। और इसी वाराणसी के घाट पर माता सती के कान का कुंडल गिरा था। इसी वजह से इसे मणिकर्णिका घाट कहा जाता है।

           इस कथा के अलावा एक कथा और भी प्रचलित है जिस वजह से मणिकर्णिका घाट का नाम पड़ा। कहते जब माता सती अग्नि के कुंड में कूद गई थी उसके बाद भगवान शिवजी लाखों वर्ष तक योगनिद्रा में बैठे रहे। तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से कुंड बनाया और इस कुंड में भगवान शिवजी ने योगनिद्रा से उठने के बाद स्नान किया । और इसी कुंड में भगवान शिवजी के कान का कुंडल खो गया, जो आज तक नही मिला। तभी इस घाट को मणिकर्णिका( कान का कुंडल) घाट कहा जाने लगा। कार्तिक माह में यहां स्नान करना सबसे उत्तम और फलदायी माना जाता है। कुछ लोगों की मान्यता ऐसी भी है कि जब किसी मृतक का दाह-संस्कार किया जाता है तो मुखाग्नि देने पहले उससे कान में पूछा जाता है कि उसने भगवान शिवजी के कान का कुंडल देखा क्या ? इससे मृतक की आत्मा का मोक्ष हो जाता है और फिर उसकी आत्मा को किसी भी योनि में जन्म नही लेना पड़ता है।

मणिकर्णिका पुराण के अनुसार यह कहानी है कि भगवान विष्णु ने माता पार्वती और भगवान शिवजी के स्नान के लिए अपने चक्र से कुंड खोदा था। इसमें भगवान शिव जी और माता पार्वती ने स्नान के बाद अपने बाल झटके और उस दौरान शिवजी का मणि और माता पार्वती के कान का कुंडल गिर गया। तभी से इस कुंड का नाम मणिकर्णिका नाम पड़ गया था।

    कुछ किवदंतियों और पौराणिक कथाओं के अनुसार ऐसा भी माना जाता है कि यहां प्रत्येक वर्ष कार्तिक माह की बैकुण्ठ चौदस को भगवान शिवजी किसी ना किसी रूप में स्नान करने आते है।